विश्व पशु दिवस: प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज कराने के लिए मजबूर पशुपालक

विश्व पशु दिवस: प्राइवेट डॉक्टरों से इलाज कराने के लिए मजबूर पशुपालक

लखनऊ। बाबू लाल की गाय भैंस जब भी बीमार पड़ती हैं तो उन्हें सरकारी डॉक्टरों की बजाय झोलाझाप डॉक्टर से इलाज कराना पड़ता है, जिससे उनके पैसे तो ज्यादा खर्च होते ही हैं, पशुओं की सेहत का भी खतरा बना रहता है, लेकिन उनके पास कोई विकल्प नहीं। बाबू लाल के गांव में महीनों तक कोई सरकारी डॉक्टर नहीं आता है।

"हमारे गाँव में कभी सरकारी डॉक्टर इलाज करने के लिए नहीं आए। प्राइवेट डॉक्टर को कभी भी फोन कर लेते हैं, वो घर भी आ जाते हैं, लेकिन पैसे ज्यादा देने होते है।" बाबू लाल कहते हैं। बाबूलाल उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिले के कुनौरा गांव के रहने वाले हैं। उनके पास एक गाय, एक भैंस और चार बकरियां हैं। उनके पूरे परिवार का खर्चा भी इन्ही पशुओं से चलता है। "हमारे गांव से पांच-छह किलोमीटर दूर ही सरकारी जानवरों का अस्पताल है, लेकिन वहां पर भी कोई नहीं मिलता है। जब भी गाय-भैंस को सीमन चढ़वाना होता है तो भी प्राइवेट डॉक्टर आता है।" बाबू लाल ने कहा।


बाबू लाल ही नहीं उत्तर प्रदेश के लगभग सभी गाँवों के पशुपालकों की यही स्थिति है। पशुओं के इलाज के लिए बने पशु चिकित्सालयों की बदत्तर हालत और तैनात किए गए डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी के चलते पशुपालकों को मजबूरी में प्राइवेट डॉक्टरों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे उनको काफी आर्थिक नुकसान भी होता है।

हर छह साल में देश में होने वाली (जो 2012 में हुई ) पशुगणना (इसे 19वीं पशुगणना कहते हैं) के मुताबिक देश के 51 करोड़ पशुधन है। इनमें से उत्तर प्रदेश में पशुओं की संख्या 4 करोड़ 75 लाख (गाय-भैंस, बकरी, भेड़ आदि सब) है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों को कितनी सुविधाएं पहुंच रही इसके लिए गाँव कनेक्शन की टीम ने लखनऊ और बाराबंकी जिले के सात गाँव (कुनौरा, गदेला, मुसपिपरी, सलेमाबाद, हिम्मतपुरवा, करुवा, देवरा) में सैंकड़ों पशुपालकों से बात की। इस सर्वे के मुताबिक सभी पशुपालकों ने कहा कि पशु के बीमार होने पर वह सरकारी डॉक्टरों की बजाय प्राइवेट डॉक्टर का सहारा लेते हैं। इसके अलावा पशुओं में होने वाले रोगों से बचाव के लिए सरकार द्धारा खुरपका-मुंहपका और गलाघोटू का टीकाकरण कराया जाता है वो भी कभी-कभी होता है।

एक तरफ जहां पशुपालक सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों की सुविधाएं न मिलने से परेशान हैं वहीं अस्पतालों को चिकित्सक अपनी तर्क देते हैं। पशुपालकों तक न पहुंच पाने का कारण बताते हुए लखनऊ जिले के बीकेटी ब्लॉक के महिगवां गाँव के पशुचिकित्सा अधिकारी डॉ सुरेंद्र कुमार बताते हैं, "पूरे साल में तीन महीने ही अस्पताल में रहते हैं। साल में दो बार पशुओं का टीकाकरण करना होता है। इसके अलावा गाँवों में शौचालय बनवाने में, कोटा सत्यापन, स्वच्छता अभियान में ड्यूटी, मिड डे मील चेक करना जैसे कई कामों में ड्यूटी लगवा दी जाती है।"

अपनी बात को जारी रखते हुए डॉ सुरेंद्र आगे बताते हैं, "मेरे पशुचिकित्सालय में करीब 80 गाँव आते हैं। इनमें सभी पशुओं को इलाज करना संभव नहीं होता है। जब टीकाकरण अभियान चलता है तो पूरी टीम बाहर रहती है ऐसे में जो पशुओं की एआई (कृत्रिम गर्भाधान) भी नहीं हो पाती है। इसलिए पशुपालक प्राइवेट करा लेते है।"वर्ष 2017 में संसद में कृषि संबंधि समिति ने एक रिपोर्ट पेश की जिसके मुताबिक पशु चिकित्सा डॉक्टरों और दवाइयों की गंभीर कमी है जो देश में पशुओं को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश में लगभग एक लाख 15 हजार पशुचिकित्सकों की जरूरत है और वर्तमान में 60 से 70 हजार ही पशुचिकित्सक उपलब्ध है। रिपोर्ट के मुताबिक सही समय पर उपचार और दवाई न मिलने के कारण बड़ी संख्या में जानवरों की मौत हो जाती है। इससे सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान गरीब छोटे और सीमांत किसानों को होता है।

"सरकार को नए वेटनरी हेल्थ केयर खोलने चाहिए और जो पशु चिकित्सालय है जिनकी स्थिति को सुधारना चाहिए। ताकि पशुपालकों को सुविधा हो। अभी भी सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त दवा नहीं है और गाँव में जो पैरावट्स है उनको प्रशिक्षण देने की जरूरत है क्योंकि वहीं पशुओं का इलाज करते है।" बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ आर.के सिंह ने बताया।


ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर पशुओं का इलाज पशुमित्र करते है। इनके पास पर्याप्त ज्ञान न होने के कारण पशुपालकों को भी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। भारतीय पशुचिकित्सा परिपषद के एक्ट 1984 में यह लिखा हुआ है कि पशुमित्र केवल प्रारम्भिक चिकित्सा कर सकते है लेकिन आजकल पशुमित्र पैसा कमाने के चक्कर में योजनाओं की जानकारी छोड़कर चिकित्सा की ओर भाग रहे हैं और एक्ट के खिलाफ काम कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में ही बनारस जिले से 20 किलोमीटर दूर शांहशाहपुर गाँव में रहने वाले अनिल कुमार सिंह ने चार महीने पहले अपनी देसी गाय का कृत्रिम गर्भाधान (एआई) कराने के लिए प्राइवेट डॉक्टर को बुलाया था। खराब सीमन चढ़ने से गाय का यूट्रेस भी खराब हो गया वह अब दूध के काबिल नहीं बची। जो अस्पताल है वहां डॉक्टर बैठते ही नहीं है 2500 रूपए खर्च कर चुके है पर गाय नहीं रूकी।" अनिल ने गाँव कनेक्शन को बताया, "सरकारी अस्पताल में सीमन चढ़वाने में 30 रुपए का खर्चा आता है और प्राइवेट डॉक्टर 200 रुपए ले लेते है और कोई गारंटी भी होती है कि पशु रूकेगा या नहीं।"

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उत्तर प्रदेश पशुपालन विभाग की वेबसाइट से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 2,200 पशुचिकित्सालय 2,575 पशुसेवा केंद्र और 5,043 कृत्रिम गर्भाधान केंद्र है। राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार देश में 5000 पशुओं पर एक पशुचिकित्सालय स्थापित होना चाहिए लेकिन उत्तर प्रदेश में 21 हज़ार पशुओं पर एक ही पशु चिकित्सालय उपलब्ध है। ऐसे में पशुओं के इलाज के पशुपालकों को दूर-दूर जाना पड़ता है। पशुचिकित्सक और पशु अस्पतालों के अभाव में उनकी मृत्यु भी हो जाती है।

गाँव कनेक्शन फाउंडेशन का प्रयास

गाँव कनेक्शन फाउंडेशनने जिन-जिन गाँवों में सर्वे में कराया था उसमे से लखनऊ जिले के बीकेटी ब्लॉक के (कुनौरा, गदेला, मुसपिपरी) तीन गाँवों में पशुओं के खुरपका- मुहंपका टीकाकरण कराया गया है।


खुरपका और मुंहपका एक संक्रामक रोग है जो विषाणु से फैलता है ,जिससे सबसे ज्यादा पशु प्रभावित होते है। इस बीमारी से ग्रसित पशुओं का दुग्ध उत्पादन काफी कम हो जाता है। इस बीमारी का टीका पशुओं को जरूर लगवाना चाहिए क्योंकि यह बीमारी एक पशु से दुसरे पशुओं में बहुत जल्दी फैलती है। टीकाकरण कराते समय इस बात का ध्यान रखें कि आठ महीने से अधिक गर्भधारण किए पशुओं का टीकाकरण न कराएं और चार माह से छोटे पशुओं के बच्चों को टीका न लगवाएं। सरकार द्धारा यह टीका निशुल्क लगाया जाता है। अगर किसी के गाँव में टीकाकरण न हुआ हो तो अपने पशु चिकित्सालय में संपर्क करें।





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