असिंचित क्षेत्रों में जौ की खेती है फायदेमंद

vineet bajpaivineet bajpai   16 Nov 2015 5:30 AM GMT

असिंचित क्षेत्रों में जौ की खेती है फायदेमंद

सिंचाई और ऊर्वरक के सीमित साधन एवं असिंचित दशा में जौ की खेती गेहूं के मुकाबले अधिक लाभदायक होती हैअसिंचित, पछेती व उसरीली भूमि में जौ की खेती के बारे में जानकारी इस संकलन में दी जा रही है।

खेत की तैयारी 

देशी हल या हैरो से दो-तीन जुताई करके खेत तैयार कर लेना चाहिए।

बोने का समय 

जौ की बुवाई नवम्बर के अन्तिम सप्ताह तक पूरी कर लें। पछेती जौ की बुवाई दिसम्बर के मध्य तक पूरी कर लें।

जौ की प्रजातियां

ज्योति (क.572/10), आजाद (के-125), के-141, हरितमा (के-560), प्रीती (के-409), जागृति (के-287)

बीज की मात्रा 

असिंचित दशा में 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर जौ की बुआई, सिंचित दशा में 75 किग्रा प्रति हेक्टेयर व पछेती बुआई में 100 किग्रा प्रति हेक्टेयर जौ की बुआई करनी चाहिए।

बुवाई की विधि 

बीज हल के पीछे लाइन से 23 सेमी की दूरी पर पांच से छह सेमी गहराई में बोएं। असिंचित दशा में बुवाई छह से आठ सेमी गहराई में करें, जिससे जमाव के लिए पर्याप्त नमी मिल सके।

ऊर्वरक का प्रयोग

-असिंचित 

प्रति हेक्टेयर 40 किग्रा नत्रजन 20 किग्रा फास्फेट तथा 20 किग्रा पोटाश को बुवाई के समय लाइन से बीज के नीचे डालें।

-ऊसर तथा विलंब से बुवाई की दशा में

प्रति हेक्टेयर 30 किग्रा नत्रजन तथा 20 किग्रा फास्फेट बुवाई के समय लाइन में बीज के नीचे करें। बाद में 30 किग्रा नत्रजन का छिड़काव पहली सिंचाई के बाद करें। उसरीली भूमि में 20-25 किग्रा प्रति हेक्टेयर जिंक सल्फेट का प्रयोग करें।

-सिंचाई 

पहली सिंचाई, कल्ले निकलते समय बुवाई के 30-35 दिनों बाद व दूसरी सिंचाई तब करें जब फसल में दाना बनने लगे। ऊसर भूमि में तीन सिंचाई करनी पड़ती हैं। पहली सिंचाई कल्ले निकलते समय, दूसरी सिंचाई गांठ बनते समय और तीसरी सिंचाई दाना पड़ते समय करनी चाहिए।

संकलन : विनीत बाजपेई

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