बाढ़ या सूखा दोनों ही क्षेत्रों के लिए नींबू घास बेहतर विकल्प

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लखनऊ। नींबू घास की खेती का ये सही समय है, इसकी खेती का सबसे बड़ा फायदा ये है कि इस पर न तो बाढ़ का असर होता है और न ही सूखे का। पारंपरिक खेती के मुकाबले में औषधीय फसलों की खेती ज्यादा मुनाफा देती है। इसे जंगली सुअर और नील गाय जैसे जंगली जानवर भी इसे नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।

लेमन ग्रास की एक बार बुवाई करने के बाद पांच साल तक इससे उत्पादन मिलता है। पहली बार नींबू घास 120 दिन में कटाई के लायक हो जाती है। इसके बाद 55 से 70 दिनों के भीतर घास तैयार हो जाएगी। एक एकड़ में 2000 पौधे उगाए जा सकते हैं।

केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध संस्थान (सीमैप) नींबू घास के प्रोत्साहन के लिए किसानों की मदद करती है और उन्हें पौध भी उपलब्ध कराता है। सीमैप के वैज्ञानिक डॉ. संजय कुमार बताते हैं, ''नींबू घास की फसल ऊसर जमीन में भी तैयार हो जाती है, एक बार लगाने पर चार-पांच साल तक कटाई हो सकती है।'' वो आगे कहते हैं, ''किसान औषधीय पौधों की खेती इसलिए भी कर रहे हैं, क्योंकि पारंपरिक खेती में नुकसान होने का खतरा ज्यादा है।''

सीमैप ने नींबू घास की नई किस्म इजाद की है जो अधिक उत्पादन देती है। डॉ. संजय कुमार ने नींबू घास की नई प्रजाति सिम शिखर के बारे में बताया, ''अभी तक किसान सीमैप की पंद्रह साल पुरानी किस्म कृष्णा ही लगाते आए हैं, सिम शिखर से दूसरी प्रजातियों के तुलना में 20 से 30 प्रतिशत ज्यादा तेल निकलेगा और प्रति हेक्टेयर 20 से 25 प्रतिशत लागत भी कम आती है।” सुलतानपुर जि़ले के जयसिंहपुर गाँव के किसान दिलीप यादव (45 वर्ष) सीमैप से नींबू घास की नई किस्म सिम शिखर की पौध ले गए थे। दिलीप यादव कहते हैं, ''पिछले दो वर्षों से नींबू घास की खेती कर रहा हूं, इस बार सिम शिखर की नर्सरी लगाई है, इसकी भी खेती करुंगा।''

एक एकड़ में नींबू घास की खेती से हर वर्ष 80 किलोग्राम तेल की निकलता है। नींबू घास के तेल की कीमत लगभग 750 रुपए प्रति किलोग्राम होती है। नींबू घास की पैदावार में पानी की जरूरत काफी कम होती है और जुलाई का मौसम इन औषधीय पौधों के रोपण के लिए सबसे अच्छा होता है।

नींबू घास की रोपाई- वर्षा प्रांरभ होने पर जुलाई में रोपाई करनी चाहिए। सिंचित दशा में रोपाई फरवरी मार्च में करनी चाहिए। 

रोपाई की दूरी व विधि-  कतारों में 50 सेमी से अंतर 75 सेमी और 30 से 40 सेमी पौधे के बीच अंतर रखे। जड़दार कल्लों को पांच से आठ सेमी गहराई तक रोपे तथा अच्छी तरह दबा दें। अधिक गहराई पर लगने से जड़ें सड़ जाती है। रोपने के तुरन्त बाद वर्षा न हो तो सिंचाई करें।

निराई-गुड़ाई-- इससे उपज और मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। साल में दो से तीन बार गुड़ाई करनी चाहिए।

सिंचाई-- इस फसल को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन अधिक उत्पादन लेने हेतु शुष्क मौसम में सिंचाई करना आवश्यक है। प्रत्येक कटाई के बाद एक सिंचाई अवश्य कर लें। फसल को सतह से 10 से 15 सेमी. ऊपर काटा जाता है। ग्रीष्म काल में 15 दिन के अंतर से सिंचाई करें।

कटाई-- पहली कटाई तीन महीने बाद की जाती है। इसके बाद दो से ढ़ाई महीने में कटाई की जाती है। मिट्टी के उपजाऊपन और उर्वरक की मात्रा के आधार पर कटाई की संख्या बढ़ जाती है। उसके बाद में प्रत्येक वर्ष में चार कटाई की जाती है। असिंचित दशा में ग्रीष्मकाल में कटाई नहीं ली जा सकती है।

उपज-- हरी घास का उपयोग तेल निकालने में होता है। पत्ती तना और पुष्प क्रम में तेल पाया जाता है। इसलिए पूरा ऊपरी भाग आसवन के लिए उपयोगी होता है। लगभग 10 से 25 टन प्रति हेक्टेयर हरीघास पैदा होती है, जिससे 60 से 80 किग्रा प्रति हेक्टेयर मिलता है।

प्रयोग-- नींबू घास का प्रयोग सौंदर्य प्रसाधन, इत्र और तेल बनाने में प्रयोग होता है।

स्वयं प्रोजेक्ट डेस्क

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