बाल मजदूरी छोड़ बच्चों ने पकड़ी स्कूल की डगर

बाल मजदूरी छोड़ बच्चों ने पकड़ी स्कूल की डगर

मेरठ। जिस उम्र में बच्चे बेपरवाह रहते हैं उसी उम्र में एक लड़की ने न केवल बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज उठायी, बल्कि अपने गाँव के बच्चों को स्कूल तक भी पहुंचाया, आज उनके गाँव के सभी बच्चे स्कूल जाते हैं।

मेरठ जि़ले के जानी ब्लॉक के सिसोला गाँव की बीना पवार (19 वर्ष) खुद एक गरीब परिवार से हैं। मेरठ जिले में ज्यादातर गाँवों में फुटबॉल, बैट जैसे खेल के सामान बनते हैं और इसे बनाने वाले ज्यादातर बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते हैं। बीना के पिता शेर खान मजदूरी करते हैं। बीना ने अब तक सैकड़ों बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्ति दिलायी। बीना बच्चों के लिए अपने घर पर अतिरिक्त कक्षाएं भी चलाती हैं।

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बीना बचपन में खुद भी दूसरे बच्चों के साथ फुटबॉल सिलने का काम करती थीं। बीना बताती हैं, ''हमारे गाँव के सभी बच्चे स्कूल न जाकर अपने घर पर ही फुटबॉल बनाते थे, मैं जब सातवीं में पहुंची तो मेरे पापा ने मेरा दाखिला गाँव के पास ही प्राइवेट स्कूल में करा दिया। तब मुझे लगा कि मेरी तरह ही और लोगों को पढ़ना चाहिए। मैंने उसी समय सोच लिया कि मुझे इनके लिए कुछ करना है, मैंने बच्चों को बुलाकर अपने घर पर ही पढ़ाना शुरू किया।

ये नहीं था कि बीना के लिए राह आसान थी, मुस्लिम बाहुल्य उनके गाँव में उनका विरोध भी हुआ। लोग कहते कि खुद ही बच्ची हो और दूसरों के लिए क्या करोगी। इसके बाद बीना ने गाँव में ऐसे परिवारों को जागरुक करना शुरू कर दिया, जिनके बच्चे स्कूल जाने के बजाय बाल मजदूरी करते थे। शुरू में बीना को अपनी मंजिल तक पहुंचने में काफी परेशानी आयी, लेकिन उसने हर चुनौती का डटकर मुकाबला किया और लम्बे संघर्ष के बाद उसने अपने गाँव के ज्यादातर बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्ति दिला दी।

बीना कहती हैं, पहले कुछ सालों तक लोगों ने नहीं समझा और जब नौवीं में पहुंची तो मैं घर-घर जाकर बच्चों के घरवालों को समझाना शुरु किया। मैंने गाँव में एक स्कूल खोल लिया और बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने लगी। अब हमारे गाँव के सभी बच्चे गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते हैं।

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बीना अपनी पढ़ाई के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी लगी रही, लेकिन उसने अपने कार्यों को पढ़ाई में आड़े नहीं आने दिया। इस वर्ष बीना ने एम.ए. में दाखिला लिया है।

बीना के पिता शेर खान अपनी बेटी के काम से खुश होते हैं। शेर खान कहते हैं, ''जब बीना ने कहा तो हमें भी लगा कि बचपन में बच्चों से काम करवाना ठीक नहीं, हम बीना का पूरा साथ देते हैं, हमारे गाँव में ऐसा माहौल नहीं है कि लड़कियां काम करें। लोग अभी भी कहते हैं कि लड़की को छूट दे रखी है, अकेली गाँव में घूमती रहती है, लेकिन हमें अपनी लड़की पर पूरा भरोसा है।"

सिसोला गाँव की ही अर्शी (10 वर्ष) इस बार सातवीं कक्षा में हैं, घर में पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी हैं, पिता की मौत के बाद सभी फुटबॉल बनाने का काम करते हैं। अर्शी ने स्कूल जाना भी छोड़ दिया था। अर्शी बताती हैं, हमने पढ़ायी छोड़ दी थी, लेकिन दीदी ने कहा कि पढ़ायी के साथ काम भी कर सकती हो, अब हम पढ़ायी के साथ काम भी करते हैं।

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