बाराबंकी में पेश की गई हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मुस्लिमों ने देवी के भक्तों के लिए लगाए लंगर 

बाराबंकी में पेश की गई हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल, मुस्लिमों ने देवी के भक्तों के लिए लगाए लंगर बाराबंकी के रसौली कस्बे में मूर्ति विसर्जन के जुलूस में शामिल मुस्लिम समुदाय के लोग। फोटो- सतीश कश्यप

सतीश कश्यप

बाराबंकी। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की अनोखी मिसाल पेश की गई है। पिछले वर्ष जिस कस्बे में नवरात्र और मुहर्रम के दौरान तनाव के चलते पुलिस और पीएसी तैनात करनी पड़ी थी, वहां इस बार हिंदू परिवार मेंहदी के जुलूस में शामिल तो मुस्लिम समाज मूर्ति विसर्जन में हिंदुओं का भागीदार बना।

बाराबंकी जिला मुख्यालय मात्र 3 किलोमीटर दूर लखनऊ-फैजाबाद हाईवे के पास बसे मुस्लिम बाहूल्य रसौली कस्बे में सैकड़ों मुस्लिम परिवार दुर्गा प्रतिमा विसर्जन में शामिल हुए। मुस्लिम समाज ने न सिर्फ देवी के भक्तों के लिए जगह-जगह लंगर लगवाकर फल बांटे बल्कि मस्जिद के मौलाना समेत सैकड़ों मुस्लिम दुर्गा और भगवान गणेश की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर विसर्जन कराने भी ले गए।

विसर्जन के लिए गणेश की प्रतिमा ले जाते मस्जिद के मौलाना और दोनों धर्मों के लोग।

गाँव के ग्राम प्रधान प्रतिनिधि मुकर्रम अली खुशी का इजहार करते हुए कहते हैं, “ हम नहीं चाहते लोग हिंदु-मुस्लिम की संख्या के आधार पर जाने जाए, अच्छा होगा कि मेरा गांव इंसानियत के नाम पर जाना जाए। हम सब लोग मिलकर कोशिश कर रहे हैं कि सभी त्यौहार एक साथ मिलकर बनाए जाएं।” वो आगे बताते हैं, “हमने मन से दुर्गे मां की प्रतिमा का स्वागत किया है। ये अगर पूरे देश में हो तो आधी समस्या खत्म हो जाएगी।”

हम लोगों ने मन से दुर्गा प्रतिमाओं का स्वागत किया है। आगे भी हम लोग त्योहार मिलकर मनाएंगे। ये अगर पूरे देश में हो तो आधी समस्या खत्म हो जाएगी।
मुकर्रम अली, प्रधान प्रतिनिधि, रसौली, बाराबंकी

यहां पर पहल दोनों धर्मों के लोगों की तरफ से हुई। पिछले वर्ष दशहरा के दौरान हुए विवाद से सबक लेते हुए श्री दुर्गा पूजा समिति और मिल्लत इस्लामिया कमेटी और मुस्लिम एहतियात कमेटी ने मिलकर सौहार्द की नई इबारत लिखी। श्रीदुर्गा पूजा समिति के आयोजक प्रवीन कुमार गुप्ता बताते हैं, '' पहले यहां छोटी-छोटी बातों को लेकर हिन्दू-मुस्लिम में टेंशन हो जाती थी। पिछले वर्ष हुए विवाद के बाद हम सब ने सोचा कि हमारे पुरखे हमें क्या देकर उस पर सोचने के बजाए हम देखें कि हम आने वाली पीढ़ियों को क्या देकर जाएंगे। इसीलिए हम लोगों ने आपस में मिलकर त्यौहार मनाने की शुरुआत की। दो दिन पहले हमने और हमारी समिति के लोगों ने मुस्लिम भाइयों के मेंहदी के जुलूस का रात के करीब 2 बजे स्वागत किया और उसमें शामिल हुए तो मूर्ति विसर्जन के दौरान मुस्मिल भाई आगे बढ़कर हमारे त्यौहार में शामिल हुए।”

आपसी सौहार्द के लिए पुलिस-प्रशासन की पहल भी काम आई। त्यौहार के 25-30 दिन पहले से पुलिस ने शांति समिति की बैठकों करानी शुरु कर दी थीं। जहां विवाद हो सकता है वहां एहतियात बरते गया। बाराबंकी पुलिस अधीक्षक राजू बाबू सिंह बताते हैं, “रसौली में जो हुआ वह एक सराहनीय पहल है। हम लोगों ने पूरे जिले में लगभग हर बड़ी मूर्ति और मोहर्रम के जुलूस वाले स्थानों की पहचान की थी। जहां टेंशन की आशंका थी वहां शुरु से एहतियात बरता गया। दोनों समुदायों के लोगों के साथ बैठकें हुईं।”

हम लोगों ने जिले में लगभग हर बड़ी मूर्ति और मोहर्रम के जुलूस वाले स्थानों की पहचान की थी। दोनों समुदायों के लोगों के साथ बैठकें की। पुलिस तैनात की गई, जहां फोर्स कम पड़ी समाज के ही 4 लोगों को निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी। यही वजह है कि जिले में सब ठीक रहा।
राजू बाबू सिंह, पुलिस अधीक्षक, बाराबंकी

फोन पर आगे वो बताते हैं, “आप ये समझ लीजिए हर चिन्हित स्थान पर पुलिस और प्रशासन की तरफ से लेखपाल और पंचायत सचिव आदि को जिम्मेदारी दी गई थी। जहां फोर्स कम पड़ी वहां हमने समाज के ही चार लोगों को निगरानी की जिम्मेदारी सौंपी। मौके पर जाकर और फोन के माध्यम से लगातार वार्ता की गई। यही वजह है कि जिले में न सब सुकून से रहा बल्कि दूसरों के सामने एक नजीर पेश हुई।”

रसौली मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है अक्सर यहाँ जब चुनाव आता था तो अतिसंवेदनसील घोषित किया जाता था। लेकिन मंगलवार को जो यहा हुए उसकी चौतरफा तारीफ हो रही है। वर्ना यहां हर त्यौहार में पीएससी तैनात करनी पड़ती थी। कई बार दोनों पक्षों में मुकदमें बाजी भी हो चुकी है।

गाँव के इसरार अली कहते हैं, ' मिल्लत इस्लामिया कमेटी और मुस्लिम एहतियात कमेटी हिन्दू मुस्लिम भाईचारा यहां कायम रखेगी। अल्लाह से दुआ करते हैं कि ये तस्वीर बाराबंकी ही नहीं पूरे देश के लिए एक मिशाल बने।” उन्होंने एक शेर सुनाते हुए पाकिस्तान को भी जवाब दिया। “ये गीता के आमिल है, हम कुरान वाले लेकिन दुश्मन की खातिर हम हिंदुस्तान वाले हैं ।'' रसौली में 13 मस्जिदे और 6 मंदिर हैं। इस बार गांव के लोगों ने प्रण भी लिया है अगर अब किसी ने दोनों धर्मों के बीच दीवार बनने या फिर द्वेश फैलाने की कोशिश की तो उसका बहिष्कार किया जाएगा।



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