कान्वेंट स्कूलों को टक्कर दे रही ये सरकारी पाठशाला, जानिए कैसे है दूसरों से अलग

कान्वेंट स्कूलों को टक्कर दे रही ये सरकारी पाठशाला, जानिए कैसे है दूसरों से अलगये है फ़ैजाबाद जिले के उसरू गांव का प्राइमरी मॉडल इंग्लिश स्कूल

लखनऊ। इस अध्यापिका ने अपने जुझारूपन से इस सरकारी स्कूल को ऐसा बना दिया है जिसको पहली नजर में देखने पर आपके लिए ये यकीन करना मुश्किल होगा कि ये सरकारी स्कूल ही है। यहां पर पढ़ने वाले बच्चे तीन से चार महीने में अपना पूरा परिचय और जरूरत की चीजें कान्वेंट स्कूल के बच्चों की तरह अंग्रेजी में बोलने लगते हैं।

फैजाबाद जिलामुख्यालय के मसौधा ब्लॉक के उसरू गांव का प्राइमरी स्कूल माडल इंग्लिश स्कूल के नाम से जाना जाता है। पिछली सरकार ने प्रदेश के हर जिले में दो इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलने की मुहिम शुरू की थी। उसी क्रम में अप्रैल 2015 में उसरू के इस प्राथमिक स्कूल को इंग्लिश मीडियम स्कूल का दर्जा मिला।

इस स्कूल की प्रधानाध्यापिका रितु जमाल गांव कनेक्शन को फोन पर बताती हैं, “मेरी हमेशा से ये इच्छा रही है सरकारी स्कूल में बच्चे भेजने वाले पैरेंट्स को कभी ये अफ़सोस न रहे कि उनके पास पैसे नहीं हैं इस वजह से वो मजबूरी में अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजतें हैं, सरकारी स्कूल में वो अपने बच्चों को भेजकर मजबूरी न समझे बल्कि उनके बच्चे को कान्वेंट स्कूल जैसी शिक्षा मिल रही है ऐसा विश्वास करें।”

वो आगे बताती हैं, “हमारे स्कूल के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं ऐसा तो हम नहीं कह सकते लेकिन इतना जरुर कहेंगे कि वो अपने परिचय से लेकर सामान्य आम बोलचाल की अंग्रेजी बखूबी बोल लेते हैं, इनमे अंग्रेजी भाषा की इतनी समझ है कि किसी कान्वेंट स्कूल के बच्चे से बात करने में पीछे नहीं रहते हैं।”

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इस स्कूल में कुछ इस ढंग से होती है पढ़ाई

खंड शिक्षा अधिकारी उदय भानु यादव बताते हैं, “इस स्कूल के बच्चों से सवाल पूंछने पर बहुत ही संतोषजनक जबाब मिलता है, शिक्षिका का प्रयास बहुत ही सराहनीय है और सभी के लिए एक उदहारण भी हैं। अगर विद्यालय के शिक्षक चाह ले तो स्कूल की तस्वीर बदलने में समय न लगे, इस स्कूल की तरह उनकी भी गिनती माडल स्कूल की तरह होने लगे।”

रितु जमाल का ग्रामीण परिवेश से कभी कोई कनेक्शन नहीं रहा। मूल रूप से बैंगलोर की रहने वाली रितु की पढ़ाई हमेशा बड़े शहरों में हुई और इन्होने बड़े कान्वेंट स्कूलों में ही पढ़ाया। जब साल 2006 में इनका सलेक्शन सरकारी स्कूल के प्राथमिक पाठशाला में हुआ तब इन्होने पहली बार गाँव देखा।

रितु जमाल बताती है, “बच्चे पढ़ाई के लिए इस ढंग से आते हैं ये मैंने पहली बार देखा था, कोई बिना चप्पल पहने, शर्ट की बटने खुली हुई, बच्चे बिना कंघी किये हुए स्कूल आ जाते थे, मैंने इससे पहले बच्चों को कभी इस ढंग से स्कूल आते नहीं देखा था।” रितु जिस परिवेश से आयीं थी उनके लिए इस प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाना बहुत मुश्किल था। एक दिन विद्यालय की प्रधानाध्यापिका ने रितु से कहा कि तुम्हे वापस शहर लौट जाना चाहिए इन बच्चों को पढ़ाना तुम्हारे बस की बात नहीं, रितु को उनकी ये बात परेशान करने लगी, तभी उन्होंने ठान लिया कि कुछ भी हो जाए अब वो वापस तो नहीं जायेंगी। रितु ने इस कड़ी चुनौती को स्वीकार किया, बंगाली भाषा इन्हें आती थी इन्होने अवधी पांच से छह महीने में सीखी।

बच्चे हर दिन ड्रेस और टाई-बैल्ट बैच लगाकर आते हैं

साल 2011 में रितु का ट्रांसफर मिल्कीपुर स्कूल में हो गया जहाँ सिर्फ नईबिल्डिंग थी पूरा स्कूल इन्हें ही चलाना था। रितु बताती हैं, “इस स्कूल में मुझे सबकुछ खुद ही करना था, तीन साल में ये स्कूल माडल स्कूल बन गया, इससे हमारा उत्साह बढ़ा। ढाई साल पहले हमारा सलेक्शन उसरू इंग्लिश मीडियम स्कूल में हो गया, आज ये भी माडल स्कूल बन गया है।”

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शहर के बीचोबीच में उसरू स्कूल बना है जहाँ पर बच्चों को स्कूल लाना बहुत बड़ी चुनौती है। जब रितु का यहाँ सलेक्शन हुआ था उस समय 20-25 बच्चे ही स्कूल आते थे आज 130 बच्चे हैं। प्रतिदिन 95 फीसदी बच्चे स्कूल जरुर आते हैं। इस स्कूल में अब बच्चों को भेजने से माता-पिता झिझकते नहीं है सिर्फ गरीब परिवार ही नहीं बल्कि अच्छे घरों के भी बच्चे इसमे पढने आते हैं।

बच्चे खेल-खेल में में करते हैं पढ़ाई

ये हैं स्कूल की विशेषताएं

इस स्कूल में कोर्स को बहुत ज्यादा रटाने का प्रयास नहीं किया जाता है। रोचक ढंग से पढ़ाई को आसान किया जाए इसके लिए कई तरह की गतिविधियाँ कराईं जाती हैं। बच्चे शनिवार को बैग लेकर नहीं आते हैं, शनिवार को ‘नो बैग डे’ रहता है जिससे बच्चे खुलकर अपने मन की बात कर पायें। बच्चे वेस्ट मटेरियल से उपयोगी वस्तुएं बनाते हैं। समय-समय पर सांस्कृतिक गतिविधियां करायीं जाती हैं, यहाँ सभी त्योहार भी मनाये जाते हैं। बच्चे फर्नीचर पर बैठते हैं, पूरी ड्रेस से लेकर आई कार्ड तक बच्चे लगाकर आते हैं। ये बच्चे समय-समय पर कान्वेंट स्कूल में विजिट करने जाते हैं।

रितु जमाल का कहना है, “आज स्कूल में जितनी भी सुविधाएँ हैं वो आस-पास के लोगों के सहयोग से सम्भव हो पायी हैं, स्कूल में जो भी विजिट करने आता है कुछ न कुछ योगदान देकर ही जाता है, स्कूल में बच्चों के लिए लाइब्रेरी से लेकर खेलकूद की सभी सुविधाएँ मौजूद हैं।”

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