अनाज बैंक : महिलाओं का अपना बैंक जहां उन्हें कर्ज में पैसा नहीं अनाज मिलता है

यह एक ऐसा बैंक हैं जहां पैसों का नहीं अनाज का लेन देन होता है। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं द्वारा संचालित ये 'अनाज बैंक' गरीबों के लिए मददगार साबित हो रहे हैं।

Neetu SinghNeetu Singh   16 March 2021 5:21 PM GMT

शिवराजपुर (कानपुर)। छब्बा निवादा गांव की 65 वर्षीय सरोज देवी के लिए दिसंबर का महीना मुश्किल भरा था। मजदूरी करने वाले तीन बेटों और पति को पूरा काम नहीं मिल पा रहा था, सरकार से मिलने वाला मुफ्त राशन मिलना बंद हो चुका था। घर में खाने की किल्लत ना हो इसलिए वो अपने समूह के अनाज बैंक से 2 क्विंटल गेहूं उधार ले आईं थी।

"मैंने दो महीने पहले ही दो क्विंटल (0.2 मिट्रिक टन) गेहूं उधार लिया है। मेरे पास डेढ़ बीघा ही खेती है, इतना पैदा नहीं होता कि साल भर गेहूं चलता रहे। पहले राशन का इंतजाम करना मुश्किल काम होता था, लेकिन अनाज बैंक खुलने से अनाज की दिक्कत कम हो गई है," सरोज देवी ने बताया।

सरोज देवी का गांव दिल्ली से 500 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश में कानपुर जिले के शिवराजपुर ब्लॉक में है। उनके परिवार के पास कुल डेढ़ बीघा (0.32 हेक्टेयर) जमीन है और खाने वाले 12 लोग हैं। पति खेतिहर मजदूर हैं तो तीनों बेटे, जो काम मिल जाता है कर लेते हैं। कुल मिलाकर इतनी ही कमाई हो पाती है कि परिवार किसी तरह चल जाए।

छब्बा निवादा गाँव में समूह में बैठकर बात करती महिलाएं. फोटो : नीतू सिंह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में कहा था कि 86 फीसदी किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है। सरोज देवी जैसे तमाम परिवारों के घरों में अक्सर गेहूं की नई फसल तैयार होने से पहले ही गेहूं खत्म हो जाता है। ये लोग बाजार से खरीदकर या फिर गांव के सम्पन्न लोगों के यहां से अनाज उधार लेकर आते थे। कई जगहों पर संचालित सहकारी समितियों से भी ग्रामीण गेहूं ले लेते हैं, जैसे सरोज देवी के इलाके में होता था। हालांकि यहां से गेहूं लाना भी कम मुश्किल काम नहीं होता था। लेकिन स्वयं सहायता समूहों के जरिए बने महिलाओं की अनाज बैंकों ने ऐसे तमाम गरीब परिवारों की दो वक्त की रोटी की मुश्किल आसान की है।

गांव कनेक्शन की टीम मार्च के दूसरे हप्ते में जब छब्बा निवादा गांव पहुंची तो एक घर में छह महिलाओं की बैठक चल रही थी। जिसमें तीन वो महिलाएं थीं जो अनाज बैंक का संचालन करती हैं और तीन वो जिन्हें इस अनाज बैंक से लाभ मिला है। इस बैठक में तय किया गया था कि अगर कोरोना पूरी तरह खत्म न हुआ तो इस बार ज्यादा गेहूं का भंडारण करेंगी। ताकि लॉकडाउन की तरह जरुरत पड़ने पर लोगों की मदद की जा सके।

अनाज बैंक महिलाओं का एक साझा प्रयास है, जिसमें महिलाएं अपने घरों से 2-3 किलो अनाज जुटाकर कुछ अंशदान करती हैं और अनाज का बड़ा हिस्सा उन्हें किसी संस्था से दान में मिल जाता है। शुरुआत संस्था के सहयोग से होती है पर महिलाओं की भागीदारी रहती है, बाद में महिलाएं इसे संचालित करती हैं। समूह की महिलाएं जरुरत पड़ने पर अनाज ले जाती हैं औऱ फसल कटने पर ब्याज समेत वापस कर जाती है। इस अनाज को रखने के लिए बखारी (स्टोरेज टैंक) भी संस्था देती है।

तारावती नाम की ये महिला अनाज बैंक का संचालन करती है. फोटो : नीतू सिंह

छब्बा निवादा को मिलाकर पूरे शिवराजपुर ब्लॉक में 48 अनाज बैंक संचालित हैं। छब्बा निवादा में अनाज बैंक की शुरुआती कहानी बैंक की संचालिका रामकुमारी बताती हैं, "जब हम लोग समूह में बैठने लगे तो एक बात समझ आई कि ज्यादातर महिलाओं के यहां इतना अनाज पैदा नहीं होता कि सालभर खा सके। नवंबर-दिसंबर से मार्च-अप्रैल तक गेहूं ज्यादातर घरों में खत्म हो जाता है। अनाज के लिए महिलाएं भटके न इसके लिए ऐसे क्या प्रयास किये जाएं? ये बात श्रमिक भारती से जुड़े अधिकारियों के सामने रखी गयी। और फिर अनाज बैंक का जन्म हुआ।"

श्रमिक भारती एक गैर सरकारी सस्था हैं जो 1986 से ग्रामीण स्तर पर महिलाओं के सशक्तिकरण, महिला स्वयं सहायता समूह, जैविक खेती को बढ़ावा और स्वच्छता पर काम कर रही है। कानपुर समेत यूपी के छह जिलों कानपुर देहात, भदोही, चंदौली, फतेहपुर और बाराबंकी में 223 अनाज बैंक संचालित हो रहे हैं। इन अनाज बैंकों की शुरुआत वर्ष 2016 में गेहूं से हुई थी, अभी महिलाएं इन अनाज बैंकों में चावल, दाल और तेल भी रख रही हैं। इस संस्था के अलावा भी देश के दूसरे कई गैर सरकारी संगठन भी अपने-अपने स्तर पर इस तरह की अनाज बैंकों का संचालन कर रहे हैं।

श्रमिक भारती से जुड़े कृषि विशेषज्ञ राणा सिंह परिहार बताते हैं, "अनाज बैंक शुरू करने के पीछे की सोच यह थी कि जो छोटी जोत के किसान हैं उन्हें अनाज के लिए ज्यादा भटकना न पड़े। अगर ये किसान गेहूं जिला सहकारी समिति से उधार लेते थे तो इन्हें दूसरे गाँव जाना पड़ता था, इनका पूरा दिन बर्बाद और पैसे भी खर्च होते थे।"

गीता देवी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी की सदस्य और अनाज बैंक की संचालिका हैं.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में इसी संस्था से जुड़े जिला कोऑर्डिनेटर नरेंद्र त्रिपाठी बताते हैं, "गांवों में एक तबका बेहद गरीब है, जो भूमिहीन अथवा बेहद कम जोत का मालिक है, इऩके यहां आज भी जब राशन आता है तब चूल्हा चलता है। अनाज उधार लेने की परंपरा पहले भी रही है लेकिन अनाज उधार लेना सम्मान से जुड़ा मामला भी है, किसे अच्छा लगता है गेहूं-चावल उधार लेने जाए। अब अनाज बैंक बनने से क्या हुआ कि महिलाएं बिना किसी को बताए ले जाती हैं, उनका आत्मसम्मान सुरक्षित रहता है और दूसरा वो जो ब्याज में समूह को वापस करती हैं उसका लाभ भी उन्हें ही मिलता है।"

नरेंद्र त्रिपाठी ये भी बताते हैं कि लॉकाडाउन के दौरान प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत लोगों को मुफ्त में राशन मिला है, उसके चलते इस बार लोगों ने अनाज बैंकों से कम राशन लिया था।

समूह में अगर कोई महिला एक क्विंटल अनाज ले जाती है तो चार से पांच महीने में जब फसल कटती है वो एक क्विंटल 25 किलो गेहूं वापस करती है। ब्याज आने पर अनाज बैंक चाहे तो बाकी गेहूं बेचकर दूसरे कामों में लगाए या ब्याज के पैसे आपस में बांट सकता है।

गीता के गाँव छब्बा निवादा में पांच स्वयं सहायता समूह चलते हैं और हर समूह के पास एक अनाज बैंक है। इन पाँचों समूहों में से हर समूह की एक महिला अनाज बैंक का संचालन करती है।

राणा सिंह परिहार बताते हैं, "एक अनाज बैंक में एक बखारी (कंटेनर) और साढ़े तीन क्विंटल गेहूं एक समूह को परियोजना द्वारा दिया जाता है। फसल कटने पर एक क्विंटल गेहूं उस समूह की महिलाएं देती (अंशदान) हैं जिन्हें बखारी दी जाती है। उधार गेहूं देने पर हर साल ब्याज का जो गेहूं आता है वो इन बैंकों में बढ़ता जाता है।"

स्वयं सहायता समूह की महिलाएं जैविक खाद और कीटनाशक दवाइयां खुद ही बनाती हैं और जैविक तरीके से खेती करती हैं. फोटो : नीतू सिंह

लॉकडाउन में अनाज बैंक हुए मददगार

पिछले मार्च महीने में कोविड-19 के चलते अचानक से लॉकडाउन लगा उस समय इन अनाज बैंकों में जमा अनाज को यहाँ की महिलाओं ने घर में लगी चक्की में पीसकर उन लोगों तक पहुंचाया जिन्हें खाने में मुश्किलें आ रही थीं। गीता के यहां एक सोलर आटा चक्की भी लगी है।

एक अऩ्य अनाज बैंक की संचालिका तारावती (54 वर्ष) अपने घर में रखी बखारी की तरफ इशारा करते हुए बोलीं, "लॉकडाउन में ही गेहूं की कटाई चल रही थी तब हम लोगों ने अपनी अनाज बैंकों में ज्यादा गेहूं भर लिया। हम महिलाओं ने मिलकर आटा, चावल, दाल और तेल सबकी किट बनाकर श्रमिक भारती को दिया। यहाँ से ये सामान उन लोगों को पहुंचाया गया जो जरुरतमंद थे।"

महिलाओं के मुताबिक हमारे इन अनाज बैंकों ने लॉकडाउन के दौरान शहरों से गांवों को लौटे लोगों की मदद की थी।

गेहूं की फसल कटने पर समूह की महिलाएं अपने-अपने घर से थोड़ा-थोड़ा अनाज इस बैंक में जमा करती हैं.

एक समूह की अध्यक्ष 60 वर्षीय रामदेवी बताती हैं, "वैसे तो अनाज बैंक से समूह से जुड़ी महिलाओ को ही राशन मिलता है लेकिन कोरोना में समूह की सभी महिलाओं की सहमति से हमने उन लोगों को भी अनाज और राशन दिया जो समूह से नहीं जुड़ी हैं।"

अनाज बैंक चलाने वाली इन महिलाओं ने वर्ष 2016 में एकता नेचर फार्मिंग प्रोड्यूसर लिमिटेड कंपनी की शुरुआत की जिसमें जीरो लागत में जैविक तरीके से ये खेती करती हैं। इस कंपनी की सदस्य और अनाज बैंक की संचालिका गीता इन अनाज बैंक को खोलने का सबसे आसान तरीका बताती हैं, "अनाज बैंक खोलने के लिए यह बिलकुल जरूरी नहीं कि कोई संस्था सहयोग करे तभी खोल सकते हैं। किसी भी गाँव की 10-15 महिलाएं मिलकर जब गेहूं या धान की फसल कटाई के समय अपने-अपने घरों से थोड़ा-थोड़ा अनाज इकट्ठा कर अनाज बैंक की शुरुआत कर सकती हैं।"


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