कूड़ा बीनने वाले हाथों ने कागज पर उकेरा रंग

Astha SinghAstha Singh   29 May 2017 9:27 PM GMT

कूड़ा बीनने वाले हाथों ने कागज पर उकेरा रंगgaonconnection

लखनऊ। रंग-बिरंगी चूड़ियों से बना मोर, चूल्हे में खाना पकाती मां, रस्सी कूदते बच्चे, खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य जैसी अपनी असीम कल्पनाओं पर बच्चों ने जब कागज पर रंग भरे तो हर किसी ने खूब वाहवाही की। इस प्रदर्शनी में वे बच्चे शामिल थे जो आपके घरों के आसपास कूड़ा बिनते दिख जाते हैं। बुधवार को गोमती नगर स्थित स्टडी हॉल स्कूल ने वार्षिक कला प्रदर्शनी आयोजित की जिसमें स्कूल के छात्रों के साथ नॉन फॉर्मल एजुकेशन सेंटर्स फाउंडेशन-ज्ञानसेतु के तहत झुग्गी बस्तियों के गरीब बच्चों ने भी हिस्सा लिया।

मटियारी की प्रीति निषाद कूड़ा बीनती हैं लेकिन उन्हें कला से बहुत प्यार है। कला के साथ ही वह अपनी बहन से भी खूब प्यार करती हैं। प्रीति ने अपनी पेंटिंग में दिखाया कि दिनभर का काम करने के बाद थककर कैसे वह अपनी बहन के साथ सोती हैं। इसी तरह महमूदनगर की साधना ने पेंटिंग में अपनी मां को चूल्हे पर खाना पकाते हुए दिखाया। मटियारी की ही दिव्या भारती ने पेंसिल से मीराबाई का स्केच तैयार किया, जिसे देखकर किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि स्लम एरिया के बच्चे भी इतने ज्यादा कल्पनाशील हैं। इन सभी बच्चों ने अपने खाली वक्त में हफ्तेभर की मेहनत के बाद इन पेटिंग्स को उकेरा।

स्टडी हॉल की शिक्षण पद्धति की डायरेक्टर शालिनी चंद्रा बताती हैं, “इस एग्जिबिशन का मुख्य उद्देश्य मलिन बस्ती के बच्चों को उच्च वर्गीय परिवार के बच्चों के बराबर पेश करना है। इस प्रदर्शनी में ज्ञानसेतु के बच्चों के साथ स्टडी हॉल जूनियर स्कूल के छात्र, दोस्ती विंग्स के विशेष बच्चे और प्रेरणा गर्ल्स स्कूल के अंडरप्रिव्लिज्ड लड़कियों ने भी भाग लिया।”

मलिन बस्तियों के बच्चों को बनाते हैं काबिल

शालिनी बताती हैं, “इन बच्चों के साथ अध्यापकों ने भी खूब मेहनत की है। मैंने देखा है कि मिठाई वाले चौराहे के पास बने फ्लाईओवर के नीचे मलिन बस्ती के बच्चों की दुनिया है। इसी तरह केंद्रीय विद्यालय के पीछे भी इन्हीं बच्चों का डेरा है। इन बच्चों का ताल्लुक आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से हैं।

इन्हें पढ़ाना बेहद कठिन होता है लेकिन हम सभी ने खूब मेहनत की है। इन बच्चों को इस काबिल बनाते हैं कि ये सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने लायक हो जाएं।” शालिनी के मुताबिक, हालांकि सरकारी स्कूलों की हालत बदहाल है। वहां इन बच्चों को समुचित माहौल और ढंग की पढ़ाई व्यवस्था न मिलने के कारण ये वापस ज्ञानसेतु का रुख करने लगते हैं।

More Stories


© 2019 All rights reserved.

Top