पढ़िए रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित स्टोरी : तीन लड़कियां

पढ़िए रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित स्टोरी : तीन लड़कियांतीन लड़कियां : एक दलित समाज से है, एक मुस्लिम और एक ओबीसी समुदाय से

एक दलित समाज से है, एक मुस्लिम और एक ओबीसी समुदाय से। पड़ोसी, दूर के रिश्तेदार, उनसे जलने वाले और वो जिनको लेना है न देना, सब यही कहते हैं, उनसे कभी उनके मुंह पर कभी मन में “जैसे लड़कियां रहती है वैसे रहो।”

लेकिल उत्तर प्रदेश के तीन अलग अलग गाँवों में तीन लड़कियां वैसे रहने को तैयार नहीं हैं, जैसे सीमाओं में बंध के अधिकांश लड़कियों से रहने की उम्मीद की जाती है। अपनी-अपनी सामाजिक बेड़ियों को तोड़ते हुए, अपने-अपने माता-पिता के समर्थन से, वे छोटे छोटे तरीकों से ये साबित कर रही है कि यूपी के गाँवों में निश्चित रूप से बहुत कुछ बदल रहा है। ये तीन लड़कियां अपने-अपने क्षेत्रों की लड़कियों के लिए रोल मॉडल या आदर्श बन गयी है।

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चौदह साल की अर्चना गौतम अपने स्कूल में लड़कों को पछाड़ते हुए हर साल पहले नंबर पर आती है। मिट्टी के घर में रह के टिमटिमाती ढिबरी की रोशनी में, एक गाँव की दलित परिवार की इस लड़की ने राज्य की बेहद कठिन यूपी बोर्ड परीक्षा में 72 प्रतिशत नंबर ले आई।

निगार फातिमा पंद्रह साल की है। शादी करने, आगे पढ़ाई न करने और सीधे सादे रहन-सहन के सामाजिक दवाब के बावजूद अपने गाँव में बाइक चलाती है, स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली है और आगे पढ़ने जा रही है।

पल्लवी यादव सत्रह साल की है और कथावाचक है। वो कभी गाकर बता कर, हिन्दू धर्म ग्रंथों की कहानियां सुनाती है। लखनऊ से 22 किलोमीटर उत्तर में सुभाननगर गाँव में उनकी खामोश बगावत सदियों पुरानी इस सामाजिक मान्यता को तोड़ रही है जिसके अनुसार कथावाचक अक्सर पुरूष होते है अधिकांश ब्राहमण पुरूष।

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पल्लवी ने एक कथा वाचन के आयोजन के दौरान गाँव कनेक्शन को बताया, “मुझे गाने का शौक बचपन से था, और मैं अपने पिताजी के साथ कथा सुनने जाया करती थी जहां वो गाते थे। एक दिन एक कथा के बीच जब उन्होंने चाय के लिए ब्रेक लिया तो मैंने पूछा, “मैं भी गाना चाहती हूं, गा सकती हूं? सोच रही थी वो न जाने क्या कहेंगे पर उन्होंने फौरन मुझे आज्ञा दे दी, और मैं कथा वाचक बन गयी।”

बाबागंज कस्बे में करीब तीन बजे लगभग सौ लोगों के सामने उनका आयोजन शुरू हुआ। पल्लवी मंच पर आई, संस्कृत में श्लोक बोले और अपनी कथा शुरू की। श्रोताओं ने बड़े ध्यान में सुना। पल्लवी हारमोनियम बजा के गाती रही, श्रोता बीच बीच में तालियां बजाते रहे।

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लेकिन आयोजन पंडाल से परे, उनके और दूसरे गाँवों में पल्लवी के ऊपर कई रूढ़िवादी लोग उंगलियां उठाते हैं। पल्लवी बताती हैं, “अक्सर लोग कहते है कि ये आदमियों का काम हैं, ये मैं क्यों कर रही हूं? लेकिन मुझे किसी की फिक्र नहीं। मैं जो चाहूंगी वो करुंगी। मैं कार सीखना चाहती हूं।”

पल्लवी ने पिछले साल हाईस्कूल की परीक्षा पास की है। उसने महज तेरह साल की उम्र से ही भगवत कथा वाचन की ट्रेनिंग आरम्भ कर ली थी।

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“पहले तो मंच के आगे बैठ के झिझक लगती थी, लेकिन बाद में आदत हो गयी,” पल्लवी कहती हैं। उनके 40 वर्षीय पिता रमेश चंद्र बताते हैं, बिटिया जैसे-जैसे बड़ी हुई, उसका रुझान इस ओर बढ़ता ही गया। जब कभी मना किया तो रोने लगती। इसलिए मैंने उसे फिर नहीं रोका।”

निगार के पिता ने भी उन्हें कभी नहीं रोका, बल्कि हमेशा प्रोत्साहित किया। निगार, जब चार साल की थीं, अपनी मां से जिद करने लगतीं कि उन्हें बगल के घर में रहने वाली टीचर के पास जाना है। मां खुद आगे पढ़ना चाहती थीं, नहीं पढ़ पायीं, इसलिए बड़े चाव से निगार को उन अध्यापिका के पास ले जातीं। निगार धीरे-धीरे उर्दू, फारसी और हिंदी तीनों भाषाएं सीख गयीं।

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छह साल की उम्र में पहली बार अपने एक चाचा की मोटरसाइकिल पर चढ़ीं और फिर समझिये उतरी ही नहीं। फर्राटे से पूरे इलाके में सोचे या फिक्र किये कि लोग उनकी आजादख्याली के बारे में क्या सोचते हैं। पिछले साल जब अपनी बहनों को कहीं से लेने तेजी से मोटर साइकल पर जा रही थीं, तो एक जगह सड़क के किनार बजरी पर फिसल के गिर गयीं और टांग तुंडा बैठीं। फिर भी अलमस्त। “थोड़े दिन में हम ठीक हो गए, फिर मोटर साइकल से चलने लगे,” निगार कहती हैं।

पढ़ाई के लिए निगार के शौक को उनके परिवार का पूरा समर्थन है। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया था जब उनका शौक मुश्किल में था। नवीं के इम्तिहान के बाद पापा ने कहा कि तुम्हारे अच्छे नंबर नहीं आये हैं तुम मन लगा के नहीं पढ़ रही हो, तुम्हारा स्कूल से नाम कटवा देंगे। निगार ने हंसकर कहा, “हमने कहा जाओ हम अम्मी से पैसे लेकर फीस भर देंगे पर स्कूल जरूर जायेंगे।”

पढ़ने का कुछ ऐसा ही जुनून जानकीनगर गाँव में चौदह साल की अर्चना गौतम को है। हांलाकि उनके गाँव में बच्चे अक्सर छह साल की उम्र में स्कूल में दाखिला होते हैं, पर अर्चना को चार साल की उम्र में ही स्कूल भेज दिया गया।

अर्चना खेलों में रूचि रखती हैं, खाना बनाना जानती हैं और पत्रकार बनने का इरादा रखती हैं। दलित समाज के ऐसे परिवार से है जो कुछ वर्षों पहले तक आर्थिक रूप से बहुत संपन्न नहीं था। लेकिन रोजमर्रा के जीवन की मुश्किलों और सामाजिक पूर्वाग्रहों का रोज सामना करने के बावजूद अर्चना के पिता नंदलाल और मां सावित्री देवी ने हमेशा उन्हें पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया।

“क्लास में हम हमेशा सबसे आगे आते हैं, अबकी हाईस्कूल में बहत्तर प्रतिशत आये है हम सिर्फ पढ़ना चाहते हैं,” अर्चना बोलीं।

“लेकिन पापा ने कहा कि वो निराश हैं, उन्हें हमसे कम से कम पचासी प्रतिशत नंबरों की उम्मीद थी। हमें भी अच्छा नहीं लगा, हम सोच रहे थे इंग्लिश और सांइस में और अच्छे नंबर आयेंगे।” लेकिन अर्चना सिर्फ किताबी कीड़ा नहीं है, वो रेडियों पर फिल्मी गाने सुनती हैं, वॉलीबॉल, कबड्डी, हॉकी और फुटबाल खेलती हैं, और फिल्मों का शौक है हालांकि अभी तक फिल्में सिर्फ डीवीडी पर ही देखी हैं, कभी सिनेमा हॉल में नहीं। अब नया शौक पाल लिया है वो गाँव कनेक्शन की प्रशिक्षु संवाददाता और पत्रकार बनना चाहती हैं।

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अर्चना कहती हैं, “गाँव के कई लोग हम पर हंसते हैं, कहते हैं देखों कहां कहां घूमती रहती है, हम उन्हें बताते हैं कि हम रिपोर्टर हैं।” अब उनके भाई आदित्य गौतम गुजरात में काम करते हैं, और उनके पिता में कमायी बेहतर हो गयी है सफर थोड़ा आसान हो गया है, पर हमेशा ऐसा नहीं था। “हमने बड़ी मुश्किलों में पढ़ा हैं। बिजली तो अभी भी नहीं है , ढिबरी (मिट्टी के तेल का दीया)की रोशनी में पढ़ते हैं, “ अर्चना कहती हैं, “जब हम पांचवी कक्षा में थे तब हम लोग काफी गरीब थे। हमारे पास ज्यादा कपड़े नहीं थे, एक ही कपड़े तीन-तीन दिन पहनते थे। लेकिन कभी पढ़ने की इच्छा कम नहीं हुई।“

ये खबर मूल रूप से (02-09 दिसम्बर 2012) को साप्ताहिक गाँव कनेक्शन में प्रकाशित हुई थी।

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