बेटे की चाह में महिलाओं का हो रहा गर्भपात

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लखनऊ। “मेरी तीन बेटियों के जन्म के बाद मेरे पूरे परिवार की चाह थी कि मेरी चौथी संतान बेटा ही हो। बेटे की चाह में मेरे ऊपर परिवार वालों ने लिंग जांच का दबाव डाला।

लिंग जांच के बाद जब मेरे परिवार वालों को पता चला की मेरे पेट में फिर एक बेटी है। तो मेरी सास ने डॉक्टर स्रे कहा इसकी सफाई कर दो हम पूरा पैसा दे देंगे। मैंने बहुत मना किया पर मेरी एक न चली और डॉक्टर ने तुरन्त आठ हजार रुपए लेकर मेरा गर्भपात कर दिया।’’ नाम न बताने कि शर्त पर देवा ब्लॉक के गढ़रीयन पुरवा गाँव की रहने वाली एक महिला ने अपनी आपबीती गाँव कनेक्शन को बताई।

गाँवों में बहुत सी महिलाएं हैं, जिनका लड़के की चाह में गर्भपात करा दिया जाता है। बहुत से ऐसे परिवार हैं, जिनके लड़के की चाह में पांच से छह बेटियां हो गईं पर लड़के होने की चाह अभी तक खत्म नहीं हुई। बाराबंकी जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर देवा ब्लॉक के उमरी गाँव के रहने वाले विश्वनाथ यादव (50 वर्ष) बताते हैं, “याक लड़िका के खतिर नौ बिटिया हुई गईं, ई सब तो पराये घर की हैं, हमार वंश तो लड़िका से चली।”

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के मुताबिक, 2011 के दौरान देश में कन्या भ्रूण हत्या के कुल 132 मामले दर्ज किए गए। इस सिलसिले में 70 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 58 के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया गया और 11 को दोषी ठहराया गया। यह जानकारी स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्यमंत्री अबू हाशिम खान चौधरी ने राज्य सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

ये बात किसी एक जिले के नहीं है बल्कि पूरे देश की है, जहां एक तरफ जागरुकता की कमी है, तो दूसरी तरफ संकुचित मानसिकता। जिसके चलते बेटे की चाह में बेटियों का गला घोंटा जा रहा है। जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर बंकी ब्लॉक के दरियालपुर गाँव में रहने वाली कृष्णावती रावत (34 वर्ष) बताती हैं, “शादी के तुरन्त बाद लड़का होने के आशीर्वाद दिए जाने लगे, पर अफसोस तमाम मन्नतों के बाद भी पहली बेटी पैदा हुई। बस फिर मेरी सास ताने देने लगीं, मुझे कोसने लगीं। कहतीं मेरे घर एक मनहूस आ गई, आए दिन मुझे और मेरी बेटी को लेकर कुछ न कुछ बोला करती हैं।” वह आगे बताती हैं, “मेरी सास के कोई बेटी नहीं थी और वो नहीं चाहती थीं कि मेरे कोई बेटी हो।

दोबारा गर्भवती होने पर कई बार कोशिश की गई कि लिंग जांच हो पर मैं नहीं गई। मेरी दूसरी संतान भी बेटी हुई है। उसके होने के बाद मारपीट होने लगी। मुझे घर से निकाल दिया गया, जब बेटी होने पर घर से निकाला गया तब मेरे पास एक चम्मच तक नहीं था, जिससे मैं अपनी बेटी को दूध पिला सकती।’’ गर्भपात कराने के लिए गाँवों के लोग हर्बल दवाएं, टोना-टोटका व झाड़फूंक के लिए तंत्रिक के पास जाते हैं, इन टोटको की वजह से यहां की महिलाओं को कई बार अपनी जिन्दगी से हाथ तक धोना पड़ता है। जबकि गाँवो में आशा बहुओं को ये जिम्मेदारी दी गई है कि वो ग्रामीण महिलाओं को जागरूक और प्रशिक्षित करें।

कानून को सख्ती से लागू करने की जरूरत

प्रसूति पूर्व जांच तकनीक अधिनियम 1994 को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। भ्रूण हत्या को रोकने के लिए राज्य सरकारों को निजी अस्पतालों का औचक निरीक्षण और उन पर नजर रखने की जरूरत है।  गर्भ धारण करने से पहले और बाद में लिंग चयन रोकने और प्रसवपूर्व निदान तकनीक को नियमित करने के लिए सरकार ने एक व्यापक कानून, गर्भधारण से पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन पर रोक) कानून 1994 में लागू किया गया था। इसमें 2003 में संशोधन किया गया। गर्भपात रोकने के लिए सरकार ने कानून तो बनाए हैं, लेकिन ये कानून प्रभावकारी तरीके से लागू नहीं हो पा रहे हैं। 

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