भारत को अपनी एकता का जश्न मनाना चाहिए: स्वामी

भारत को अपनी एकता का जश्न मनाना चाहिए: स्वामीgaonconnection

भुवनेश्वर (भाषा)। ‘‘वाम विचारधारा के प्रभाव'' से भारतीय साहित्य को मुक्त करवाने का आह्वान करते हुए भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आज कहा कि मुक्त समाज या लोकतंत्र के नाम कोई भी अपनी मनमर्जी का लेखन, पैरवी या प्रतिपादन नहीं कर सकता है।

राज्यसभा सदस्य ने कहा कि साहित्व का वास्तव में कुछ लोगों के शोषण एवं पीडाओं से लेनादेना है। उसे भारत की एकता का जश्न भी मनाना चाहिए। उन्होंने यहां कलिंग साहित्य उत्सव को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हमें अपने राष्ट्र की एकता का जश्न भी मनाना चाहिए क्योंकि दबावों के बावजूद इसने सहन किया और एक बना रहा। यह जश्न आवश्यक है क्योंकि कई अन्य देश विभाजित हो चुके हैं। भारत 1947 के विभाजन के बाद से एक बना हुआ है।''

स्वामी ने ध्यान दिलाया कि सोवियत संघ 16 हिस्सों, युगोस्लाविया चार तथा इंडोनेशिया एवं पाकिस्तान दो हिस्सों में विभाजित हो गये। दूसरी तरफ भारत एक बना रहा तथा प्रतिकूल भविष्यवाणियों के बावजूद यह एक बना रहेगा। उन्होंने कहा कि साहित्य लोकतंत्र में बेहतर ढंग से फूलफल सकता है। उन्होंने कहा कि असहिष्णुता के नाम पर कुछ समय तक अस्तव्यस्तता बनी रही।

स्वामी ने कहा कि पुरस्कार वापसी की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि लोकतंत्र के संस्थान पूरी तरह मजबूत थे तथा देश में चुनाव हो रहे थे। उन्होंने ध्यान दिलाया कि साहित्य में दो धाराएं हैं। एक पुरानी वाम विचारधारा और अन्य नई सांस्कृतिक राष्ट्रवादी समूह।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान में कुछ पाबंदियां हैं तथा लोकतंत्र के बेहतर स्वास्थ्य के लिए व्यक्तियों को उनका पालन करना चाहिए। बहरहाल, उन्होंने कहा कि 65 साल तक निर्बाध चलने वाले लोग इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।

भाजपा नेता ने कहा, ‘‘हमारे मूलभूत अधिकारों पर युक्तिसंगत पाबंदियां हैं। हमें जन व्यवस्था को ध्यान में रखकर काम करना चाहिए।'' उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रिटिश शासन ने स्वतंत्रता से पूर्व भारत को नस्ली आधार पर द्रविण और आर्य खांचों में बांटने का प्रयास किया था।

स्वामी ने अपनी वह पुराना प्रसंग भी दोहराया कि कैसे उन्होंने राज ठाकरे एवं उप्र के एक टैक्सीवाले के बालों का नमूना लिया और उनका प्रयोगशाला में परीक्षण करवाने पर पाया गया कि दोनों के डीएनए समान हैं।

स्वामी ने कहा कि भारतीय इतिहास की पुस्तकों की समीक्षा किए जाने की जरुरत है कि ब्रिटिश लोगों ने कुछ गलत बातें डाली हैं। साहित्य में वाम पंथी विचारधारा भी है। उन्होंने कहा, ‘‘आप मुक्त समाज या लोकतंत्र के नाम पर जो चाहे वह लेखन, पैरवी या प्रतिपादित नहीं कर सकते हैं। इस पर युक्तिसंगत पाबंदियां भी है जैसा कि संविधान में बताया गया है।''

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