भारत में चौपाया संस्कृति यानी बफैलो कल्चर बढ़ रहा है

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देश के उच्च शिक्षा संस्थानों के छात्रों में अराजकता बढ़ रही है। आरक्षण के नाम पर तोड़ फोड़ और विध्वंसक गतिविधियां सामान्य हो गई हैं और सबसे कष्टकर है कि नौजवानों में यौनाचार और यौन उत्पीड़न फैल रहा है। पिछले 40 साल में टीवी, सिनेमा, इन्टरनेट और मोबाइल फोन का तीव्र गति से विकास हुआ है और उतनी ही तीव्र गति से अपराधों का ग्राफ भी बढ़ा है। लूट, अपहरण, फिरौती, हत्या, रेप, चोरी, यौन उत्पीड़न के मामले अखबारों में पटे रहते हैं। कुछ टीवी चैनल तो कुकृत्य का विस्तार से विवरण भी दिखाते हैं जो दर्शकों के दिमाग पर स्थायी प्रभाव डालते हैं। 

जब बच्चे सेक्स अपराध, हिंसा और असामाजिक कामों को देखते हैं तो उनकी चौपाया भावनाएं जागृत हो जाती हैं। वे कठोर भावनाओं के साथ बड़े होते हैं और कभी भी उनमें अपराधबोध नहीं होता। गुनहगार पैदा करने में इन्टरनेट सबसे आगे है। परेशानी यह है कि इन्टरनेट के बगैर काम भी नहीं चलेगा इसलिए अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि छोटी उम्र में बच्चों पर नजर रखें और उतने ही उपकरण उपलब्ध कराएं जिनकी आवश्यकता हो।

इन्टरनेट एक माचिस की तरह है जिसका उपयोग हम जैसे चाहें कर सकते हैं। खाना पकाने की गैस जलाएं या बीड़ी-सिगरेट जलाएं अथवा किसी का घर फूंक दें। जीव विकास के क्रम में चौपाए विकसित होकर दो पैरों पर खड़े हुए होंगे तो फ्री सेक्स और जिसकी लाठी उसकी भैंस का व्यवहार करते रहे होंगे। कालान्तर में संयम के साथ सभ्य समाज का विकास हुआ। डिजिटल क्रान्ति हमें वापस चौपाया संस्कृति की राह पर ले जा रही है। यह हम पर है कि हम डिजिटल जगत में कैसा व्यवहार करें और कितनी सीमा तक बच्चों के लिए क्रान्ति के द्वार खोलें।

बच्चों में संस्कार डालने की जिम्मेदारी बड़ों की रहेगी जिन्हें स्वयं संयम बरतना होगा। फिल्मकारों पर कम से कम सेंसर का अंकुश तो है लेकिन इन्टरनेट पर ऐसा कोई नियंत्रण नहीं है। फिल्मकारों का तर्क है कि पब्लिक डिमांड के कारण ऐसे सीन डालने पड़ते हैं वास्तव में कुतर्क है। यदि पब्लिक मांगे भांग, गांजा, अफीम और शराब तो कितनी, कब और किसको देनी है यह फैसला तो समझदार लोगों को करना होगा। ये तर्क लोगों में पशु भावनाएं उभार कर दौलत कमाने का बहाना मात्र हैं। लोग सोचते नहीं कि यौन प्रदर्शन का बच्चों और वयस्कों पर भी क्या प्रभाव पड़ता है।

देश के नौजवान और नवयुवतियां टीवी सीरियल, सिनेमा और विशेषकर इन्टरनेट पर यौनाचार और यौन उत्पीड़न देखकर कामांध हो जाते हैं और यौन उत्पीड़न जैसे रास्ते पर चल पड़ते हैं। पश्चिमी देशों में डेटिंग और मेटिंग की आजादी समाज ने दे रखी है इसलिए यौन उत्पीड़न की घटनाएं कम होती हैं। हमारे सामने दो विकल्प हैं या तो हम अपने जीवन मूल्यों को बरकरार रखने का प्रयास करें अथवा पश्चिमीतौर तरीकों को मान्यता दे दें। दोनों ही दशाओं में अभिभावकों पर मुख्य जिम्मेदारी है।

कुछ फिल्मकार बेहूदा तर्क देते हैं कि इस देश में तो शिवलिंग की पूजा होती है, खजुराहो, कोणार्क और अजन्ता में कलाकृतियों बनाने की आजादी थी। उन्हें कौन बताए कि कलाकृतियां मन्दिर के बाहर होती हैं अन्दर नहीं अर्थात वासनाओं को बाहर छोड़कर अन्दर जाना है। शिवलिंग तो ब्रह्मांड की ऊर्जा का प्रतीक है। धर्म की श्रेष्ठ भावनाओं को समझने के बजाय ये लोग अर्थ का अनर्थ करते रहते हैं। अब ईसाई धर्मावलम्बी मानते हैं कि ईसामसीह का जन्म एक कन्या के गर्भ से हुआ था। फिल्मकारों की चले तो ये सभी कन्याओं को गर्भवती दिखा दें। कुतर्क की भी सीमा होती है। सामाजिक विकृति को अभिभावक या सरकारी कानून, या पुलिस, या स्कूल टीचर अकेले ठीक नहीं कर पाएंगे। सामूहिक प्रयास की आवश्यकता होगी।

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