भारत में जातिविहीन समाज मुंगेरी लाल का सपना है

भारत में जातिविहीन समाज मुंगेरी लाल का सपना हैgaonconnection

जाति व्यवस्था के जन्मदाता महर्षि मनु स्वर्ग में बैठे मुस्करा रहे होंगे कि उनका बनाया सामाजिक ढांचा आज भी सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक प्रबन्धन का सशक्त आधार बना हुआ है। मनु ने जो चार जातियां बनाई थीं उनसे हमने आधुनिक भारत में 6000 बना ली हैं। हमारे नेताओं ने सुनिश्चित कर लिया है कि जातियों के बीच की दीवारें कमजोर न होने पाए।

पुराने ज़माने में जाति आधार थी सामाजिक भेदभाव का और अब जातीय आधार पर रचनात्मक भेदभाव करके कुछ जातियों को लाभ देकर समाज में बराबरी लाने का प्रयास कर रही हैं सरकारें। यह भेदभाव, भले ही इसे रचनात्मक कहिए, जातियों की लकीरें गहरी ही करेगा। प्रत्येक क्रिया की उतनी ही परन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है, जैसा न्यूटन ने कहा था। पुराने समय में जाति ही आधार थी पुजारी बनने या शासन करने के लिए और अब जाति आधार है सुविधाएं पाने की। हम जातीय आधार पर चीजें बांटकर जातीय पूर्वाग्रह समाप्त नहीं कर सकते।

स्वतंत्र भारत के नेताओं ने तय किया कि जाति ही आधार बनेगी नौकरी पाने, संसद, विधानसभा या पंचायत में जगह पाने के लिए। उन्होंने एकमात्र जातीय आधार पर दरोगा, पुलिस और अध्यापक बनाने आरम्भ किए, सोचा हर आदमी हर काम कर सकता है यदि जाति सही है। उन्होंने सोचा कि इस तरीके से सेकुलर समाज की रचना हो जाएगी। यह उसी तरह हुआ कि कोई सोचे हम आग से आग बुझा देंगे। इन लोगों को अम्बेडकर की बुद्धि पर भरोसा नहीं जिन्होंने व्यवस्था दी थी कि जातीय आरक्षण दस साल के लिए पर्याप्त होगा। कोई औषधि बहुत समय तक खाने से निष्प्रभावी हो जाती है।  

कुछ लोगों का मानना है कि देश में सामाजिक प्रगति जानने का जाति ही एक मात्र पैमाना है। यह सोच जाति को सदा के लिए प्रासंगिक बनाता है। आधे से अधिक सरकारी कर्मचारी अपनी कुर्सियों पर अपनी जाति के कारण बैठे हैं, योग्यता और क्षमता के कारण नहीं। जिस मनुवाद को कुछ लोग गालियां दे रहे थे उसी के आधार पर सुविधाएं बटोर रहे हैं और मनुवाद को खाद पानी दे रहे हैं। यदि किसी ने जातिविहीन समाज की कल्पना की होगी तो वह मुंगेरी लाल के सपने से अधिक कुछ नहीं है।

जातिविहीन समाज की रचना का एक उपाय इन नेताओं ने सोचा कि जातिसूचक शब्दों का प्रयोग रोक देने भर से जातियां समाप्त हो जाएंगी। अदालतों के आदेश के बावजूद हमारी सरकारें जातीय जनगणना नहीं करातीं। कैसी विचित्र बात है जाति आधारित लाभ उठाएंगे बिना जाति का नाम लिए। गाँव में कहते हैं ‘गुड़ खाएं, गुलगुला से परहेज़।” जातीय शब्दों को सम्मानजनक बनाने के लिए कभी हरिजन तो कभी अनुसूचित बोलेंगे लेकिन अनु माने तो छोटा ही होता है। जाति पीछा नहीं छोड़ती जहां जाओगे साथ जाएगी।  

यदि हमारे नेता सोचते हैं कि 67 साल में जातियों के बन्धन ढीले हुए हैं तो उनका भ्रम है। वे बन्धन और मजबूत हुए हैं और न होते तो खाप की आवश्यकता न पड़ती। आप गाँव देहात में किसी ब्राह्मण या ठाकुर के दरवाजे पर जाइए और कहिए कि हम अनुसूचित हैं हमें पानी पिला दो। आप देखते रहना किस ग्लास में वह पानी लाता है।

जातीय दीवारें मजबूत हो रही हैं, इसका सबूत है कि जातीय संघर्ष और अन्याय घटे नहीं बढ़े हैं। सच्चाई यह है कि सम्मान व्यक्तियों का होता है जाति का नहीं। हम सोचें वाल्मीकि, कबीर, रविदास, तुकाराम, अम्बेडकर, जगजीवन राम, कर्पुरी ठाकुर, वल्लभ भाई पटेल का नाम सम्मान से लिया जाता है भले ही कोई उनकी जाति नहीं जानता। क्षमता और योग्यता आरक्षण मांगती नहीं है, अपना अधिकार हासिल करती है।

जब हमारे नेता किसी चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशी खोजते हैं तो जातीय बहुमत को आधार मानते हैं फिर भी अपने को जातिविहीन समाज का पक्षधर कहते हैं, सेकुलर मानते हैं। कम्युनिस्ट जो भगवान को नहीं मानते परन्तु जाति को मानते हैं और इसकी वर्ग से बराबरी करते हैं।

जातीय नेता अपने को कुछ दिनों तक वर्ग चिन्तक के रूप में समाज को भ्रमित कर सकते हैं लेकिन यह बहुत दिनों तक नहीं चलता। यदि जाति और वर्ग एक ही होता तो स्वामी प्रसाद मौर्य को मायावती से अलग होने की नौबत नहीं आती, बहाने कितने बताएं। स्पष्ट है कि जातियां अमर हैं, मनुवाद अमर है। जातीय विद्वेष का कारण था जातियों से जुड़ा हुआ लाभ और पद। उसी अवधारणा को जीवित रखकर हम विद्वेष मिटाना चाहते हैं, यह कामयाब नहीं होगा।

Tags:    India 
Share it
Top