भारत-म्यांमार में बढ़ सकती है नज़दीकी

भारत-म्यांमार में बढ़ सकती है नज़दीकीGaon Connection

अंततः म्यांमार ने वास्तविक रूप में लोकतंत्र की पहली सुबह देखी। अब लगभग साढ़े पांच दशकों के बाद सैनिक जुंटा के राज के स्थान पर म्यांमार पहली बार गैर-सैनिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति के नेतृत्व में आगे बढ़ने जा रहा है।

म्यांमार, आंग सान सू की को राष्ट्रपति के रूप में देखने की इच्छा रखता था पर सैन्य शासकों की अनिच्छा इस पर भारी पड़ी और अंतत: नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) नेता और आंग सान सू की के बेहद करीबी टिन काव को राष्ट्रपति बनने का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन इस नये अध्याय की शुरूआत के साथ ही कुछ सवाल भी हैं। क्या काव म्यांमार के लोगों की अपेक्षाओं पर खरे उतर पाएंगे? म्यांमार में सामाजिक-आर्थिक व एथनिक चुनौतियां और सेना के साथ साम्य बनाए रखने में क्या काव सफल हो पाएंगे।

टिन काव ने कुल 652 वोटों में से सेना समर्थित उम्मीदवार मिंट स्वे के 200 वोटों के मुकाबले 360 वोट प्राप्त कर राष्ट्रपति के रूप में विजय हासिल की जबकि एनएलडी के एक अन्य उम्मीदवार हेनरी वैन थियो को केवल 79 वोट पर ही संतोष करना पड़ा। अब ये दोनों उम्मीदवार क्रमशः पहले और दूसरे उप राष्ट्रपति के तौर पर काम करेंगे।

जुंटा सरकार ने वर्ष 2008 में संविधान में बदलाव किया था और नए ड्राफ्ट के अनुसार जिस व्यक्ति या उसके रिश्तेदारों के पास म्यांमार की नागरिकता नहीं होगी, वह राष्ट्रपति पद पर पदासीन नहीं हो सकता। ध्यान रहे कि सू की के बच्चों के पास म्यांमार की नागरिकता नहीं है (वर्तमान में वे ब्रिटिश नागरिक हैं) इसलिए वे राष्ट्रपति पद के लिए नॉमिनेशन नहीं कर सकीं जबकि कुछ समय पहले ही सेना की तरफ से सू की को भविष्य के नेता के रूप में स्वीकार किया गया था। मतलब यह कि सैन्य शासक अभी भी उनसे भय खाते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि सेना नए शासन तंत्र पर नजर और नियंत्रण रखने का प्रयास करेगी।

सैनिक जुंटा ने लम्बे समय तक आंग सान सू की को घर में नजरबंद कर रखा था और 2010 आते-आते अन्तर्राष्ट्रीय दबाव में सैनिक जुंटा चुनाव करने के लिए तैयार हो गया। हालांकि वह ‘गाइडेड डेमोक्रेसी’ से आगे नहीं बढ़ा क्योंकि अभी वह सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता था। 1948 में बर्मा को जब उपनिवेशवादी चंगुल से मुक्ति मिली थी तब शायद वहां के लोगों ने भी एक स्वाभाविक अपेक्षा की होगी कि वे खुली हवा में सांस ले सकेंगे और राष्ट्रीय निर्णय लेने में अपनी भूमिका स्वतंत्र रूप से निभाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आजादी मिलने के दस साल पूरे होते-होते लोकतांत्रिक सरकार में भ्रष्टाचार के घुन लग गए और सेना ने वर्ष 1958 में उसे हटाकर सत्ता अपने हाथों में ले ली। औपनिवेशिक तंत्र से मुक्ति पाए अधिकांश एशियाई और अफ्रीकी देशों की यह सबसे बड़ी कमजोरी रही है कि वे भ्रष्टाचार की ओर तेजी से बढ़े और अभी तक यह विष-बेल बढ़ ही रही है। एक छोटे से अंतराल के लिए लोकतंत्र की बहाली के बाद वर्ष 1962 में जनरल नी विन ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसके बाद शुरू हुई राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया ने सम्पूर्ण प्रशासन को सैनिक जुंटा के अधीन ला दिया। जुंटा के समाजवाद में सामान्य लोगों की आय लगभग खत्म हो गई, औद्योगीकरण की कमजोर पड़ती प्रवृत्तियों ने किसी उद्यमी वर्ग को खड़ा नहीं होने दिया, जिससे सामाजिक विषमता और बेरोजगारी की स्थिति विकराल होती गयी।

21वीं सदी में पहुंचने के बाद उसने वैश्विक स्थितियां बदलती देखीं और यह महसूस किया कि अब विकास, स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को सरेआम ठेंगे पर नहीं रखा जा सकता। कारण यह है कि अगस्त 2007 के मध्य में म्यांमार सरकार द्वारा तेल और गैस की वृद्धि के विरुद्ध हुए आंदोलन ने, जिसमें करीब एक लाख बौद्ध भिक्षुओं ने भी हिस्सा लिया था, सम्पूर्ण तंत्र को बेहद कड़ी चुनौती दी थी। इन अपरिग्रही बौद्ध भिक्षुओं ने सैनिक जुंटा के खिलाफ जो विद्रोहात्मक कार्रवाई की थी उसकी तीव्रता लगभग उतनी ही थी जितनी कि मारकोस जैसे तानाशाहों को उखाड़कर फेंकने वाली क्रांति में देखी गयी थी।

1 अप्रैल 2016 को राष्ट्रपति के रूप पदारूढ़ होने के बाद टिन काव के सामने आर्थिक सुधार, विकास और नृजातीय समस्याओं के निवारण के साथ-साथ वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलन बनाना होगा। म्यांमार में काचिन विद्रोही अधिक राजनीतिक अधिकार देने तथा सेना द्वारा मानवाधिकारों का हनन रोकने की मांग कर रहे हैं। सनद रहे कि ब्रिटिश औपनिवेशिक व्यवस्था से मुक्ति पाने के बाद म्यांमार (तब बर्मा) उन नृजातीय और उप-राष्ट्रीयताओं की स्वायत्तता सम्बंधी संघर्षों का शिकार हुआ जो कभी ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति के तहत पोषित की गयी थीं।

शासक वर्ग वास्तविक स्थितियों से मुंह फेरता रहा और इसी बीच बौद्ध धर्म को राष्ट्रीय धर्म घोषित कर दिया, जो काचिन लोगों द्वारा व्यहृत नहीं था। फलतः संघर्ष का स्वरूप उग्र हो गया और आगे की रणनीति के लिए काचिन इंडिपेंडेंस ऑर्गेनाइजेशन (केआईओ) और काचिन इंडिपेंडेंट आर्मी (केआईए) का निर्माण किया गया। इसने बाद में अन्य एथनिक समूहों जैसे रोहिंग्या, शान, लाहू, करेन आदि के साथ एक गठबंधन तैयार किया जिससे इस संघर्ष को वृहत शक्ति और वृहत्तर फलक प्राप्त हो गया। म्यांमार द्वारा खोले जा रहे दरवाजों से उसे अपनी विस्तृत व विभिन्नतापूर्ण खनिज व वन संपदा, पन-बिजली क्षमता, कृषि योग्य भू-पट्टियों के कारण पश्चिमी निवेश हासिल हो रहे हैं जो म्यांमार की नृजातीय और आर्थिक समस्या को हल करने में मदद कर सकते हैं पर यह इस बात पर निर्भर करता है कि म्यांमार सुधारों की तरफ कितनी तेजी से बढ़ता है। काव को काचिन और शान प्रांत में अफीम और बंदूक के समिश्र को शांतिपूर्ण तरीके से समाप्त करना होगा जो दशकों से म्यांमार-थाईलैंड-लाओस के साथ गोल्डन ट्रैंगल के रूप में स्थापित है। 

फिलहाल टिन काव की डगर आसान नहीं है पर लोकतंत्र की इस सुबह का अपना महत्व है। म्यांमार में लोकतंत्र बहाली का सबसे बड़ा समर्थक भारत रहा है जो म्यांमार में निवेश, विशेषकर सिल्क तथा ‘लुक एक्ट’ के तहत व्यापार संवर्धन करने का पक्षधर भी है और पूर्वोत्तर के जरिए म्यांमार से कारोबार बढ़ाने पर भारत वर्ष 2011 से ही योजनागत तरीके से जोर दे रहा है। भारत और म्यांमार बिम्सटेक तथा गंगा-मेकांग को-ऑपरेशन (वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया और थाईलैंड के साथ) के प्रमुख सदस्य हैं। भारत ने म्यांमार को म्यांमार के साथ सैन्य सहयोग और म्यांमार की सेना के आधुनिकीकरण के लिए आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ भारत-म्यांमार मैत्री सड़क, भारत-म्यांमार-थाईलैण्ड मैत्री सड़क एवं कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट रूट के जरिए साझे अधिसंरचनात्मक विकास की पहले की है। यही नहीं म्यांमार ने पूर्वोत्तर के अलगाववादियों को अपनी जमीन का इस्तेमाल न करने का वचन भारत को दिया है इसलिए अपनी आंतरिक समस्याओं से निपटने के साथ-साथ संभव है कि टिन काव भारत-म्यांमार साझेदारी को आगे लेने में सहयोग करेंगे। 

(लेखक आिर्थक व राजनैतिक मामलों के जानकार हैं तथा यह उनके अपने विचार हैं।)

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