भूमि विवाद निपटाने की समय-सीमा तय हो

भूमि विवाद निपटाने की समय-सीमा तय होगाँव कनेक्शन

लखनऊ/रायबरेलीरायबरेली जिले के अलीपुर गाँव के रामलखन चौधरी (48 वर्ष) पिछले 31 वर्षों से अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर चल रहे विवाद को खत्म नहीं कर पा रहे हैं। इतने वर्षों में रामलखन तहसील के सौ से ज़्यादा चक्कर व चार वकील की बदली और हज़ारों रुपए खर्च कर चुके हैं। इसके बावजूद उन्हें अपनी ज़मीन नहीं मिल पाई है। प्रदेश मेंं ऐसे ही कई मामले चल रहे हैं।

रायबरेली जिले से 17 किमी. पश्चिम दिशा में अलीपुर गाँव के रहने वाले रामलखन अपनी परेशानी बताते हुए कहते हैं, ''गाँव में हमारी दादी मेड़ाना देवी के नाम पर साढ़े चार बीघा ज़मीन खरीदी थी। जिस पर हम सभी खेती करते थे। दादी की मृत्यु हो जाने के बाद हमारे पास के गाँव बथुआ के राम नरेश उन्हें अपनी बुआ बता कर ज़मीन पर अपना हिस्सा मांग रहे हैं।" 

अपने ज़मीनी विवाद के चक्कर में रामलखन को साल-दर-साल कचहरी, तहसील जाना पड़ा। वकीलों से बात करने पर यह पता चला कि यह पुराना विवाद है, इसके लिए गवाह ज़रूरी होंगे। अपने केस की सुनवाई के बारे में रामलखन बताते हैं, "जैसे-तैसे करके दो लोगों को गवाह बनने के लिए तैयार कर लिया। पेशी के लिए गवाहों सहित दो से तीन बार तहसील दिवस में भी जा चुका हूं। लेकिन अभी तक ज़मीन नहीं मिली है।"

वर्ष 1983 से चल रहा यह केस रामलखन सहित उनके पूरे परिवार के लिए सिरदर्द बना हुआ है। भले ही उनके पास खेती के लिए ज़मीन की कमी न हो पर उनका कहना है कि अपनी ज़मीन तो अपनी होती है न फिर वो चाहे कम हो या ज़्यादा दुख तो होता ही है।

केस में हो रही देरी की वजह बताते हुए रामलखन के भाई रामभरन चौधरी 52 वर्ष बताते हैं, "कई बार ऐसे मौके आएं, जिसमें हमने अपने सारे गवाहों को पेश कर दिया पर विपक्ष से उसी समय नोटिस मिल जाने से दूसरी सुनवाई तक केस बढ़ा दिया जाता था। ऐसे ही करते-करते तीस साल हो गए हैं।" 

लखनऊ में 15 वर्षों से ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को हल कर रहीं महिला वकील गीता तिवारी बताती हैं, "ज़्यादातर ज़मीन के विवाद में ज़मीन के केस मेड़ से शुरू होते हैं, जिनमें लोग दूसरे के खेतों को कब्ज़ा कर लेते हैं। ऐसे केसों के लिए किसानों को जागरूक किया जाना चाहिए।"

''इन दिक्कतों में किसान को यह मालूम होना चाहिए कि किस समयावधि में और कहां अपने केस को लेकर जाना चाहिए। ग्रामीणों में सबसे बड़ा आभाव शिक्षा का होता है, जिसके कारण वह अपनी बात नहीं रख पाता है और तहसील और कचहरी के चक्कर काटता है।" गीता आगे बताती हैं। 

उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि तक कु ल 5,89,296 केसों में 47,17,790 फैसले हुए थे जबकि 1,17,506 में अभी भी फैसला होना बाकी है। उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच में वर्ष 2014-15 के आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि तक कुल 5,89,296 केसों में 47,17,790 फैसले हुए जबकि 1,17,506 केसों में अभी बाकी है।

केसों की समय-सीमा निर्धारित हो 

ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले भूमि विवाद अधिक समय तक खिंच जाते हैं। इनमें कभी-कभी केस दायर करने वाले लोगों की मृत्यु हो जाने के बाद भी केस चलता रहता है। ऐसे में इस तरह के केसों के निवारण के लिए हर एक मामले की समय सीमा निर्धारित कर देनी चाहिए ताकि कोई भी केस ज़्यादा ना खिंचे और केस दायर करने वाले को शीघ्र न्याय मिल सके।

समयसीमा के बाद अधिकारियों की जवाबदेही हो

अगर किसी व्यक्ति का केस निर्घारित सीमा के अंदर नहीं हल हो पा रहा है तो मामले से संबंधित अधिकारियों को भी इसका खामियाजा भुगतना चाहिए। इसके तहत कोई भी व्यक्ति अधिकारी पर ज़्यादा समय तक केस खीचने के लिए आरटीआई की तरह ही कारण मांग सकता है। अगर अधिकारी ऐसा करने में असमर्थ होता है तो उसपर दंड का प्रावधान होना चाहिए।

लेखपालों के कार्य का ब्यौरा हो ऑनलाइन

अधिकतर गाँवों में भूमि से जुड़े मामलों का निस्तारण व देखरेख लेखपाल करता है। ऐसे में अगर किसी संबंधित गाँव का भूमि विवाद ज़्यादा दिन तक खिंचता है तो इसकी जि़म्मेदारी लेखपाल की भी होनी चाहिए। इसके लिए लेखपालों के कार्य का लेखाजोखा ऑनलाइन किया जाना चाहिए, जिससे यह पता चल पाएगा कि कौन से लेखपाल ने अपने क्षेत्र में कितना काम किया है।

मोबाइल कोर्ट की हो व्यवस्था

मोबाइल कोर्ट व्यवस्था स्थानीय सामाजिक और आर्थिक स्थिति से जुड़े मुद्दों को तीव्रता से सुलझाने के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि से जुड़े मुद्दों को क म समय में हल करने के लिए मोबाइल कोर्ट व्यवस्था अहम साबित हो सकती है। ऐसे में प्रदेश सरकार को ग्रामीण मामलों को हल करने के लिए सप्ताह में एक या दो बार हर एक ग्रामसभा में इसका संचालन किया जाना चाहिए। 

सही ढंग से लिखी जाए एफआईआर

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में उनकी कानूनी मामलों में सहायता करने वाली अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन (एपवा) की अध्यक्ष ताहिरा हसन बताती हैं, ''ग्रामीण अंचल में महिला किसानों के साथ बलात्कार के दो, तीन केस हमारे सामने आये जिनके पीछे दबंग आदमियों और माफियाओं का हाथ था। महिला की रिपोर्ट तक नहीं लिखी जा रही थी।" वो आगे बताती हैं, ''सबसे ज्यादा जरूरी है एफआईआर का सही ढंग से लिखा जाना। शुरुआत चौकी से होती है। ज्यादातर मामलों में पुलिस पीडि़ता के परिवार को बलात्कार के केस की जगह छेडख़ानी का मामला दर्ज कराने को कहते हैं, जिससे घर की बदनामी न हो।" 

तहसील दिवस की हो वीडियोग्राफी

प्रदेश में हर मंगलवार को प्रदेश सरकार की तरफ से लोगों को न्याय दिलाने के लिए तहसील दिवस का आयोजन किया जाता है। इनके तहत जिले के अधिकांश अधिकारी तहसील परिसर में एकत्रित्र होकर लोगों की समस्याओं को सुनते हैं। शुरुआत में तो ज्यादातर मामलों का निस्तारण हो जाता था लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ-साथ अधिकारियों की आनाकानी के कारण लोगों के मामलों की सुनवाई नहीं हो रही है। दूर-दूर से आए ग्रामीणों को अब बिना न्याय के ही वापस लौटना पड़ रहा हैतहसील दिवस में वीडियोग्राफी की व्यवस्था की जाए जिससे यह पता चलता रहे की कितने अधिकारी उपस्थित रहे और किन-किन मामलों का निस्तारण हो सका है और कितने पेंडिंग हैं।

रिपोर्टिंग : करन पाल सिंह/देवांशु मणि तिवारी

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