बिहार में मछली व्यवसाय की रफ्तार सुस्त क्यों? कब तक आंध्र प्रदेश की मछलियां खाएंगे लोग

बिहार में मछली उत्पादन के लिए भरपूर पानी, जमीन और मजदूर हैं बावजूद इसके बिहार के लोग आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से मछलियां मंगाकर खाते हैं। किसानों और जानकारों के मुताबिक सरकार की लचर नीतियों और तालाबों पर भू-माफियाओं के नजर के चलते यहां मछलियां एक बड़ी आबादी के लिए कमाई का जरिया नहीं बना रहीं।

Rahul JhaRahul Jha   3 Feb 2022 2:22 PM GMT

बिहार में मछली व्यवसाय की रफ्तार सुस्त क्यों? कब तक आंध्र प्रदेश की मछलियां खाएंगे लोग

सुपौल (बिहार)। क्षेत्रफल के हिसाब से बिहार 12वां सबसे बड़ा राज्य है, 17 प्रमुख नदिया हैं। बिहार में हजारों हेक्टेयर ऐसी भूमि है, जहां 5 से 6 माह पानी जमा रहता है। इसके बावजूद बिहार के लोग मछली के लिए आंध्र प्रदेश समेत दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं।

बिहार मत्स्य निदेशालय और सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में सलाना मछली उत्पादन करीब साढ़े लाख मीट्रिक टन है, जबकि खपत 8 लाख मीट्रिक टन है। बाकी दूसरे राज्यों से आती हैं, जिसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल की है। बिहार मत्स्य निदेशालय की वेबसाइट के मुताबिक (साल 2016-17) प्रदेश सभी स्रोतों से 5.9 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ था, जबकि 1.23 लाख मीट्रिक टन का आयात और 0.40 लाख मीट्रिक टन का निर्यात हुआ था। राज्य में बिंद, नाविक और मछुआरों की कुछ संख्या लगभग 01 करोड़ 75 लाख है, जबकि बिहार मत्स्य निदेशालय के आंकड़े के मुताबिक 2003 में सिर्फ 60 लाख मछुआरे ही मत्स्यपालन से जुड़े थे। इसकी संख्या दिनों-दिन घटती ही गई है। जो पलायन कर दूसरे राज्यों में मजदूरी या जीविका के दूसरे काम कर रहे है।

बिहार के थोक मछली विक्रेता संघ के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह, "बिहार में करीब 6 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन होता है, जबकि खपत 8 लाख मीट्रिक टन की खपत है। 2 लाख टन मछलियों के लिए लगभग दो हजार करोड़ रुपये बिहार के लोग आंध्र प्रदेश आदि को देते हैं।"

प्रदेश के एक बड़े इलाके में 4-6 महीने प्रचुर पानी, नदी और लो लैंड की बहुतायत होने के बावजूद मछली उत्पादन में पिछड़ने के लिए सुनील कुमार सिंह कहते हैं, "एक तो भू-माफियाओं का आतंक है, सब्सिडी और अनुदान का प्रावधान सही जगह तक नहीं जाना और मछली पालकों के लिए सरकार की असफल योजनाओं के वजह से बिहार में मछली व्यवसाय का ये हाल हैं कि इतने पानी होने के बावजूद बिहारी मछली के लिए आंध्र प्रदेश और बंगाल पर निर्भर है।"

मछली पालन को बढ़ावा देने के लिए बिहार मत्स्य निदेशालय की सहायक एजेंसी पीएमयू (प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट) के अधिकारियों के मुताबिक पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में मछली का उत्पादन तेजी से बढ़ा है, हालांकि वो ये भी मानते हैं कि कोविड योजनाओं को लागू करने में देरी हुई है, किसानों तक उतना फायदा नहीं पहुंचा।


पीएमयू में विषय विशेषज्ञ (मछली) प्रद्युम्न फोन पर बताते हैं, "बिहार में मछली के उत्पादन के लिए काफी संभावनाएं हैं, जिनपर कई योजनाओं के माध्यम से काम हो रहा है, और उसका फायदा भी दिखने लगा है। प्रदेश में इस साल में 6.83 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हुआ, पिछले साल (2020-21) में ये 6.42 लाख मीट्रिक टन था। योजनाओं के जरिए उत्पादन बढ़ाने, तकनीकी का समावेश, पोस्ट हार्वेस्ट मैनेजमेंट (फसल के बाद प्रबंधन) पर काम हो रहा है, जिसका दीर्घकालीन असर दिखेगा।"

प्रदेश में मछली पालकों की आय में बढ़ोतरी करने और इस व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए नीतीश सरकार द्वार की कई योजनाएं चलाई जा रही है। केंद्र प्रायोजित मत्स्य संपदा योजना के अलावा समेकित चौर विकास योजना और आद्र भूमि विकास समेत कई योजनाओं के जरिए मछ्ली उत्पादकों को भारी सब्सिडी देने का प्रावधान है। लेकिन मछली किसानों और मछुआरों का आरोप है कि सब्सिडी और अनुदान उनतक नहीं पहुंच पा रहा है।

साल 2021-22 के लिए बिहार सरकार ने मछली पालन और पशुपालन के लिए 1561.72 करोड़ का बजट प्रस्तावित किया था जो पिछले वर्ष (2020-21) की तुलना में 32.47 फीसदी अधिक था। मत्स्य निदेशालय के टोल फ्री नंबर पर मिली जानकारी के अनुसार प्रदेश में एक हेक्टयर तक का नया तालाब बनवाने पर 7 रुपए मिलता है। सरकार इस मद में अति पिछड़ा को 90 फीसदी जबकि सामान्य को 40 फीसदी सब्सिडी देती है। वहीं अगर पुराने तालाब में मोटर पंप लगवाना है तो 75 हजार रुपए तक मिलते हैं जिसमें अतिपिछड़ा की सब्सिडी 90 फीसदी और सामान्य के लिए 50 फीसदी है। प्रदेश की मुख्य योजनाओं में मुख्य समेकित चौर विकास योजना है। जिसके तहत ग्रामीण इलकों में वेट लैंड यानि तराई वाली जमीन पर मछ्ली और वानिकी के जरिए विकासशामिल है। इसमें एक हेक्टयेर में 8 लाख रुपए मिलते हैं। हालांकि ये योजना फिलहाल 6 जिलों में ही लागू है।

मुआवजा और अनुदान सही जगह तक नहीं पहुंचता

पिछले लॉकडाउन यानी 4 फरवरी 2021 को माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन करके बिहार के शिवहर जिला के बभनटोली के वेदांत राहुल ने बायो प्लॉग तकनीक से मछली पालन की शुरुआत की।

वेदांत राहुल बताते हैं कि, "लगभग एक साल मछली के व्यवसाय का होने वाला है। हमने दो यूनिट यानी 10 टैंक मछली पालन का शुरूआत किया था। जिसमें उस वक्त लगभग डेढ़ लाख रुपया खर्च हुआ था। अभी तक सरकार के तरफ से कोई मुआवजा और अनुदान नहीं मिला। अगर इस एक साल में फायदा की बात की जाए तो लागत छोड़कर सिर्फ 40 से 50 हजार रूपया हाथ में आया होगा। ऐसे में संभव नहीं है कि मैं आगे मछली व्यवसाय को ले जाऊं।"

"व्यापारी से खरीदकर कम मुनाफे पर बेचनी पड़ेंगी मछलियां"

बिहार राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 2021 साल में तीन बार आई बाढ़ से 3,763 करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ है। अनुमान के मुताबिक, इससे करीब 32-35 लाख किसान प्रभावित हुए हैं। उसमें भी मछली की खेती से जुड़े लोगों को सबसे अधिक घाटा उठाना पड़ा है।

कोसी क्षेत्र में किसानों के हक के लिए लड़ने वाले महेंद्र यादव बताते हैं कि, "फसल बर्बाद हुई तो कुछ रुपये मिल भी जाते हैं लेकिन मछली पालकों के हाथ खाली रह जाते हैं। जो किसान मछली पालन जैसे व्यवसायों से जुड़े हुए हैं, उनमें से 90% से ज्यादा किसान को मुआवजे के आवंटन के दौरान नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है। वे बाढ़ में अपनी महीनों की मेहनत और पैसा सब गवां देते हैं। मगर मुआवजे के नाम पर उन्हें कुछ नहीं मिलता।"


छेदन महतो सुपौल जिला के डगमारा के निवासी हैं। 2021 के जुलाई महीने में कोशी नदी में अचानक पानी उफान पर चढ़ने से छेदन के तालाब में भर गया और उनकी मछलियां तालाब से बाहर निकल आईं। छेदन 3 तालाब भाड़ा पर लिया हुआ था। इस बाढ से छेदन को लगभग एक लाख रुपए का नुकसान हुआ।

छेदन बताते हैं कि, "हमने बाढ़ आने से दो से तीन महीना पहले लगभग आठ सौ रूपए प्रति सैंकड़ा 50000 रुपए की मांगूर नस्ल की मछलियां खरीदी थी। साथ ही और लागत को देखा जाए तो लगभग लाख रुपए का नुकसान हुआ था। उसके बाद हमारे पास कोई दूसरा साधन नहीं था। ऐसे में बड़े व्यापारियों से मछलियां खरीदकर बेचना हमारी मजबूरी है। मुनाफ़ा कम मिलेगा लेकिन हमारे पास अन्य कोई रास्ता नहीं बचता। अभी तक एक रूपया की सरकारी मदद नहीं मिली है।"

"ऊपर बिजली, नीचे मछली" योजना नहीं उतरी धरातल पर

राष्ट्रीय मात्स्यिकी बोर्ड के द्वारा 2013 में मत्स्य पालकों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से तालाब के ऊपर सोलर प्लेट से बिजली उत्पादन और नीचे मत्स्य पालन की परियोजना बनायी थी और गाइडलाइन भी जारी की गई थी। 9 साल के बाद भी इस योजना में एक भी प्लांट नहीं लगाया जा सका है।

बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ के अध्यक्ष ऋषिकेश कश्यप कहते हैं कि, "अभी 2021 के दिसंबर महीने में सुपौल जिला के पिपरा प्रखंड के दीनापट्टी पंचायत के सखुआ गांव स्थित राजा पोखर में फ्लोटिंग सोलर पावर प्लांट कार्य की शुरुआत की गई है। देखिए 9 साल से अटकी यह योजना कब तक तैयार होती है?"

भू-माफियाओं के आतंक से दम तोड़ते बिहार के तालाब

साल 2017 में इंडिया वाटर पोर्टल की एक रिपोर्ट आई थी। जिसके अनुसार बिहार में 97982 तालाबों की संख्या थीं। वाटर पोर्टल की ही एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 20 साल पहले बिहार में तालाबों की संख्या लगभग 2.50 लाख के आसपास थी।

बिहार में सबसे ज्यादा तालाबों की संख्या मधुबनी और दरभंगा ज़िला में हैं। लेकिन आज भी दरभंगा और मधुबनी के कई ऐतिहासिक तालाब सरकार की उपेक्षा और भूमि मफियाओं के बढ़ते आतंक के चलते दम तोड़ रहे हैं। 1964 में प्रकाशित गजेटियर में दरभंगा के शहरी क्षेत्र में 300 से अधिक तालाबों की संख्या बताई गई थी। वहीं वर्ष 2016 में दरभंगा नगर निगम तालाबों और डबरों की कुल संख्या 84 बताई। पिछले पांच सालों में यह संख्या और कम हुई है।

मधुबनी जिला के फुलपरास के प्रगतिशील किसान राज झा बताते हैं, " विगत 10 वर्षों में बिहार में सबसे बड़ा नरसंहार तालाब के लिए ही हुआ है। मधुबनी के महमूदपुर में मछली के तालाब को लेकर महमूदपुर गांव के एक परिवार के 5 सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। यह हत्या जातिगत हत्या में बदल गई। इसलिए यह नरसंहार बड़ा बन गया। बिहार में पोखर और तालाब के लिए ऐसी कितनी ही हत्याएं हो जाती है।" उनके मुताबिक सैकड़ों तालाब विवादों के चलते सूख गए या परती पड़े हुए हैं, जिनकी कोई गिनती हमारे पास नहीं है।

पीएमयू (प्रोजेक्ट मैनेजमेंट यूनिट) के मुताबिक प्रदेश सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश करीब 9.2 लाख हेक्टेयर चौर लैंड हैं। पीएमयू के जुड़े विपिन कुमार कहते हैं, "9.2 लाख हेक्टेयर जमीन काफी होती है लेकिन इसे तकनीकी रुप से डेवलप नहीं किया जा पा रहा है क्योंकि पहले (पहले की सरकारों) में ध्यान नहीं दिया गया और ज्यादातर समय यहां पानी होता है इसलिए सर्वे तक नहीं हो पा रहा है। कुछ कोविड का भी असर रहा है। अब इस पर जोर है।"

बढ़ती आबादी और महंगाई तालाबों को गायब कर रही

बिहार के सुपौल जिला के बीना पंचायत के सुंदरपुर गांव में रेलवे स्टेशन के पास ही लगभग 120 कट्ठा (22 कट्ठा में एक एकड़) चाप (मछली पालन के लिए किया गया गड्ढा) था। अब यह चाप लगभग 40 कट्ठा मिट्टी से भर दिया गया है।

सुंदरपुर गांव के लालेश्वर शाह बताते हैं कि, "2020 के अगस्त महीने में ही गांव में रेलवे स्टेशन को बड़ी लाइन के रूप में पुनः शुरू किया गया। इसके बाद से ही स्टेशन के बगल वाले जमीन का रेट बढ़ने लगा। साथ ही गांव की आबादी भी धीरे-धीरे बढ़ रही है। इस सबको देखते हुए चाप के मालिक ने अपने 120 कट्ठा में से 40 कट्ठा चाप को भर दिया है। आगे बाकी चाप भी धीरे-धीरे ढक दिया जाएगा।"


"पग-पग पोखर माछ-मखान" के नाम से विश्व भर में जाना जाने वाले शहर दरभंगा के अजय साहनी जो मत्स्य पालन कार्य से जुड़े हुए हैं, बताते हैं कि, "पिछले 10-15 सालों से दर्जनों तालाबों को मिट्टी से भराई कर बेच दिया गया है। इसमें शहरी क्षेत्र के अलावा ग्रामीण क्षेत्र भी कम नहीं है। और जैसे-जैसे जमीन और महंगा होगी, पैसे वाले लोग तालाबों पर कब्जा जमाना शुरू कर देंगे।"

सरकार विभाग का पक्ष- जमीन विवाद में रुकता है अनुदान

सुपौल जिला के मत्स्य कृषि विभाग के हेड संजीव कुमार झा, जिन्हें सहरसा कृषि मत्स्य विभाग का भी हेड प्रभारी के रूप में नियुक्त किया गया है। बताते हैं कि, "अनुदान को मछली पालक के बीच लेकर सबसे ज्यादा शिकायत रहता है। इसका मुख्य वजह विवाद है। अधिकतर पोखर विवादित हैं। मछली पालन के शुरुआत में पोखर सरकारी रजिस्टर्ड हो जाता है और बाद में विवादों की वजह से मछली पालन बीच में ही रुक जाता है तो अनुदान रोकना पड़ता है।"

वह आगे कहते हैं, "तालाबों की सुरक्षा और कब्ज़ा मुक्ति का काम शहरी क्षेत्रों में नगर विकास वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण कार्य विभाग और भूमि राजस्व सुधार विभाग देखता है। सभी विभाग में तालमेल की कमी रहती है। इस वजह से भी तालाब या तो लुप्त हो रहे हैं या अतिक्रमित होते जा रहे हैं।"

कृषि पदाधिकारी मधेपुरा अरविंद झा बताते हैं कि, "कोरोना के पहले और दूसरे फेज में मछली के उत्पादन में कमी आई थी। फिर भी 'प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना' और बिहार मत्स्य पालन योजना बहुत हद तक बिहार में मछली व्यवसाई के लिए वरदान साबित हुआ। बाकी जब तक तालाबों को जलकर समूह और सहकारी समूह के हाथों नहीं दिया जाएगा। आंध्र प्रदेश से बिहार की मछलियों पर निर्भरता कम नहीं होगी।"

केंद्र सरकार का नीकी क्रांति (मछली पालन) पर फोकस

वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान 35 लाख करोड़ रुपये का बजट पेश करने के दौरान अन्य कृषि के अलावा मछली—पालन को बढ़ावा देने का भी वादा किया। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022-23 के लिए कृषि ऋण के लक्ष्य को बढ़ाकर 18 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। पिछले साल ये लक्ष्य 16.50 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। सरकार ने पशु, मछली पालन के लिए 10,000 करोड़ रुपये का फंड निर्धारित किया। साथ ही किसानों को जो क्रेडिट कार्ड दिया जाएगा, उस क्रेडिट कार्ड का मछली, पशु पालन के लिए भी उपयोग किया जा सकेगा।

बिहार का बजट

2021-22 वित्तीय वर्ष में बिहार सरकार के द्वारा दुग्ध उत्पादन और मछली पालन को मिलाकर के 1561.72 करोड़ रुपेए प्रस्तावित किया गया था। जिसमें 1176.96 करोड़ स्कीम मद में था और 384.76 करोड़ स्थापना और प्रतिबद्ध मद के लिए प्रस्तावित किया गया था। जो विगत वर्ष की तुलना में 32.47% अधिक था।

2021-22 वित्तीय वर्ष में बिहार सरकार के द्वारा मछली पालन के नए तालाब के निर्माण के लिए 90 प्रतिशत तक सब्सिडी का प्रावधान था। साथ ही 2022 तक मछली किसानों की आय दोगुना करने के उद्देश्य से बजट में मछली को बाजार तक पहुंचाने के लिए गाड़ी और आइस बॉक्स खरीदने पर अनुदान के लिए 17 करोड़ की राशि को स्वीकृति मिली थी। साथ ही गाड़ी खरीदने पर 4.8 लाख रुपए की सब्सिडी का प्रावधान था।

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