बिहार: 'सड़क पर स्कूल' आन्दोलन सरकारी स्कूल व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक कारगर रास्ता बन सकता है?

बिहार में 1 सितंबर को ऐसा कुछ हुआ जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। फोऱ लेन हाईवे के लिए एक सरकारी स्कूल इस वादे के साथ तोड़ा गया था कि जल्द नया भवन बनेगा। लेकिन ढाई साल बाद भी ऐसा नहीं हुआ, जिसके बाद 1600 छात्रों के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने सड़क पर स्कूल शुरु कर दिया था।

Rahul JhaRahul Jha   6 Sep 2021 1:46 PM GMT

बिहार: सड़क पर स्कूल आन्दोलन सरकारी स्कूल व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक कारगर रास्ता बन सकता है?

1 सितंबर को अपने नए स्कूल के निर्माण को लेकर भोजपुर जिले में छात्र-छात्राओं ने किया था आंदोलन। फोटो-अरेंजमेंट

बिहार के भोजपुर ज़िले में स्थित तारामणि भगवान साव उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोइलवर के सैकड़ों बच्चे और अभिभावक पहले नेशनल हाईवे पर बैठ कर स्कूल के लिए आंदोलन करते हैं फिर कोइलवर थाना को घेर कर अपने ही सहपाठियों के खिलाफ हुए दर्ज़ हुए मुकदमों को खत्म कराने के लिए आंदोलन करते हैं।

'सड़क पर स्कूल' आंदोलन की वजह क्या है?

1700 करोड़ रुपये की लागत से बने कोइलवर से बक्सर (छत्तीसगढ़) तक फोरलेन हाईवे निर्माण के दौरान भोजपुर जिले के कोईलवर में 66 वर्ष पुराने चर्चित व प्रतिष्ठित स्थानीय तारामणि भगवान साव विद्यालय को ढहा दिया गया और उस स्कूल परिसर को बीच में से तोड़कर फोरलेन सड़क निकाल दी गई थी। वादा किया गया था कि जल्द नया भवन मिलेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

कोरोना महामारी काल के दौरान बिहार सरकार की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था को झेलने के बाद जब अनलॉक की स्थिति में तारामणि भगवान साव उच्च माध्यमिक विद्यालय के छात्र पढ़ने आए तो स्कूल की स्थिति को देखते हुए उन्हें निराशा ही हाथ आयी। जिसके बाद छात्रों ने आंदोलन शुरु कर दिया।

उस दिन घंटी की जगह थाली बजाकर सड़क पर पाठशाला लगाई गयी। और पढ़ाई के साथ-साथ अभिभावक और छात्रों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी कि 'जब तक पढ़ने के लिए नहीं बनेगा नया स्कूल, तब तक सड़क पर ही चलेगा स्कूल।'

स्थानीय शिक्षक हिमांशु पाठक गांव कनेक्शन को फोन पर बताते हैं, "नए भवन के निर्माण और पठन-पाठन शुरु कराने के लिए एक सितम्बर को छात्र-छात्राओं को मजबूरी में सड़क पर स्कूल चलाना पड़ा।"

भोजपुर के कोइलवर में एक सितम्बर को 11 घंटे तक तक सड़क पर स्कूल आंदोलन चला। इससे अब्दुलबारी पुल से उत्तर बने नए सिक्स लेन पुल के पश्चिमी छोर के संपर्क मार्ग के एनएच 30 पर वाहनों का आना-जाना दिन भर बाधित रहा। महाजाम की स्थिति बनी रही।

आन्दोलन का तत्काल नतीजा छात्रों के पक्ष में आया। शाम चार बजे से अधिकारियों से करीब पांच घंटे तक वार्ता के बाद रात 9.30 बजे आंदोलन तब समाप्त हुआ, जब अफसरों ने 12 दिन में वैकल्पिक भवन में पढाई शुरू करने की लिखित घोषणा की। अफसरों ने बताया कि नए स्कूल के लिए 1.64 एकड़ भूमि चिन्हित कर ली गई है और जल्द ही पढ़ाई शुरू होगी।

लेकिन छात्र-छात्राओं की लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। हाईवे जाम करने के मामले में पुलिस ने कई छात्र-छात्राओं पर कई दर्जन लोगों पर मुकदमा कर दिया। जिसके बाद एक बार फिर स्कूल के सैकड़ों छात्र-छात्राओं और स्थानीय लोगों ने थाने पर प्रदर्शन किया, जिसके बाद प्रशासन ने केस वापस लिया। मुकदमा की वजह आयोजन में भाकपा माले (CPI-M) के विधायक मनोज मंजिल का शामिल होना भी बताया जा रहा है। ये आयोजन युवा विधायक मनोज मंजिल की पहल पर कोईलवर के स्थानीय अभिभावक मंच ने किया था।

स्थानीय लोगों का कहना है कि 1600 छात्र-छात्राओं का भविष्य स्कूल न होने की वजह से अंधकारमय हो रहा है।

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इस स्कूल में आसपास की कई ग्राम पंचायतों के 1600 बच्चे पढ़ते थे।

क्या यह आंदोलन सरकारी स्कूल व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए एक कारगर रास्ता बन सकता है?

इस सवाल का जवाब भाकपा माले विधायक मनोज मंजिल यूं देते हैं कि, "यह आंदोलन सरकार के व्यवस्था के खिलाफ एक शुरुआत हैं। पूंजीवाद भाजपा सरकारों के साथ मिलकर बिहार सरकार भी निजी स्कूलों को बढ़ावा देने और सरकारी स्कूल व्यवस्था को ध्वस्त करने में लिप्त है।"

वो कहते हैं, "छोटे-छोटे बच्चों का सड़क पर बैठ कर अपने स्कूल को बचाना और अपने सहपाठियों के लिए थाना घेरना बड़ी बात है है। और ये बिहार सरकार की सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति को दिखाने के लिए काफी है। इस मामले में बिहार सरकार अपनी जिम्मेवारी से भाग नहीं सकती।"

आन्दोलन की सफलता पर संदेह है?

"आखिरकार जब लिखित में अफसरों ने आश्वासन दिया कि 12 दिन में वैकल्पिक भवन की व्यवस्था कर पढ़ाई शुरू की जाएगी और स्कूल के लिए सरकार के द्वारा चिन्हित भूमि पर निर्माण शुरू किया जाएगा, तब छात्र-छात्राएं और अभिभावक आंदोलन को स्थगित करने पर राजी हुए। और फिर इसके बाद 50 छात्र-छात्राओं अभिभावकों पर आंदोलन को कुचलने के लिए रिपोर्ट कर दिया गया और टेंट वाले को गिरफ्तार कर लिया गया है। ऐसे में सरकार के वायदे पर संदेह होता हैं।" स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता और माले से जुड़े नेता भोला यादव कहते हैं।

हालांकि जब सैकड़ों की संख्या में छात्र-छात्राओं का जुटान हुआ और उन्होंने प्रशासन के खिलाफ 7-8 घंटे बिना खाएं-पिए कोइलवर थाने का घेराव किया तो प्रशासन को इन बच्चों की मांग माननी पड़ी।


मामला नया नहीं हैं

स्थानीय समाजसेवी मुनेश्वर राय गांव कनेक्शन को बताते हैं कि, "सड़क बनाने के लिए भवन का अधिग्रहण कर सरकार ने जनवरी 2019 में ही विद्यालय को तोड़ दिया था। तब जल्द विद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहित कर नए भवन की बात कही गई थी, लेकिन ढाई वर्षों के बाद भी इस विद्यालय के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराई गई। साथ ही स्कूल से सटे मैदान के बड़े हिस्से को भी अधिग्रहित कर लिया गया।"

आगे वो बताते हैं कि, "ढाई साल के बाद भी इस विद्यालय में पढ़ने वाले 1600 छात्र-छात्राओं के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई जिससे छात्र-छत्राओं का भविष्य बर्बाद हो रहा था।"

तारामणि प्लस टू विद्यालय कोईलवर में पढ़ने वाले बच्चे जमालपुर, चंदा, हरिपुर, दौलतपुर, धनडीहा, फरहंगपुर आदि पंचायतों से तीन से चार किलोमीटर की दूरी तय करके आते थे।

विद्यालय टूटने के बाद कोईलवर बैजनाथ प्लस टू विद्यालय को कुल्हड़िया उच्च विद्यालय में शिफ्ट किया गया था। कोईलवर बैजनाथ प्लस टू विद्यालय से कुल्हड़िया उच्च विद्यालय की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है। 3-4 किलोमीटर दूर से आने वालों का सफर 8-9 किलोमीटर का एक तरफ से हो गया। साथ ही बच्चों को आरा-पटना नेशनल हाइवे होते हुए विद्यालय जाना पड़ता था, जो खतरे से खाली नहीं था।

कुछ महीने बाद में तोड़े गए स्कूल के बच्चों को, मिडिल स्कूल कोईलवर में शिफ्ट कर दिया गया था, जो कोईलवर बैजनाथ प्लस टू विद्यालय से नजदीक था। लेकिन इन 1600 बच्चों को स्थानीय ठिकाना नहीं मिल पा रहा था।

इस आन्दोलन पर बिहार के बच्चों की क्या राय है?

'सड़क पर स्कूल' आंदोलन और ढाई वर्ष से अधिक समय से पढ़ाई न होने को लेकर गांव कनेक्शन ने बिहार के कई राज्यों के बच्चों से सवाल पूछे।

सहरसा जिले में मनोहर हाई स्कूल की काजल बताती हैं कि, "कोरोना समय घरों में रहकर हम-लोग ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मजबूर थे, लेकिन इस दौर में सरकार बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई भी मुहैया नहीं करवा पा रही थीं। इस आन्दोलन की खबर सुनकर ऐसा लग रहा है कि अगर हम सभी एक हो जाएं तो शायद बिहार की शिक्षा व्यवस्था अच्छी हो जाएगी।"

सुपौल के विलियम्स हाई स्कूल की नौवीं की छात्रा प्रिया गांव कनेक्शन को बताती हैं कि, "इस आंदोलन की सबसे खास बात यह है कि अभिभावक ने भी छात्र का साथ दिया है। अगर अभिभावक जाग जाएंगे तो सरकार से शिक्षा का अधिकार लेना हमारे लिए आसान हो जाता है।"

अगर आंकड़ों की बात करें तो बिहार में ऑनलाइन पढ़ाई को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने लोकसभा में बताया था कि देश में 2.69 करोड़ छात्रों के पास डिजिटल डिवाइस नहीं है। उन्होंने कहा कि इनमें से अकेले बिहार में 1.43 करोड़ छात्रों ऐसे हैं जिनके पास स्मार्ट फोन या दूसरे संसाधन नहीं हैं।

बिहार सरकार के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में लगभग 2 करोड़ बच्चे स्कूलों में हैं। ऐसे में ये 1.43 करोड़ बच्चों के पास डिवाइस का नहीं होना बिहार के शिक्षा व्यवस्था को आइना दिखाता है।

क्या कहता है प्रशासन?

पुलिस-प्रशासन फ़िलहाल इसे छात्रों की लड़ाई मानने से इनकार कर रहा है।

भोजपुर जिले में सदर एसडीपीओ विनोद कुमार गांव कनेक्शन को बताते हैं कि,"कोरोना की वजह से विद्यालय के कार्य में देरी हुई है। प्रशासन जल्द से जल्द स्कूल का निर्माण शुरु कराएगा।"

एक प्रशासनिक अधिकारी फोन पर नाम न बताने की शर्त पर गांव कनेक्शन को बताते हैं कि, "सोशल मीडिया पर इसे छात्र आंदोलन बना कर मुद्दे से भटकाया जा रहा हैं। कोरोना के वजह से देरी जरूर हुई हैं लेकिन जल्द ही वैकल्पिक भवन की व्यवस्था कर पढ़ाई शुरू की जाएगी और स्कूल के लिए चिन्हित भूमि पर निर्माण शुरू किया जाएगा।"

प्रशासन का अपना जो भी बयान हो लेकिन विडंबना की बात है कि इसी विद्यालय के टूटे हुए स्टेडियम में धूम-धाम से सड़क व पुल का उद्घाटन किया गया, लेकिन विद्यालय भवन के पुनर्निर्माण और 1600 विद्यार्थियों की शिक्षा और पठन-पाठन की व्यवस्था अब तक भूली नजर आ रही थी।

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