छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले आलता पत्र बनाने वाले गरीब कारीगरों की मन्नतें कब होंगी पूरी?

करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास के पर्व छठ पूजा से लाखों लोगों की रोजी रोटी भी जुड़ी है। इनमें से एक आलता पत्र बनाने वाले भी हैं। हालांकि महंगाई के इस दौर में भी इसके कारीगरों बेहद कम पैसे मिलते हैं। कई गांवों में आलता पत्र का काम कुटीर उद्योग की तरह है लेकिन सरकारी उपेक्षा से न ये रोजगार बढ़ पा रहा, न इसमें शामिल लोगों की कमाई।

Sanjit BhartiSanjit Bharti   8 Nov 2021 12:45 PM GMT

छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाले आलता पत्र बनाने वाले गरीब कारीगरों की मन्नतें कब होंगी पूरी?

छत पूजा की सामग्री में शामिल हैं आलता पत्र (आरता पात्र)। 

अगर आप बिहार के सारण जिले के झौंवा गांव में इन दिनों जाएंगे तो हर घर में लाल रंग के पापड़ जैसी सामग्री बनती नजर आएगी। रुई और मैदा या फिर बेसन से बने ये आलता पत्र छठ (Chhath Poja) पूजा की अनिवार्य सामग्री हैं। लाल रंग के इन आलता पत्र जिन्हें आम बोल चाल की भाषा में आरता पात्र भी कहते हैं, का उपयोग सूर्य देव को अर्घ्य देने के अलावा घरों,दरवाजों और खिड़कियों पर चिपकाने में भी किया जाता है। इस बार भी छठ पूजा के लिए गांव में सभी लोग जुटे हैं लेकिन उन्हें इस बात की कसक भी है कि इतनी महंगाई के बावजूद उन्हें इसके बहुत थोड़े से पैसे मिलते हैं।

झौंवा गांव, सारण जिला मुख्यालय से करीब 25 किमी दूर दिघवारा प्रखंड में स्थित है। करीब 6000 की आबादी वाली पंचायत में 4 गांव हैं और ज्यादातर में ये काम होता है। पिछले सात-आठ दशकों से यह गांव, पवित्र अरता पात (आलता पात्र) के निर्माण लिए ज्यादा जाना जाता हैं। यही यहां के लोगों का स्थानीय पेशा है। करीब 250 घरों के बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक आज भी इस काम में शामिल हैं। ये काम करने वालों में हिंदू और मुस्लिम दोनों वर्गों के लोग शामिल है, उनमें भी 70 फीसदी महिलाएं हैं।

आरता पात्र (आलता पत्र) बनाते कारीगर। फोटो- संजीत भारती

अपनी लगभग पूरी जिंदगी आलता पत्र बनाने में गुजारने वाले बुजुर्ग कारीगर भगवान दास (65वर्ष) बचपन से ही इस काम में जुड़े हैं। वो कहते हैं, "इसे बनाने में बड़ी मेहनत लगती है। पहले अकवन की फली तोड़कर रूई निकाला जाता हैं, रूई में मैदा या बेसन मिलाया जाता हैं उसके बाद लाल रंग पानी में मिला कर सबको उबालना जाता है। फिर मिट्टी के बर्तन में रुई को गोल आकार देते हैं। बहुत मशक्कत का काम है लेकिन पैसे उतने नहीं मिलते।"

गोल-गोल आलता पात्रों को बनाने के बाद घर, छत, पगडंडी आदि पर इन्हें बड़े जतन से सुखाया जाता है फिर 20-50 के बंडल तैयार होते हैं। फिर बाजार में बेचने के लिए व्यापारियों के जरिए भेजे जाते हैं।

गांव के युवा कारीगर राजकुमार दास (45 वर्ष) आलता पत्र निर्माण से जुड़ी कई बातों को बड़ी बारीकी से बताते हैं। "20 पीस के एक बंडल हमें 20 रुपए मिलते हैं जो मार्केट में 40 रुपए के आसपास बिकता है।"

राजकुमार आगे कहते हैं, "एक परिवार औसतन 10 हजार रुपए की रुई खरीदता है। जिससे वो एक सीजन में 1000 बंडल बनाता है। तो पूरे सीजन में करीब 20-25 हजार की कुल कमाई होती है।"

उनके मुताबिक अगर सरकारी मशीन या ट्रेनिंग या फिर ब्रांडिंग आदि के लिए कुछ ट्रेनिंग और लोन का इंतजाम करवा दे तो ये काम वो बड़े पैमाने पर कर सकते हैं।

समय के साथ आलता पत्र बनाने के काम में कुछ बदलाव आए हैं लेकिन ज्यादातर काम पारंपरागत तरीकों से ही किए जाते हैं। रुई धुनने के लिए कुछ लोगों ने मशीनें लगा लगी हैं। लेकिन ज्यादा लोग काम हाथ से करते हैं, इस काम में महिलाओं की भागीदारी सबसे ज्यादा है।

आलता पत्र बनाने में परिवार के बच्चे से लेकर बढ़े तक लगते हैं। झौंवा गांव में अपने घर में आलता पत्र बनाती नेहा। फोटो- संजीत भारती

40 साल की गीता देवी जब से शादी होकर इस गांव में आई हैं यही काम कर रही हैं। उन्होंने ये काम अपने सास-ससुर से सीखा है। वो बताती हैं, "इस काम सें शारीरिक मेहनत बहुत ज्यादा है। मशीन से सिर्फ से रूई का धुनाई का काम होता है बाकि सब काम शारीरिक ही है। कुछ ऐसे काम है जिनसे बीमारियां भी हो जाती हैं।" गीता का इशारा रुई से उड़ने वाली धूल की तरफ था, उनके मुताबिक जो लोग लगातार रुई से धुनाई का काम करते हैं, उन्हें टीबी हो गई है। गांव में कई लोग इसके मरीज हो गए हैं।

आमदनी कम है लेकिन ये काम बहुत लोग आज भी बदस्तूर जारी रखे हुए हैं, क्योंकि कमाई का दूसरा कोई जरिया नहीं है, ऐसे लोगों में एक हैं निशा नजबून (40 वर्ष), उन्हें अपने 4 बच्चों को भरण पोषण के लिए इस सीजन का इंतजार रहता है। निशा बताती हैं, "ये काम दादा-दादी से सीखे थे, 11 साल हो गये हमारे पति को गुजरे हुए। इस काम को करने से जो आमदनी होती हैं उसी से परिवार चलाता है।"

वो आगे ये भी जोड़ती हैं कि इस काम में मेहतन के हिसाब आमदनी नहीं है ज्यादातर मुनाफा बड़े व्यापारी लोग ले जाते हैं।

निशा जैसे सैकड़ों कारीगरों से माल लेकर बड़े कारोबारियों से बेचने वाले एक स्थानीय व्यापारी अनिल कुमार के मुताबिक मुनाफा वो लोग ज्यादा कमाते हैं जो माल दूसरे राज्यों में भेजते हैं। वो कहते हैं, "हम लोग छोटे व्यापारी हैं। यहां के बनाये अरता पात की ब्रिकी राज्य के कई जिलों में पटना, भागलपुर, मुजफ्फरपुर आदि में होती है। फिर इन जिलों के बड़े व्यापारी माल को दूसरे राज्यों में भी भेजते हैं।" अऩिल ने इस सीजन में करीब 2 लाख रुपए मार्केट में लगाए थे। उनके मुताबिक छोटे कारीगर 15-20 हजार रुपए ले जाते हैं, फिर माल बनाकर देते हैं।

आलता पत्र बनाने वाले ज्यादा कागीगर पूरी तरह व्यापारियों पर निर्भर हैं। इस काम में जुड़े लोग ज्यादातर भूमिहीन हैं। आमदनी का दूसरा साधन ने होने पर वो व्यापारी से सीजन के पहले पैसा लेते रहते हैं, और उसी के हिसाब से फिर आलता पत्र के रेट तय होते हैं।

राजकुमार दास (40 वर्ष) कहते हैं, "हम लोगों को न तो कोई सरकारी मदद मिलती है न ही ट्रेनिंग। अगर लोन लेना होता है तो वो भी स्थानीय स्तर के व्यापरियों से लेते हैं। लेकिन वह घाटे का सौदा हौता हैं क्योकिं कर्ज के समय ही व्यापारियों से इसकी कीमत तय हो जाती हैं और जब समान तैयार हो जाता हैं तो इसकी कीमत बाजार में लगभग आधी रहती है, जिससे हमें काफी नुकसान उठाना पड़ता हैं।"

स्थानीय कारीगरों का कहना है अगर सरकार इस काम को कुटीर उद्योग (लघु उद्योग) में शामिल कर ले तो इस काम को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

"उद्योग का दर्जा मिल जाए लोन से मशीनें खरीद सकेंगे"

राजकुमार दास कहते हैं, "उद्योग का दर्जा मिल जाएगा तो बैंक से लोन मिल जाएगा तो हम लोग मशीन खरीद सकेंगे, ऐसे में अगर साल में 1000 बंड़ल बनाते हैं तो कई गुना ज्यादा बना सकेंगे। लेकिन हमारी तरफ किसी का ध्यान नहीं है।"

लोकल फॉर वोकल और आत्मनिर्भर भारत के नारों के बीच छठ के लिए आलता पत्र बनाने वाले इन सैकडों कारीगरों की इस बार यही मन्नत है कि सरकार उनकी तरफ भी ध्यान दे और कुछ ऐसी सहूलियत मिलें ताकि वो इस महंगाई में अपने इस परंपरागत काम तो जिंदा रख पाएं, युवा भी शहर की तरफ न भागकर गांव में इसे बिजनेस की तरह करें।

शाकाहारी रहकर बनाते हैं आलता पत्र

छठ पूजा का पर्व बहुत ही पवित्रता और स्वच्छता के साथ मनाया जाता है। इसलिए हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समुदाय के कारीगर इसका विशेष ख्याल रखते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक जो लोग इसका काम करते हैं वो सभी पूरी तरह शाकाहारी भोजन करते हैं। आलता पत्र का निर्माण अमूमन जुलाई महीने से शुरु हो जाता है और दीपावली के बाद छठ पूजा तक धूम धड़ाके से चलता है।

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