बिना क़िताबों के स्कूलों में पढ़ रहे हैं बच्चे

बिना क़िताबों के स्कूलों में पढ़ रहे हैं बच्चेगाँव कनेक्शन

लखनऊ। सरकारी स्कूलों में अप्रैल से शिक्षा सत्र शुरू होने के बाद बच्चे बिना किताबों के सवा महीने पढ़ भी लिए, अब गर्मियों की लंबी छुट्टी पर जाने वाले हैं। लेकिन जुलाई में इन बच्चों को किताबें पढ़ने के लिए मिलेंगी या नहीं, इस पर अभी भी संशय बरकरार है।

प्रदेश के 1.98 लाख प्राइमरी व अपर प्राइमरी स्कूलों में पढ़ने वाले लगभग 1.96 करोड़ बच्चों के लिए इस बार लगभग 13 करोड़ किताबें 250 करोड़ रुपये खर्च करके छापी जानी हैं। इन्हें बच्चों को मुफ्त में उपलब्ध कराया जाना है। लेकिन छापने के लिए अभी तक टेंडर की प्रक्रिया ही नहीं हो पाई है। हालांकि अब किताबों के ईको फ्रेंडली कागज को लेकर हाईकोर्ट में मंगलवार को सुनवाई है। इसके बाद ही तय होगा कि टेंडर कब जारी हो सकेगा।

राज्य सरकार द्वारा छह मई को कोर्ट में जवाब दाखिल किया जा चुका है। अगली सुनवाई 10 मई को होने के बाद ही इस मामले में फैसला आने की संभावना है। शिक्षा निदेशायल में पाठ्य पुस्तक अधिकारी अमरेन्द्र कुमार कहते हैं, “अभी इस मामले में मैं कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि मामला अदालत में है। इसलिए केवल फैसले का इंतजार कर रहे हैं।”

प्रिंटिंग प्रेस संचालकों व अन्य की ओर से हाईकोर्ट में दायर याचिका में ईको फ्रेंडली कागज पर किताबें छपवाए जाने की गुजारिश की गई है। इसके बाद किताबों के टेंडर आवंटन पर मंगलवार तक के लिए रोक लगा दी गई। 

इससे पहले प्रकाशकों के चयन के लिए चार अप्रैल को हुई टेक्निकल बिड में 32 प्रकाशकों ने टेंडर डाले। परीक्षण के बाद 15 के टेंडर खारिज कर दिए गए। बाद में हुई फाइनेंशियल बिड में सबसे कम रेट वाले प्रकाशक ने उस रेट पर छापने से इनकार कर दिया। इस कारण टेंडर निरस्त कर दिया गया। इसके बाद एक बार फिर से टेक्निकल बिड हुई, जिसमें 32 प्रकाशकों ने टेंडर डाले। 

रिपोर्टर - मीनल टिंगल

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