बॉलीवुड में महिला निर्देशकों की राह आसान नहीं

बॉलीवुड में महिला निर्देशकों की राह आसान नहींगाँव कनेक्शन

बॉलीवुड में महिला निर्देशक लगातार अपनी मौजूदगी का अहसास बनाने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। वर्ष 1926 से फातिमा बेग से शुरू हुआ यह संघर्ष आज 90 साल बीत जाने के बाद भी बरकरार है। इतनी कठिन राह होने के बाद भी महिला फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों से ना सिर्फ देश में नाम कमाया अपितु विदेशों में भी इनकी फिल्मों को खूब सराहा गया है। बॉलीवुड में महिला निर्देशक कम है तो फिल्में भी कम बन रही हैं।

एक बानगी देखिए, वर्ष 2015 में मात्र छह महिला निर्देशकों की फिल्में रिलीज हुईं। जिसमें जपिंदर कौर की दिलवाली जालिम गर्लफ्रेंड, जोया अख्तर की दिल धड़कने दो, राधिका राव की आई लव न्यू ईयर, बबिता पुरी की पृथ्वीपाल सिंह-ए स्टोरी, मेघना गुलजार की फिल्म तलवार और सोनाली बोस की मार्गरिटा विद ए स्ट्रा रिलीज हुई।

विदेशी मूल की हिन्दी अंग्रेजी फिल्म डायरेक्टर दीपा मेहता की हिन्दुस्तानी कलाकारों के साथ अंग्रेजी फिल्म बीबा ब्वायज भी रिलीज हुई जो कनाडा में रह रहे सिख युवाओं के गैंगस्टर बन जाने की कहानी है। रणदीप हुड्डा, जीत जौहर व गिया संधु की अहम भूमिका थी। 

पिछले साल 2014 में कुल 263 हिन्दी फिल्में रिलीज हुईं लेकिन महिला फिल्म निर्देशकों के खाते में केवल छह फिल्में ही जुड़ सकीं। जनवरी में दिव्या खोसला कुमार के निर्देशन में बनी डेब्यू फिल्म यारियां, संघमित्रा चौधरी की फिल्म स्ट्रिंग आफ पैशन, देविका भगत की वन बाई टू, नुपुर अस्थाना बेवकूफियां, तनुश्री चटर्जी बसु की पुरानी जीन्स व अक्टूबर में फराह  खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म हैप्पी न्यू ईयर रिलीज हुई।

हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के इतिहास में एक दौर ऐसा भी गुजरा है जब लखनऊ में जन्मी सई परांजपे, कल्पना लाजमी, दीपा मेहता, अपर्णा सेन, मीरा नायर जैसी महिला निर्देशिकाओं में होड़ सी रहती थी। सार्थक सिनेमा या समानान्तर सिनेमा को पहचान दिलवाने में इनकी खास भूमिका रही। इन निर्देशिकाओं ने कामसूत्र (मीरा नायर) व होमोसेक्सवुल्टी पर आधारित फिल्म फायर का दीपा मेहता द्वारा निर्माण कर समाज में फैली बुराइयों की वजह की ओर इशारा किया गया था। दीपा मेहता की एक फिल्म वाटर की शूटिंग से लेकर रिलीज तक बवाल मचा रहा। पर फिल्म ने अन्तरराष्ट्रीय सर्किट में वाहवाही के साथ पुरस्कार बटोरे। यही नहीं विदेश में पैदा हुई और वहीं पली बढ़ी भारतीय मूल की निर्देशिकाओं का भी अपना स्थान रहा है फिल्म इंडस्ट्री में दीपा मेहता और गुरविंदर चढ्ढा ऐसे ही नाम हैं। दीपा मेहता की ट्रायो और गुरुविंदर चढ्ढा की प्राइड एंड प्रेज्यूडिस, बेंड इट लाइक बेखम काफी चर्चित रही हैं।

समय के साथ ही अनेक महिला फिल्म निर्देशकों ने किस्मत आजमाई लेकिन निर्देशन की गाड़ी लम्बी दूरी नहीं तय कर सकी। इनमें हेमा मालिनी (दिल आशना है),  भावना तलवार (धर्म), रीमा कागती की फिल्म हनीमून ट्रैवेल्स प्राइवेट लिमिटेड, राजश्री ओझा की आएशा, चौराहे, किरन राव की धोबी घाट, पत्रकार से निर्देशिका बनी अनुषा रिजवी की पीपली लाइव, लीना यादव की शब्द व तीन पत्ती, रेवती की मित्र, माई फ्रेंड, 2008 में चर्चित फिल्म स्लम डॉग मिलेनियम की को-डायरेक्टर लवलीन टण्डन।

अगले साल 2016 में अभी तक घोषित प्रोजेक्ट्स में इंगलिश विंग्लिश फेम गौरी शिंदे ने अपनी नयी फिल्म की घोषणा की है और उस अनाम फिल्म का निर्माण कर रहे हैं करण जौहर। करण जौहर ने किरण राव को भी अपनी कम्पनी के तले एक फिल्म बनाने के लिए राजी किया है। जोया अख्तर वरुण धवन को लेकर अपने नये प्रोजेक्ट पर काम रही हैं। फिल्म का नाम अभी फाइनल नहीं हुआ है। गुरिन्दर चढ्ढा लेडी और लॉर्ड माउंटबेटन के जीवन पर आधारित बायोपिक वायसराय हाउस नाम की फिल्म को कम्पलीट करने में जुटी हुई हैं। पिछले दिनों उन्होंने जयपुर में सेट लगाकर छह हप्फ्तों का शिड्यूल पूरा किया है। इसमें पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी कलाकार साथ काम कर रहे हैं। अभिनेत्री हुमा कुरैशी भी एक खास रोल में दिखायी देंगी। पूजा भट्ट की फिल्म कैब्रेट भी रिलीज के लिए तैयार है। नंदिता दास की विवादित लेखक सआदत हसन मंटो पर बन रही बायोपिक मंटो जो पाकिस्तान में शूट की जाएगी।

अब इसे संयोग ही कहा जाएगा कि पिछले दो वर्षों की तरह ही आने वाले साल 2016 में भी छह महिला निर्देशिकाओं की फिल्में ही पर्दे का मुंह देखेंगी।

पहली भारतीय महिला फिल्म निर्देशक फातिमा बेगम

शुरुआती दौर में महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। इसी माहौल में एक महिला ने आगे बढ़कर निर्देशन की कमान सम्भाली, इनका नाम था फातिमा बेगम। ये बात है 1922 की। वे उर्दू बोलने वाले परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनकी तीन संतानें थीं जुबेदा, सुलताना व शहजादी। इन तीनों ने भी मूक सिनेमा में काफी नाम कमाया। उस जमाने के मशहूर निर्देशकों अर्देशिर ईरानी और नानूभाई देसाई से उन्होंने निर्देशकीय बारीकियां सीखीं। 1926 में 'बुलबुल परिस्तान' फिल्म का निर्माण कर फातिमा बेगम पहली भारतीय महिला निर्देशिका बन गयीं।

मशहूर महिला निर्देशकों की चर्चित फिल्में

दीपा मेहता : फायर (1996), 1947 द अर्थ (1998) व वाटर (2005)

कल्पना लाजमी : रुदाली (1993), दमन (2001)

अपर्णा सेन : 36 चौरंगी लेन (1981), मिस्टर एंड मिसेज अय्यर (2001)

सई परांजपे : स्पर्श (1980), चश्मे बद्दूर (1981), कथा (1983), साज (1997)

मीरा नायर : सलाम बाम्बे (1988), कामसूत्र (1996), मानसून वेडिंग (2001)

अरुणा राजे : शक (1976), गहराई (1980), सितम (1982), रिहाई(1988)

तनूजा चन्द्रा : ज़मीन आसमान (1995), मुमकिन (1996), दुश्मन (1998), संघर्ष (1999), जिन्दगी का स$फर (2001), सुर (2002), फिल्म स्टार (2005), जिन्दगी रॉक्स (2006), होप एंड लिटिल शुगर (2006)।

पूजा भट्ट : पाप (2003), हॉलीडे (2006), धोखा (2007), कजरारे (2010), जिस्म-2 (2012)

फराह खान : मैं हूं ना (2004), ओम शांति ओम (2007), तीस मार खां (2010), हैप्पी न्यू ईयर (2014)

जोया अख्तर : लक बाई चांस (2009), जिन्दगी फिर न मिलेगी दोबारा (2011), दिल धड़कने दो (2015)

मेघना गुलज़ार : फिलहाल (2002), जस्ट मैरिड (2007), दस कहानियां (2007), तलवार (2015)

कम ही सही, महिला निर्देशिका हैं तो 

फिल्म मेकिंग काफी टफ टास्क है। युवा निर्देशक की एपरोच यही होगी कि वह यूथ के लिए फिल्म बनाए। महिला निर्देशक की एपरोच महिला ओरिएंटेड फिल्म बनाने की होगी। आजकल फिल्म का जो नया ट्रेंड आया है उसमें क्या हिट होगा कहा नहीं जा सकता है। अब कम बजट की फिल्में हिट हो जाती हैं। जहां काफी पैसा इंवाल्व होता है वहां कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। कुछ ही सही महिला निर्देशिकाएं हैं तो सही।

मुजफ्फर अली, फिल्म निर्देशक 

महिला निर्देशकों का बैकग्राउंड फिल्मी 

मुझे खुशी है कि छह महिलाएं निर्देशक हैं। हमारे जमाने में तो इतनी भी नहीं हुआ करती थीं। पर मैं  कहना चाहूंगा कि ज्यादातर महिलाएं डायरेक्टर फिल्मी परिवार से जुड़ी हुई हैं चाहे वो जोया अख्तर हों, मेघना गुलजार हों, फराह खान हों, पूजा भट्ट हों या इंग्लिश विंग्लिश फेम गौरी शिंदे हों। हां, सीरियल में जरूर ज्यादातर राइटर व डायरेक्टर महिलाएं हैं। क्योंकि उनके सब्जेक्ट भी उन्हीं से ज्यादा रिलेट करते हैं।

अचला नागर, फिल्म लेखन

फिल्म निर्देशन एक स्पेसिफिक टास्क 

फिल्म निर्देशन एक बेहद स्पेसिफिक टास्क है। शारीरिक और मानसिक रूप से थका देने वाला काम है। ये बता पाना जरा मुश्किल है कि फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी महिलाओं के इतर महिला निर्देशिकाएं क्यों नहीं आ रही हैं। मैं तेहरान गया था जहां पर ईरान के फिल्म निर्देशकों के कट आउट लगे हैं और जो सबसे खास बात है वह यह है कि वहां एक चौथाई महिला निर्देशकों के कट आउट लगे हैं। जबकि वहां महिलाओं को यहां की तरह आजादी नहीं है।

अतुल तिवारी, लेखक व अभिनेता 

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