गीतकार मर गया, चाँद रोने आया 

गीतकार मर गया, चाँद रोने आया रामधारी सिंह दिनकर 

अनुलता राज नायर

सलिल कण हूँ, या पारावार हूँ मैं

स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं

बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत्त हूँ मैं

नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं

ये हैं वीररस के कवि, लेखक, निबंधकार, पद्म विभूषण श्री रामधारी सिंह दिनकर। वही दिनकर जिन्होंने उत्तेजक भावों और आवेग के साथ गर्जन तर्जन से भरी रचनाओं से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। ग़ुलाम भारत में उन्होंने कई ऐसी कविताओं का सृजन किया जिसमें उनका देश प्रेम भी दिखा और एक छटपटाहट भी नज़र आयी। अपनी एक रचना "रेणुका" में उन्होंने लिखा

जहाँ-जहाँ घन-तिमिर हृदय में

भर दो वहाँ विभा प्यारी,

दुर्बल प्राणों की नस-नस में

देव ! फूँक दो चिंगारी।

रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्म 23 सितम्बर 1908 में सिमरिया, मुंगेर, बिहार में हुआ था। उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। 1934 से 1947 तक बिहार सरकार की सेवा में सब-रजिस्टार और प्रचार विभाग के उपनिदेशक पदों पर कार्य किया। 1950 से 1952 तक मुज़फ्फरपुर कालेज में हिन्दी के विभागाध्यक्ष रहे, भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति के पद पर कार्य किया।

आज़ादी के पहले दिनकर को जहाँ विद्रोही कवि माना गया वहीं बाद में वे राष्ट्रकवि के नाम से जाने गए। एक तरफ दिनकर की कवितायें वीर रस से भरी याने ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति का आव्हान करने वाली थीं तो दूसरी ओर उन्होंने कोमल और श्रृंगार रस से भरी रचनाएं भी लिखीं। जैसे कुरुक्षेत्र और उर्वशी। जिनमें उर्वशी को ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया।

उर्वशी स्वर्ग की अप्सरा की कहानी है, जिन्हें पृथ्वीलोक के राजा पुरुरवा से प्रेम हो गया है और उन्हें स्वर्ग से निष्काषित कर दिया गया। कवि दिनकर ने गंधमादन पर्वत पर दोनों के प्रेम का ऐसा सुन्दर वर्णन किया है आँखों के सामने एक सतरंगा दृश्य खिंच जाता है। पुरुरवा उर्वशी से कहते हैं-

जब से हम-तुम मिले, न जानें, कितने अभिसारों में

रजनी कर श्रृंगार सितासित नभ में घूम चुकी है;

जानें, कितनी बार चन्द्रमा को, बारी-बारी से,

अमा चुरा ले गयी और फिर ज्योत्सना ले आई है।

जब से हम-तुम मिले, रूप के अगम, फुल कानन में

अनिमिष मेरी दृष्टि किसी विस्मय में ड़ूब गयी है,

अर्थ नहीं सूझता मुझे अपनी ही विकल गिरा का;

शब्दों से बनाती हैं जो मूर्त्तियां, तुम्हारे दृग से।

रचनाओं में ऐसी विविधता और किसी कवि में मिलना दुर्लभ है। उर्वशी के श्रृंगार को बराबरी से टक्कर देती है कुरुक्षेत्र की राजनीति। महाभारत पर आधारित ये प्रबंध काव्य सात भागों में रचा गया है। ऐसी गूढ़ पंक्तियाँ लिखी गयीं जिन्होंने पाठक के मन में अपना स्थायी ठिकाना बना लिया है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को,

जिसके पास गरल हो।

उसको क्या, जो दन्तहीन,

विषरहित, विनीत, सरल हो

यानि जिसके पास शक्ति हो वो क्षमा करे तो उसका अर्थ है, निःशक्त को ये अधिकार कहाँ प्राप्त है। सहज शब्दों में ऐसे गूढ़ अर्थ छिपे हैं कि पढ़ने वाला हैरान रह जाए। दशकों पहले लिखी गयी कई पंक्तियाँ आज भी उतनी ही सार्थक मालूम होती हैं- कुरुक्षेत्र के छटवें सर्ग याने जब महाभारत का युद्ध ख़त्म हुआ तब कवि ने लिखा है-

धर्म का दीपक, दया का दीप,

कब जलेगा,कब जलेगा, विश्व में भगवान?

कब सुकोमल ज्योति से अभिसिक्त

हो, सरस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण?

है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार,

पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार।

भोग-लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम,

बह रही असहाय नर की भावना निष्काम।

रामधारी सिंह दिनकर जी को संस्कृति के चार अध्याय के लिए साहित्य अकादमी से नवाज़ा गया था। इस रचना में कवि ने ये भाव व्यक्त किया है कि सांस्कृतिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद भारत एक देश है।

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दिनकर ने अपने पूरे जीवनकाल में अनवरत लेखन करके हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। उनकी रचनाओं में इतनी विविधता है कि हम कह सकते हैं कि एक लेखक के भीतर कई लेखक समाये हुए हैं। "रश्मिलोक" की भूमिका में उन्होंने लिखा भी है कि- 'ज्यों ज्यों मैं संसार की नई कविताओं से परिचित होता गया मेरी अपनी कविताओं की अदाएँ बदलती गईं।'

उनकी कुछ ख़ास काव्य रचनाएं हैं- प्रण-भंग, रेणुका, हुंकार, रसवंती, द्वन्द्व गीत, कुरूक्षेत्र, धूपछाँह, सामधेनी, बापू, इतिहास के आँसू, धूप और धुआँ, मिर्च का मज़ा, रश्मिरथी, दिल्ली, नीम के पत्ते, सूरज का ब्याह, नील कुसुम, नये सुभाषित, चक्रवाल, कविश्री, सीपी और शंख, उर्वशी, परशुराम की प्रतीक्षा, कोयला और कवित्व, मृत्तितिलक, आत्मा की आँखें, हारे को हरिनाम, भगवान के डाकिए।

26 जनवरी 1950 में भारतीय गणतंत्र का संविधान लागू किया गया तो दिनकर ने एक कविता लिखी जिसकी मशहूर पंक्ति है - 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है' और जनता और सत्ता के संदर्भ में ये पंक्तियाँ आज भी उतनी ही सार्थक और प्रासंगिक हैं।

सदियों की ठंढी, बुझी राख सुगबुगा उठी,

मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;

दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जब 1952 में जब भारत की पहली संसद का निर्माण हुआ तब रामधारी सिंह दिनकर राज्यसभा सदस्य चुने गए। इसी तरह 1965 से 1971 तक वे भारत सरकार के हिंदी सलाहकार रहे। इस दौरान उनका प्रवास दिल्ली में ही रहा।

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अपनी रचनाओं और शैक्षणिक योगदान के कारण उन्हें भागलपुर विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया। ये सम्मान उन्हें डॉ ज़ाकिर हुसैन के हाथों मिला जो उस वक्त बिहार के राज्यपाल थे। 1968 में राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें साहित्य-चूड़ामणि से सम्मानित किया।

बचपन में ग़रीबी के दिन काटने वाले दिनकर ने हिंदी साहित्य को इतना धनी कर दिया कि पीढ़ियां उनकी कृतज्ञ रहेगीं। कवि हरिवंश राय बच्चन ने तो इतना तक कहा कि, "दिनकरजी को एक नहीं, बल्कि गद्य, पद्य, भाषा और हिन्दी-सेवा के लिये अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिये जाने चाहिये।"

1999 में भारत सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया।

राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत इस जनकवि ने 24 अप्रैल 1974 को ये संसार छोड़ दिया, लेकिन अपनी रचनाओं का अनूठा संसार वो यहीं छोड़ गए। उनकी रचनाओं में यदि ग़ुलामी की पीड़ा है,तो क्रांति का उद्घोष भी है। उनमें शांति और निर्माण का संदेश है तो युद्धकाल की राष्ट्रीयता भी है। 'परशुराम की प्रतीक्षा' के परशु भारतीय जनता के सामूहिक आक्रोश और शक्ति के प्रतीक हैं।

अपनी रचनाओं और लेखन के लिए कवि दिनकर खुद कहते हैं कि - सुयश तो मुझे हुंकार से ही मिला, किन्तु आत्मा अब भी 'रसवन्ती' में बसती है। अंत में कुछ पंक्तियाँ उनकी एक रचना-कवि की मृत्यु से

जब गीतकार मर गया, चाँद रोने आया,

चांदनी मचलने लगी कफ़न बन जाने को

मलयानिल ने शव को कन्धों पर उठा लिया,

वन ने भेजे चन्दन श्री-खंड जलाने को

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