खुले में शौच के खिलाफ मुहिम छेड़ बने 'स्वच्छता के मास्टर'

सोशल मीडिया पर समय बिताने वाले शोएब ने स्वच्छाग्रही बन छेड़ा खुले में शौच के खिलाफ अभियान

लखीमपुर। फेसबुक पर लाइक व कमेंट में व्यस्त रहने वाले एक युवा जब स्वच्छ भारत मिशन से जुड़ा तो उसकी ज़िंदगी के मायने ही बदल गए। हालांकि इसके लिए उसे अपनों का विरोध भी झेलना पड़ा, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

"पढ़ाई के बाद जब स्वच्छ भारत मिशन से जुड़ने के लिए फार्म भरा तो नहीं पता था कि करना क्या होगा? पहले तो हम सीरियस नहीं लिए, लेकिन जब प्रशिक्षण शुरू हुआ तो हमें लगा कि हम भी कुछ कर सकते हैं," लखीमपुर के गुलामनगर गाँव के रहने वाले शोएब अहमद ने बताया, "जब हम इस काम से जुड़े तो पता चला कि हमें समाज के लिए नेक काम करने का मौका मिला है।"

शोएब अहमद

राजनीतिक पृष्ठिभूमि से होने से शोएब के पिता नहीं चाहते थे कि वह गाँव-गाँव जाकर खुले में शौच के खिलाफ छिड़े अभियान का हिस्सा बने, लेकिन शोएब को लगा कि उसके पास एक मौका आया है समाज के लिए कुछ करने का वह उसे गंवाना नहीं चाहेगा। स्वच्छाग्रही बनकर अपने निर्देशन में 42 मजरों की करीब 17-18 हजार की आबादी में शोएब ने खुले में शौच के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है।

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"पहले मम्मी-पापा को यह नहीं बताया कि क्या करेंगे, उनको बताया कि नौकरी है। घर पर लोग चिढ़ाते थे। बोलते- कहां चल दिए? भाई पचास हजार की नौकरी वाला देर कर देगा लेकिन शोएब देर नहीं करेंगे," शोएब अहमद ने बताया, "जब ट्रेनिंग के बाद पहली बार गाँव गए तो देखा कि कितनी बीमारी कहां से फैल रही है? फिर मुझे लगा कि इससे अच्छी व्यवस्था नहीं हो सकती थी।"

जैसे कि हर काम में शुरुआत में दिक्कत आती है शोएब को भी दिक्कतें आईं, लेकिन उन्होंने उसका हल भी निकाल लिया। "एक बात हमने देखी है कि अगर आप अच्छी बात किसी भी भाषा में बताएंगे तो लोग मानेंगे जरूर। अगर नियत सही है तो फर्क जरूर पड़ेगा, शोएब ने कहा, "काफी लोग इस मुहिम से जुड़े, उनको पता था कि इससे मिलना कुछ नहीं है। निगरानी समिति के लोगों को पता था कि कुछ मिलना नहीं है, लेकिन हमने सी को प्रेरित किया कि अगर आप इसे कर ले गए तो आगे की नस्लें नाम लेंगी।"

शोएब के साथ प्रशिक्षण ले रही टीम को बताया गया था कि शुरू में शौचालय का नाम नहीं लेना है, लेकिन इतना झकझोरना है कि गाँव के लोग खुद ही शौचालय की मांग करें।

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गाँव में लोगों को अपनी बात समझाने का सोएब ने नायाब तरीका निकाला, इसके लिए उसने गाँवों की महिलाओं को सबसे पहले समझाने की सोची। "माँ और बेटे का ऐसा रिश्ता होता है कि बताना नहीं पड़ता कि वो तुम्हारी मां है, बाप के बारे में बताना जरूर पड़ता है। हम माताओं से कहते थे कि अल्लाह और ईश्वर ने तुम्हारे कदमों में स्वर्ग और जन्नत डाल दी है। जब तक माताएं इस मिशन में नहीं जुड़ेंगी यह मिशन सफल नहीं हो सकता। हम लोग आप के गाँव में आप के लिए आए हैं, आप के बच्चों के लिए आए हैं।"

गंदगी के खिलाफ मेरी इस जंग का पत्नी ने भी किया था विरोध

बबौना (लखीमपुर), स्कूल में बच्चों को ज़िंदगी का ककहरा सिखाने वाले एक अध्यापक को असली धर्म तब समझ में आया जब उसने बड़ों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाना शुरू किया।

लखीमपुर के मितौली ब्लॉक के बबौना गाँव में रहने वाले स्वच्छाग्रही रामचंद्र ने ट्रेनिंग के दौरान जाना कि खुले में शौच से कितनी दिक्कतें होती हैं, और ग्रामीण जागरुकता के अभाव में किन-किन बीमारियों का शिकार होते हैं।

"जब हम इस अभियान से जुड़े तो मन में एक ही भाव आया कि अगर हमारे देश का सैनिक सीमा पर खड़ा होकर सुरक्षा कर सकता है तो हम तो घर के अंदर हैं। घरों में सबसे बड़ा दुश्मन तो गंदगी है, हमें इसमें योगदान देना चाहिए," स्वच्छाग्रही रामचंद्र ने बताया। राम चंद्र के इस काम में उनकी बेटी दीक्षा भी सा देती है।

"मैंने सभी को समझाना शुरू किया कि देखो यह मिशन है, सभी को लगना पड़ेगा, तभी सफल होगा। एक अकेला क्या कर सकता है? इसके बाद लोगों ने मजदूरी करके शौचालय बनवाना शुरू किया। अस्सी प्रतिशत लोगों ने तो उधार लेकर शौचालय बनवाए। एक-दो ने तो अपनी औरत के गहने गिरवी रख कर शौचालय बनवाए," रामचंद्र ने बताया।

इस अभियान से जुड़कर ऐसा नहीं कि रामचंद्र की राह आसान थी, इससे पहले अध्यापक के तौर पर बच्चों को स्कूल में पढ़ाने जाते थे तो लोग बड़ी इज्ज्त से पेश आते थे, लेकिन जब रामचंद्र गाँव में खुले में शौच के खिलाफ नारेबाजी करते या समझाने जाते तो लोग ताने कसते।

स्वच्छाग्रही रामचंद्र

"गाँव में निगरानी के लिए हमने वानर सेना बनाई, इसमें गाँव के बच्चों और बच्चियों को रखा। जब हम नारेबाजी करते हुए फालोअप (खुले में शौच से जाने से रोकने के लिए बार-बार जाना) के लिए जाते तो लोग कहते-देखो टट्टी वाले मास्टर आ गए, लेकिन हमने भी हार नहीं मानी, न उन लोगों की बातों पर ध्यान दिया," रामचन्द्र ने बताया, "हमारे इस काम का सबसे बड़ा विरोध तो घर में पत्नी ने किया। उसने बोला मिलता कुछ है नहीं दिनभर इसी में लगे रहते हो। जब मैंने पत्नी को इसकी जरूरत और अहमियत बताई तो वह मान गई।"

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गंदगी के खिलाफ इस युद्ध में रामचंद्र को जब भी हताशा ने घेरा उनके सारथी बनकर सेक्रेटरी वीरेन्द्र सिंह ने हर कदम समझाया। "सेक्रटरी वीरेन्द्र सिंह, जो अभी आईपीएस की परीक्षा देकर आए हैं, वह हमें समझाते कि देखिए रामचंद्र जी ज़िंदगी में पैसा ही सब कुछ नहीं होता है। अगर आत्मसंतुष्टि मिल रही है तो इससे अच्छा काम क्या हो सकता है। मौका मिला है समाज को कुछ देने का, इसे गंवाना मत।"

रामचन्द्र ने गाँवों में शौचालय बनवाने के लिए तरकीब निकालते हुए दुकानदारों से गाँव वालों को मौरंग, बालू और ईंट उधार में दिलवा दी। जब गाँव के लोगों को सरकारी मदद मिल गई तो दुकानदारों को वापस दिलवा दिया।

अध्यापक होने से रामचन्द्र को बच्चों को समझाने में काफी आसानी रही। "स्वच्छता के लिए बच्चों को जब स्कूल में समझाते तो उसका काफी असर पड़ा। बच्चों ने अपने घरों में बड़ों को समझाना शुरू किया। इससे काफी असर पड़ा। यही नहीं बच्चे अपने घरों में आने वाले मेहमानों को भी समझाते अगर वो बाहर शौच के लिए जाने की ज़िद करते।"

इस अभियान को जनांदोलन बनाना होगा


स्वच्छ भारत मिशन का मूल उद्देश्य है इसे जन आंदोलन बनाना। हमे पहले सोच बदलनी है, शौचालय को लोगों के दिमाग में बनाना है, तब यह धरातल पर बनता है। इस आंदोलन से हमने लोगों को जोड़ने की कोशिश की है। लखीमपुर जिले में हमें काफी सफलता मिली है, काफी प्रगति आई। जिले में प्रति परिवार शौचालय की उपलब्धता बढ़ गई है। इस जन आंदोलन में महिला, पुरुष और बच्चे सभी भागीदार हैं। इस अभियान में केन्द्र बिन्दु आम आदमी की सोच है, और जब आम आदमी किसी दूसरे समकक्ष की सोच में परिवर्तन देखता है तो प्रभावित होता है। ऐसे स्वच्छता चैंपियन की कहानियां जब दूसरे गाँवों में या जिलों में पहुंचेंगी उससे बहुत प्रभाव पड़ेगा। साफ-सफाई को सिर्फ शौचालय तक सीमित रखना बेमानी होगा, इसे हर तरह से अपनाना होगा। हमने सरकारी दफ्तरों में सोप बैंक बनाए हैं, उसके बाद स्कूलों में बांटा जाता है, इस दौरान स्कूल में बच्चों को सही से हाथ धोना भी सिखाया जाता है। स्कूलों में खेल-खेल में हम बच्चों को साफ-सफाई की जानकारी देते हैं। इस तरह हम हर तरीके से लोगों को इस जनांदोलन से जोड़ना चाहते हैं।

रवि रंजन, सीडीओ, लखीमपुर खीरी

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