गाय और भैंस के थनैला रोग से परेशान हैं तो ख़बर पढ़िए

पशुओं में थनैला रोग एक आम समस्या बनती जा रही है। इस बीमारी से भारतवर्ष में 60 प्रतिशत गाये, भैंसे और बकरी पीड़ित है। यही नहीं इसके कारण दुग्ध उत्पादकों को कई हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। अगर बाड़े (जहां पशु को रखा जाता है।) की साफ-सफाई की जाए तो इस बीमारी से पशुपालक को आर्थिक नुकसान से रोका जा सकता है।

थनैला रोग एक जीवाणु जनित रोग है। यह रोग ज्यादातर दुधारू पशु गाय, भैंस, बकरी को होता है। जब मौसम में नमी अधिक होती है तब इस बीमारी का प्रकोप और भी बढ़ जाता है। पशुचिकित्सक डॉ प्रदीप बताते हैं,"पशु के थन में लगी चोट, पशुपालक के गंदे हाथ, गंदा फर्श, पशु बाड़े में मक्खियों की ज्यादा संख्या में होना थनैला रोग को बढ़ाता है। पशु का दूध निकालने के बाद हाथों को अच्छी तरह साफ करके दूसरे पशु का दूध निकालना चाहिये। इससे रोग फैलने का प्रतिशत सबसे कम होता है। गंदगी से होने वाले विषाणु ही पशुओं में थनैला रोग पैदा करते हैं।"

थनैला रोग के लक्षणों के बारे में डॉ प्रदीप बताते हैं, "पहले जीवाणु पशुओं के बाहरी थन नलिका से अन्दर वाली थन नलिकाओं में प्रवेश करते हैं। उसके बाद उनकी संख्या बढ़ती है। तब पशुओं के थनों में सूजन आती है। अगर किसी पशु को थनैला रोग हुआ है तो उसका दूध पीने लायक नहीं होता है। इस बीमारी से पीडि़त पशु का दूध उत्पादन 5 से 25 प्रतिशत तक कम हो जाता है।"

इन कारणों से होता से यह रोग

  • थनों में चोट लगने।
  • थन पर गोबर और यूरिन कीचड़ का संक्रमण होने पर।
  • दूध दोहने के समय अच्छी तरह साफ-सफाई का न होना।
  • फर्श की अच्छी तरह साफ सफाई का न होना।
  • पूरी तरह से दूध का न निकलना।

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इस बीमारी से बचाव

  • पशु के बाड़े और उसके आसपास साफ-सफाई।
  • पशुओं का आवास हवादार होना चाहिए।
  • फर्श सूखा एवं साफ होना चाहिये
  • नियमित रूप से थनों की साफ-सफाई
  • एक पशु का दूध निकालने के बाद पशुपालक को अपने हाथ अच्छी तरह से धोने चाहिए।
  • पशु के थनों का समय-समय पर देखते रहना चाहिये। उनमें कोई गांठ या दूध में थक्के तो नहीं दिख रहे। अगर ऐसा हो तो तुरंत पशुचिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

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