ब्रेक्जि़ट! ब्रिटेन और एक्जि़ट को मिलाकर बना है

ब्रेक्जि़ट! ब्रिटेन और एक्जि़ट को मिलाकर बना हैgaonconnection

ब्रेक्जि़ट का तात्पर्य ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन से एकि्ज़ट मतलब बाहर निकलने से है। यूरोपियन यूनियन या ईयू, यूरोप के 28 देशों के बीच की आर्थिक और राजनैतिक साझेदारी है। यह मुक्त व्यापार क्षेत्र बन गया है जहां सदस्य देशों के बीच सामान और लोगों की आवाजाही के लिए खास तरह की आजादी है।

यूके के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने चुनावी वादे में कहा था कि वो देश के ईयू में रहने या अलग होने के बारे में जनमत संग्रह करवाएंगे। हाल में हुए इस जनमत संग्रह में 48 के मुकाबले 52 फीसदी लोगों ने यूके को ईयू से अलग करने के बारे में अपनी राय जाहिर की है। ईयू के 28 सदस्य देशों में से दस देश ऐसे हैं जो ईयू से मिलने वाली राशि के मुकाबले ईयू के बजट में देते ज्यादा हैं। इस लिहाज़ से ईयू में ब्रिटेन से ज्यादा केवल जर्मनी और फ्रांस का ही योगदान होता है। सन 2014-15 में ब्रिटेन का ये योगदान 8.8 बिलियन पाउंड था अब अगर आखिरकार ब्रिटेन ईयू का सदस्य नहीं रहता तो वो अपनी सीमाओं के अधिकार और आव्रजन नियमों को पूरे तौर पर अपने हाथ में लेगा।

तकनीकि रूप से वहां के सांसद ब्रिटेन के ईयू से इस अलगाव को रोक सकते हैं हालांकि लोगों के अपनी राय जाहिर कर देने के बाद ऐसा करना खासा जोखिम भरा हो सकता है। सच ये भी है कि रायशुमारी के ये नतीजे कानूनी बाध्यता नहीं रखते। ब्रिटेन की संसद में अभी ये फैसला होना बाकी है कि उनका देश अब ईयू का हिस्सा नहीं होगा। ब्रेकि्ज़ट के व्यवहार में आने के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को ईयू के साथ हुई संधि के आर्टिकल 50 को लागू करना होगा और डेविड कैमरन चाहते हैं कि ये काम वो नहीं बल्कि अक्टूबर में बनने वाला नया प्रधानमंत्री करे। हालांकि आर्टिकल 50 के सक्रिय होते ही ब्रेकि्ज़ट लागू हो जाएगा और उसके बाद ब्रेकि्ज़ट के संदर्भ में ब्रिटेन और ईयू के बीच दो साल तक मोलभाव भी चल सकता है। एक सूरत ये भी हो सकती है कि ब्रिटेन आर्टिकल 50 के लागू करने को 6-7 महीने के लिए टाल दे, इस दौरान ईयू में अपनी शर्तों के साथ बने रहने के लिए मोलभाव करे और फिर 2017 में फिर से अपने देश में ब्रेकि्ज़ट को लेकर रैफरैंन्डम करवाए।

हालांकि ब्रेकि्ज़ट को लेकर भारतीय बाजारों से लेकर दुनिया भर में बेचैनी देखी गई लेकिन अभी कुछ भी नतीजा निकाल लेना जल्दबाजी लगती है। लगता नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके खास प्रत्यक्ष या परोक्ष असर पड़ेंगे। आज की तारीख में यूके भारत के कुल निर्यात के 3.4 और आयात के 1.4 फीसदी का साझेदार है और इस पर भी खास असर नहीं पड़ेगा क्योंकि ब्रेकि्ज़ट से ईयू और यूके के रिश्ते प्रभावित होंगे न कि यूके और भारत के। ब्रिटेन से भारत में आया सीधा विदेशी निवेश भी वित्त वर्ष 2015 में एक बिलियन यूएस डॉलर और 2016 में 0.8 बिलियन डॉलर का रहा है और ये तुलनात्मक रूप से बहुत ज्यादा नहीं है। ब्रेकि्ज़ट का कुछ असर उन भारतीय कंपनियों पर हो सकता है जो ब्रिटेन या यूरोपियन यूनियन में कारोबार कर रही हैं लेकिन, ये असर सतह पर तब आएगा जब ईयू और ब्रिटेन के बीच कारोबार की नयी शर्तें तय हो जाएंगी और इसमें अभी साल दो साल तो लग ही जाएंगे। उल्टे ये जरूर है कि चूंकि ब्रेकि्ज़ट के सामने आने के बाद ब्रिटिश पौन्ड में 35 साल में सबसे बड़ी गिरावट देखने को मिली, लिहाज़ा वो भारतीय कंपनियां जो ब्रिटेन में सामान बनाती हैं उन्हें फायदा होगा।

कुछ दिलों में ये डर भी है कि इससे भारत में आने वाला विदेशी पूंजी निवेश कम होगा। जबकि आंकड़े कहते हैं कि 2016 में करंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के 1.5 फीसदी, विदेशी मुद्रा के करीब 63 बिलियन डॉलर और विदेशी निवेश के रिकॉर्ड 36 बिलियन डॉलर के साथ न सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है बल्कि इस तरह की वजहों से आने वाले छोटे-मोटे तूफानों को आसानी से झेल सकती है और जो थोड़ा बहुत असर होगा भी वो बस कुछ समय के लिये ही होगा। तो, ब्रेकि्ज़ट से घबराने की जरूरत नहीं हालांकि दुनिया की छठी बड़ी आर्थिक ताकत में हो रही घटना का असर एकदम नकारा भी नहीं जा सकता और सच ये भी है कि हर एक घटनाक्रम का अपना वजूद और असर होता है। परिस्थितियों, तथ्यों और आंकड़ों से बस असलियत के करीब एक अंदाजे तक ही पहुंचा जा सकता है।

(लेखक लाइव इंडिया टीवी में डिप्टी एडिटर हैं, ये लेखक के अपने व्यक्तिगत विचार हैं।)

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