बुंदेलखंड: कभी यहां पहाड़ियां दिखती थीं, अब पहाड़ियों से भी गहरे गड्ढे

Arvind ShukklaArvind Shukkla   11 Jun 2016 5:30 AM GMT

बुंदेलखंड: कभी यहां पहाड़ियां दिखती थीं, अब पहाड़ियों से भी गहरे गड्ढेgaonconnection

बहुत सम्भावना है कि जिस घर या दफ्तर में बैठ कर आप ये पढ़ रहे हैं, उसकी दीवारों या छत में किसी पहाड़ी से टूटा थोड़ा सा बुंदेलखंड है और जिस सड़क पर आप अपनी कॉलोनी में चल के आते हैं, उसकी सड़कों की गिट्टी-मौरंग में भी थोड़ा सा बुंदेलखंड है।

लेकिन आशंका ये है कि आने वाले वर्षों में शायद 70,000 वर्ग किलोमीटर में फैला बुंदेलखंड भी दोहन, अवैध खनन व शोषण के कारण थोड़ा सा ही बचे। देश के 18,000 करोड़ रुपये के रियल एस्टेट के कारोबार में बुंदेलखंड के पत्थर, मौरंग और बालू की बड़ी हिस्सेदारी है, लेकिन आनन फानन में हो रहा खनन इस विशाल क्षेत्र को बर्बाद कर रहा है।

उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पश्चिम जि़ले बांदा शहर में केन नदी का पुल पार करने के बाद महोबा को जोड़ने वाला 60 किलोमीटर का हाईवे-76 अवैध खनन से हुए विनाश की यही कहानी कह रहा है। इस सिंगल लेन हाइवे पर ट्रकों के पहियों से बनी रेखाएं बुंदेलखंड की किस्मत तय करती हैं।

हाईवे के दोनों तरफ टूटते पहाड़ों और दिन-रात चलते क्रशर की धूल आप की आंखों में चुभनी शुरू हो जाती है। केन, बेतवा समेत दूसरी कई नदियों से निकलने वाली मौरंग और पत्थरों की बदौलत प्रदेश सरकार को सालाना करीब 500 करोड़ से ज़्यादा रुपये का राजस्व मिलता है, यानी यूपी में खनिज से होने वाली कमाई का 40 फीसदी अकेले बुंदेलखंड से आता है। लेकिन अवैध खनन इससे कहीं ज्यादा बड़ी चपत सरकार को लगाता है।

लखनऊ से 200  किलोमीटर दक्षिण पश्चिम दिशा में बांदा जिले में चिल्लापुल के पास से आपको ट्रकों की लंबी कतार दिखनी शुरू हो जाएगी। बुंदेलखंड से मौरंग और पत्थरों से भरे ओवरलोडेड ट्रक और उनके टायरों की आवाज़ बांदा-महोबा हाईवे पर और बढ़ जाती है।

बुंदेलखंड में बांदा, हमीरपुर, झांसी और जालौन में मौरंग का खनन बड़े पैमाने पर होता है जबकि महोबा, चित्रकूट में ग्रेनाइट की खुदाई दिन-रात चलती है। पुल से झांकने पर ही केन नदी में पानी दिखता है। कुछ बच्चे पानी में खेलते मिल जाएंगे जो शायद सिर्फ बुंदेलखंड में मिलने वाला कीमती पत्थर शजर तलाश रहे हैं। केन के दूसरी तरफ सूखे खेत और बेजान से पेड़ दिखेंगे। हां हाईवे के दोनों छोरों पर गाँव और कस्बों में लाइन से खड़े ट्रक और कुछ दुकानें जरूर मिलेंगी। मटौंध में एक ढाबे पर चाय पीते हुए मिले सामाजिक कार्यकर्ता पुष्पेंद्र भाई बताते हैं, “सब पानी की माया है। खेती तो रही नहीं, पत्थर-बालू में जिंदगी तलाशते हैं लोग। इसे संतुलित करना होगा।”

मटौंध थाने के लगभग 500 मीटर दूरी बस्ती के किनारे एक पहाड़ी में खनन चल रहा है। यहां करीब 300 फीट से ऊंची पहाड़ी की एक चोटी दिखती है, लेकिन उसकी दूसरी तरफ इससे ज़्यादा गहरी खाईं। हाईवे से गाँव को जोड़ती सड़क पर प्लास्टिक का मटका लेकर पानी लेने जा रही एक महिला ने नाम तो नहीं बताया लेकिन इतना जरूर कहा, “ज्यादा देर यहां रुक कर फोटो-वोटो न खीचों बवाल हो जाएगा।” महिला का इशारा खनन माफिया के गुंडों की तरफ था। एक स्थानीय रिपोर्टर ने बताया, “हाईवे से 500 मीटर दूर खनन होना चाहिए लेकिन खुदाई करने वालों के पास पट्टा है, ऊपर प्रभावशाली लोगों का हाथ इसलिए कोई कुछ कर नहीं सकता है।”

मटौंध पार करने के कुछ आगे से महोबा की सीमा शुरू हो जाती है, यहां आपको जि़ला पूछने की जरूरत नहीं है। सबसे ज्यादा खनन व क्रशर वाले इलाके को देखकर ही लोग अंदाजा लगा लेते हैं। महोबा को तालाबों की नगरी कहा जाता है, तालाब तो दिखे पर उनमें कहीं धूल तो कहीं खुदाई करते मनरेगा के मजदूर मिले।

खनन से हवा में जहर

महोबा जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर पहले स्थित कबरई कस्बे को खनन और स्टोन की मंडी कहा जाता है। अकेले कबरई और उसके आसपास 300 से ज्यादा स्टोन क्रशर हैं, जो पहाड़ कभी जमीन से 250-300 फीट ऊंचे दिखाई देते थे वहां अब इससे ज्यादा गहरे गड्ढे हो गए हैं। विस्फोटक और भीमकाय मशीनों से तोड़ी जाती पहाड़ियों और कुछ-कुछ दूरी पर चल रहे बड़े-बड़े क्रशर प्लांटों से उड़ती धूल यहां की आबोहवा में जहर घोल रही है।

कम भूमिगत जल की गंभीर समस्या से जूझ रहे महोबा के लोग सूखे से ज़्यादा पत्थरों की धूल से परेशान हैं। महोबा में डहर्रा निवासी चंद्रपाल सिंह (56 वर्ष) अपने घर के पास चल रहे एक स्टोर क्रशर को दिखाते हुए कहते हैं, “गांव के चारों ओर क्रशर चल रहे हैं।  बड़ी-बड़ी पहाड़ियों इन्हीं क्रशर में गायब हो गईं। इस धूल ने हमारी जमीन और जिंदगी दोनों बर्बाद कर दी हैं। हम खाना भले रोज न खाएं लेकिन 50 ग्राम पत्थरों की ये धूल जरूर खाते हैं।” 

चंद्रपाल सिंह के मुताबिक उनके गाँव में दो दर्जन से ज्यादा टीबी के मरीज होंगे, जबकि कई लोगों की इससे मौत हो चुकी है। उनके गाँव और आस-पास कबरई में ही करीब 300 क्रशर हैं, जिनमें से अधिकांश में नियम और कानून को ताक पर  रखकर पत्थर पीसे जाते हैं। हालात ये हैं कि रेलवे झांसी-बांदा रेलवे ट्रैक से बिल्कुल पास क्रशर चल रहे हैं, जिनकी धूल रेलवे के ड्राइवर तक को परेशान करती है। लोको पायलट अशोक वर्मा (38 वर्ष) बताते हैं, “कबरई के आसपास बहुत दिक्कत है, अमूमन ड्राइवर एक किलोमीटर तक का सिग्नल देख लेते हैं लेकिन कबरई और इधर बांदा-चित्रकूट लाइन पर भरतकूप के पास विजिविलिटी काफी कम हो जाती है। दिखाई तो दूर सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है।” कबरई में ही बांदा-महोबा हाईवे से कानपुर के लिए एक हाईवे निकलता है।

सागर-कानपुर रोड पर शाम को पांच-छह बजे से धुंध की चादर और गहरी हो जाती है। इसी रोड पर करीब दो किलोमीटर आगे चलने पर जगभान सिंह (50 वर्ष) रहते हैं। उनके घर की बाउड्री 10 फीट से ऊंची है, ये बाउंड्री किसी चोर उचक्के से नहीं बल्कि धूल से बचने की कोशिश है।

स्टोन क्रशर शब्द जुबान पर आते ही गुस्से में कहते हैं, “देखा होगा आपने सड़क के किनारे सबको जल्दी-जल्दी माल निकालना (खनन) है, जैसे अंग्रेज हैं कि आज नहीं निकाले तो कल मिलेगा नहीं। मजबूरी नहीं होती तो इस इलाके में कभी नहीं रहता।”

कबरई के डहर्रा कस्बे में खनन के चलते एक पहाड़ों के बीच हुए विशालकाय गड‍्ढा झील की शक्ल ले चुका है। “खनन और क्रेसर से उपजाऊ जमीन बर्बाद हो गई है,” उस गड्ढे को दिखाते हुए स्थानीय निवासी पंकज सिंह परिहार बताते हैं। पंकज क्रशर की शर्तों को लेकर कई बार सूचना के अधिकार के तहत आवेदन दे चुके हैं।

“खेती योग्य जमीन पर क्रशर लग रहे हैं। खेती तो महोबा से लुप्त हो गई है। नियमत क्रशर उस जमीन पर लगना चाहिए जिसका लगान न जाता हो और वो आबादी, स्कूल से दूर हो।” पंकज कहते हैं, “अगर इसी रफ्तार में पहाड़ों खनन जारी  रहा तो दो-तीन वर्षों में जिले में कोई पहाड़ नजर नजर नहीं आएगा।”        

खनन के मानक

  • किसी भी ऐतिहासिक, पुरातत्व स्थल के 100 मी. तक खनन कार्य वर्जित है तथा 200 मी. तक खनन व निर्माण कार्य के लिये पुरातत्व विभाग से एनओसी लेना अनिवार्य हैै।
  • मानक के मुताबिक रेलवे ट्रैक से 500 मीटर की दूरी पर क्रशर जैसी गतिविधि मान्य है। 
  • क्रशर से धूल न उड़े इसके लिए गिट्टी और राख पर लगातार फव्वारा चलना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं।
  • क्रशर के क्षेत्रफल के अनुपात में आसपास पेड़-पौधे लगाए जाने चाहिए, लेकिन हरित पट्टी सिर्फ कागजों पर होती है।
  • खदान और क्रशर पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा,
  • नेशनल हाइवे, कृषि भूमि, हरित पटिट्का से एक किलो मी. दूर स्थापित हो क्रशर उद्योग, बालू खदान नदी से 500 मी. की दूरी पर लगाई जाय मगर यहाँ लगे है नेशनल हाइवे, कृषि भूमि पद सैकड़ों प्लान्ट।

खनन के पीछे का खेल

  • अमोनियम नाइट्रेट और जिलेट की छड़ से हैवी 6 इंच का होल करके ड्रिलिंग मशीन से ब्लास्टिंग होती है।
  • दिन-रात अर्थ मूविंग मशीन मसलन पोकलैंड, जेसीबी लगाकर दो सौ मीटर पहाड़ों को पाताल तक खोदा जाता है जब तक पानी न निकले। कई बार खान में निकले पानी को पंप कर बाहर फेंक देते हैं, जिससे भूमिगत जल की बर्बादी होती है।
  • खनिज रायल्टी एमएम 11 प्रपत्र की चोरी करके तीन घनमीटर में 100 फिट दिखलाते हैं जबकि यह ओवर लोडिंग सैकड़ों टन में है।

सरकार को गाँव कनेक्शन के सुझाव

  • पहाड़ और नदी दोनों में खनन, भू-वैज्ञानिकों की सलाह पर वैज्ञानिक तरीके से हो। 
  • जो पहाड़ खोदे गए हैं, उनकी लेवलिंग हो या उन्हें तालाब में परिवर्तित करें। ताकि उसमें वर्षा जल का संचयन हो सके।
  • खनन का अधिक से अधिक लाभ स्थानीय लोगों को मिलना चाहिए। खनन सुरक्षा अधिनियम का कड़ाई से पालन हो।
  • खनन के अनुपात में पौधारोपड़ हो। जो क्रशर चल रहे हैं किसी भी हालत में उनसे धूल न उड़े। 
  • ग्रेनाइट के बड़े पत्थरों को तराश और पॉलिस कर उनका मूल्य बढ़ाया जाए। टेल्क पाउडर की यूनिट लगाई जाए।

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