बुंदलेखंड में सूखे से लड़ रही महिलाओं की फौज

बुंदलेखंड में सूखे से लड़ रही महिलाओं की फौजgaonconnection

जालौन (उप्र)। ज़िले के माधौगढ़ तहसील मुख्यालय की ओर जाने वाली मुख्य सड़क पर अचानक बहुत सी महिलाओं ने डेरा डालकर, जाम लगा दिया। जाम लंबा हो गया तो आनन-फानन में वहां पहुंचे अधिकारियों ने जब महिलाओं से वजह जानी तो वो भौचक्के रह गए। 

जिला मुख्यालय ओरई से 40 किमी दूर एक सड़क पर घंटों जाम लगाए इकट्ठा ये महिलाएं मांग कर रही थीं कि उनकी रामपुरा पंचायत के चारों गाँवों में जाने वाली माइनर में पानी पहुंचे और उसकी सफाई करवाई जाए। अधिकारियों को जो एक छोटी सी बात लगी, वो इन महिलाओं के लिए पानी पर उनके अधिकार की एक बड़ी लड़ाई की शुरुआत थी। 

पानी पर अपना हक जताने के लिए रामपुरा पंचायत की ये महिलाएं चौका-चूल्हा छोड़कर बिना समाज के तानों की परवाह किए अपनी चाहरदीवारी पार करके सड़क पर उतर पड़ीं। 

इस लड़ाई के कारण ही आज रामपुरा पंचायत में आने वाले मल्हानपुरा जैसे गाँवों में सूखे का असर कम दिखाई पड़ता है। यहां के हैंडपम्पों में पानी आता है, तालाब हैं जिनमें पानी है, चेकडैम हैं जिन्हें आने वाली बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए दुरुस्त कर दिया गया है। नए चेकडैम बनाने की जगह तलाश कर प्रस्ताव प्रशासन को दे दिया गया है।

“दूसरे गाँवों में तो पानी पहुंचाने को टैंकर जा रहे हैं, लेकिन हमारे गाँव में एक भी टैंकर की ज़रूरत नहीं पड़ी। हमने अपना पानी खुद सहेजा है, और इसीलिए हमको दिक्कत नहीं हुई।” चटख़ पीले रंग की साड़ी और बरसात में न फिसलने वाली काली प्लास्टिक-रबर की बनी चप्पल पहने खड़ीं सोमवती (60 वर्ष) ने कहा। 

सोमवती पानी के लिए लड़ने वाली गाँव की कार्यकर्ताओं में से एक हैं। पानी पंचायत या जल सहेली नाम के ये प्रयोग बुंदेलखंड के सिर्फ जालौन जिले तक सीमित नहीं बल्कि यूपी-बुंदेलखंड के हमीरपुर और ललितपुर व समान प्रयोग एमपी-बुंदेलखंड के टीकमगढ़ और छतरपुर में चल रहे हैं। सैकड़ों की संख्या में बुंदेली महिलाओं ने सूखे से इस लड़ाई में कमान संभाली है। पानी की लड़ाई लेकर बुंदेलखंड की सड़कों पर उतर रहीं ये महिलाएं कोई असंगठित भीड़ नहीं है बल्कि एक सोची-समझी संगठित ताकत है। 

महिलाओं की ये संगठित ताकत अब बुंदेलखंड के यूपी-एमपी में आने वाले 13 में से कई जिलों में बारिश के पानी को बचाने, पहले से मौजूद पानी को व्यवस्थित करने और उस पर से एकाधिकार को समाप्त करने के लिए जंग छेड़े हुए है। ‘पानी पंचायत’ नाम के एक प्रयोग से उभरीं इन महिलाओं को ‘जल सहेलियां’ बुलाया जाता है, जो कहीं बाहर से नहीं आईं बल्कि गाँवों की ही बहु, बेटियां और माएं हैं, जो उकता गईं। इन्हें अब पानी पर अधिकार की लड़ाई में अगर सड़क पर उतरना पड़े, तहसील में चढ़ाई करनी पड़े, जेल तक जाना पड़े तो कोई झिझक नहीं। 

मल्हानपुर गाँव की ही एक नई बहू जो नाम बताने में तो कतराती हैं लेकिन जब पानी बचाने की बात आई तो संघर्ष से पीछे नहीं हटीं। वो जब गाँव आईं तो उन्हें भी पानी की कमी के चलते खाना बनाने से लेकर, सफाई-धुलाई, बच्चों को नहलाने आदि कार्यों के लिए पानी की व्यवस्था करने में खासा मशक्कत करनी पड़ती थी। वो बताती हैं, “हर काम में तो हमें पानी लगता है और उसी के लिए इतनी मुशकिल उठानी पड़ती थी। अब सब ठीक हो गया है”।  

मल्हानपुरा गाँव में पहली बार साल 2011 में परमार्थ समाज सेवी संस्थान नाम के एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ने महिलाओं को जागरूक करके उन्हें पानी पर हक दिलाने के लिए पानी पंचायत का गठन किया। इस पंचायत में स्वेच्छा से आगे आईं गाँव की महिलओं को ‘जल सहेली’ नाम देकर उन्हें मुख्य कार्यकर्ता बनाया गया। इस गाँव के साथ ही पूरी पंचायत में इस समय 20 जल सहेलियां हैं, और पांच पुरुष सहायक हैं जो इन्हें अधिकारियों के पास लाने-ले जाने या सामग्री जुटाने में मदद करते हैं। जल सहेलियों का काम क्षेत्र के पानी को व्यवस्थित करना, तालाब-चेकडैम में अतिक्रमण के खिलाफ आवाज़ उठाना और पानी बचाने के नए उपायों को सोचना था। 

“बड़ा कुछ करने से पहले छोटी-छोटी चीजें ठीक कीं, जैसे- हैंडपाइप  का पानी बह जाता था, कीचड़ होता था तो इससे निपटने के लिए हैंडपाइप के साथ एक सोख्त़ा गड्ढा बनाया, जिसमें बचा हुआ पानी जाता है और फिर वहां से ज़मीन में चला जाता है,” मल्हानपुरा गाँव की सोमवती (55 वर्ष) नाम की ही एक अन्य जल सहेली ने बताया। सोमवती ने यह भी बताया कि उन लोगों ने मिलकर खुद ही हैंडपम्प सही करने सीखे और गाँव के पम्पों को दुरुस्त किया। गाँव में आने वाली माइनरों का रास्ता भी पानी के बराबरी के बंटवारे को ध्यान में रखते हुए दोबारा प्लान किया।

जालौन की माधौगढ़ तहसील में जल सहेलियों को संगठित करने के लिए एनजीओ की ओर से काम कर रहे कार्यकर्ता संतोष बताते हैं, “सुनने में यह छोटी बात लग सकती है लेकिन दरअसल बुंदेलखंड के गाँवों में महिलाओं को पानी की लड़ाई में आगे लाना एक बड़ा मुद्दा है। उनसे ज्यादा पानी के महत्व को कोई नहीं समझता। इसीलिए पुरुषों की अपेक्षा पानी बचाने को लेकर वो ज्यादा गंभीर होती हैं।” 

पानी पर अधिकार की जो लड़ाई ये महिलाएं लड़ रही हैं वो सिर्फ बुदेलखंड तक भी सीमित नहीं बल्कि महाराष्ट्र जैसे क्षेत्र जो पानी की कमी से उपजे सूखे को झेल रहे वहां भी इस तरह के कई संघर्ष चल रहे हैं। इसी तरह के एक संघर्ष का जि़क्र देश के ग्रामीण मुद्दों के जानकार पत्रकार और समाजसेवी पी.साईंनाथ ने भी किया था। साईंनाथ ने चेताया था कि ज़मीन पर जो पानी मौजूद है वो गरीबी-अमीरी की खाई के बीच असमान तरीके से बंट रहा है। पानी का व्यावसायीकरण किया जा रहा है। इससे निपटने के साथ ही पानी पर गाँवों-देहातों के लोगों को अधिकार देना होगा। साईंनाथ स्वयं पानी पर महिलाओं के अधिकार की अगुवाई में कई कहानियां लिख चुके हैं।

सूखे की लड़ाई के साथ अन्य समस्याओं के खिलाफ मोर्चा: पानी की मूलभूत आवश्यक्ता को पूरा करने के लिए जंग छेड़ने वाली ये महिलाएं सिर्फ यहीं तक नहीं रुकीं। इन्होंने मिलकर अपनी पंचायत में होने वाले सरकारी निर्माणों में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी। राशन और मिट्टी का तेल देन में गड़बड़ी करने वाले कोटेदार की शामत ला दी। पात्रों को सरकार की ओर से मिलने वाले आवास दिलवाए, शौचालयों के निर्माण करवाए। गाँव की एक बेटी की ससुराल में तथाकथित दहेज के मामले में मृत्यु के बाद रपट लिखने में हीलाहवाली करने वाली पुलिस से भी भिड़ गईं।

ऐसी ही एक घटना के बारे में बताते हुए सोमवती (55 वर्ष) बताती हैं कि उनके गाँव में बाहर से मजदूर लाकर स्कूल का निर्माण करवाया जा रहा था। जब महिलाओं को भनक लगी कि निर्माण सामग्री में धांधली हो रही है तो सब इकट्ठा होकर स्कूल पर ठेकेदार के सामने पहुंच गईं। ठेकेदार द्वारा बदतमीजी किये जाने के बाद महिलाओं ने धांधली साबित करने के लिए लात मारकर ही दीवार गिराकर दिखा दी। बाद मे पता चला कि दीवारों की जोड़ का मसाला तो कच्चा था ही पूरी इमारत बिना सरिया डाले तैयार की जा रही थी। “दबकर तो हमारे ही बच्चे मरते न! तो हम कैसे चुप रहते। फिर हमने ये भी दबाव बनाया कि इमारत बनाने में गांव का ही मजदूर काम करेगा, ताकि काम अच्छा हो और रोजगार भी आए, बाद में ऐसा ही हुआ”।

इतना ही नहीं इन महिलाओं ने एनजीओ के साथ मिलकर ही सामुदायिक रसोई भी शुरू की। इस रसोई का उद्देश्य उन सभी गाँव वालों का खाना खिलाना है जो सूखे के चलते घर वालों के पलायन के कारण पीछे छूट गए हैं। इस रसोई में खाना-खाने वालों में बच्चों से लेकर वृद्ध सब शामिल हैं। रसोई के लिए राशन एनजीओ उपलब्ध करवात है बाकी चूल्हा-लकड़ी की व्यस्था महिलाएं करती हैं। वे ही बारी-बारी से श्रमदान कर खाना भी बनाती हैं।

पानी की मूलभूत आवश्यक्ता को पूरा करने के लिए जंग छेड़ने वाली ये महिलाएं सिर्फ यहीं तक नहीं रुकीं। इन्होंने मिलकर अपनी पंचायत में होने वाले सरकारी निर्माणों में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छेड़ी। राशन और मिट्टी का तेल देन में गड़बड़ी करने वाले कोटेदार की शामत ला दी। पात्रों को सरकार की ओर से मिलने वाले आवास दिलवाए, शौचालयों के निर्माण करवाए। गाँव की एक बेटी की ससुराल में तथाकथित दहेज के मामले में मृत्यु के बाद रपट लिखने में हीलाहवाली करने वाली पुलिस से भी भिड़ गईं।

ऐसी ही एक घटना के बारे में बताते हुए सोमवती (55 वर्ष) बताती हैं कि उनके गाँव में बाहर से मजदूर लाकर स्कूल का निर्माण करवाया जा रहा था। जब महिलाओं को भनक लगी कि निर्माण सामग्री में धांधली हो रही है तो सब इकट्ठा होकर स्कूल पर ठेकेदार के सामने पहुंच गईं। ठेकेदार द्वारा बदतमीजी किये जाने के बाद महिलाओं ने धांधली साबित करने के लिए लात मारकर ही दीवार गिराकर दिखा दी। बाद मे पता चला कि दीवारों की जोड़ का मसाला तो कच्चा था ही पूरी इमारत बिना सरिया डाले तैयार की जा रही थी। “दबकर तो हमारे ही बच्चे मरते न! तो हम कैसे चुप रहते। फिर हमने ये भी दबाव बनाया कि इमारत बनाने में गाँव का ही मजदूर काम करेगा, ताकि काम अच्छा हो और रोजगार भी आए, बाद में ऐसा ही हुआ”।

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