चेहरे के दाग से उबरी, दूसरों की संवार रही ज़िन्दगी

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बरौचा सिवाला (जौनपुर)। “मैं चेहरे पर दाना भी नहीं आने देती थी, कोई भी लड़की नहीं चाहेगी कि उसके चेहरे पर एक भी दाग हो एक समय था जब मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी, सोचती थी आत्महत्या कर लूं”। ये है 20 वर्षीय गीता की दास्तां।

जिस उम्र में लड़कियां घर की चाहरदीवारी से निकलकर अपने सपनों को पूरा करने की ओर कदम बढ़ाती हैं, गीता की लड़ाई अंधकार से थी, निराशा से थी। लेकिन गीता ने अपनी झिझक, अपनी डर पर जीत पाई और जुट गई अपने गाँव की अन्य लड़कियों का जीवन संवारने में।

अक्टूबर 2015 की एक शाम को बरौचा सिवाला गाँव की गीता अपने दफ्तर से साइकिल पर सवार अपने घर जा रही थी, तो एक सड़क दुर्घटना ने गीता की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया। एक ट्रक ड्राईवर की लापरवाही ने गीता को ऐसे रौंदा जिससे उसके सिर पर गहरी चोट आई और वो बेहोश हो गई। जैसे ही गीता के घरवालों को खबर हुई तो नज़दीकी अस्पताल ले जाया गया। लेकिन हुआ वही जिसका सबको डर होता है, डॉक्टरों ने मना कर दिया कि हम नहीं बचा सकते आप ले जाइये।

इस हालत में गीता को जल्दी से जल्दी हॉस्पिटल में भर्ती करने के लिए गीता के बूढ़े पिता और छोटे-छोटे भाई जद्दोजहत करते रहे पर किसी ने भर्ती नहीं किया। ग्रामीण इलाके में परिवहन साधनों की कमी से पीड़ित के अस्पताल न पहुंच पाने के कारण सैकड़ों मौतें होती हैं। 

दुर्घटना की शाम गीता का परिवार भी इसी डर से सहमा हुआ था। आखिरकार गीता को बॉर्डर पार दूसरे जिले बनारस के एक हॉिस्पटल में भर्ती कराया गया। एक महीने के लम्बे ट्रीटमेंट के बाद वो ठीक हो पाई। गीता ठीक तो हो गई थी लेकिन उसके चेहरे पर एक लंबा निशान था, वो निशान जो उसे जिंदगी भर ये दुर्घटना नहीं भूलने देगा।

इस हादसे के बाद पूरी तरह से टूट चुकी थी वो, आत्महत्या करना चाहती थी, क्योंकि हर नजर उसे तरस से या घूर कर देखती थी। पर कहते हैं ना साहस ही जीवन की धुरी होती है और यही हुआ उसने साहस दिखाया और लिख दी एक नई इबारत।

अपनी निराशा से लड़कर गीता ने दूसरी लड़कियों और महिलाओं को स्वस्थ बनाने का बीड़ा उठाया, ताकि उनका आत्मविश्वास कभी कम न पड़े। गीता ग्रामीण क्षेत्रों में किशोरियों व महिलाओं को ऐसे मुद्दों पर जागरूक करती हैं जो लड़कियां किसी और से कह नहीं पातीं। गीता की मेहनत का नतीजा भी दिखने लगा है उसके क्षेत्र में प्रजनन स्वास्थ्य, किशोरी स्वास्थ्य और बच्चों के स्वास्थ्य में काफी जागरूकता आई है।

गीता, जिंदगी से हार चुकी थी लेकिन इस मुश्किल घड़ी में उसका साथ ‘वरुण’ नामक गैर सरकारी संगठन ने दिया, जिसके लिए गीता दुर्घटना से पहले भी काम करती रही थी। संस्था ने गीता को घर से निकलने का हौसला तो दिया ही उसके जीवन को उद्देश्य भी दिया।

एनजीओ के साथियों ने सड़क हादसे के बाद गीता को प्रोत्साहित किया उन लड़कियों की आवाज़ बनने को, जो कम पढ़ी-लिखी थीं, जो अपने बारे में कुछ सोच नहीं पाती थीं,  जिन्हें उनकी मंजिल कहां है, नहीं पता।

गीता अब बिना झिझक इन लड़कियों के बीच जाती है, उन्हें समूह में एकत्र करती, और उनसे खूब सारी बातें साझा करती हैं, कुछ महीने के बाद ही 200 से ज्यादा लड़कियां गीता की बहुत अच्छी दोस्त बन गयी हैं, इस दोस्ती के बाद उनके बीच किशोरियों के स्वास्थ्य को लेकर खूब चर्चा होने लगी। 

जहाँ शुरुआती दौर में ये लड़कियां बोलने से कतराती थी पर अब ये माहवारी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर गीता से खुल कर चर्चा करती हैं। गीता बताती हैं, “इनका बोल पाना आसान नहीं था, पर छोटे-छोटे समूह में लगातार माहवारी जैसे विषय पर चर्चा जारी रखी। जिसका नतीजा ये हुआ यहाँ की लड़कियां अब खुद बताती हैं की इन दिनों साफ़ धुले सूती कपड़े का इस्तेमाल करना चाहिए, हर 5 घंटे में कपड़े बदलना, और इस कपड़े का गढ्ढे में निस्तारण करना चाहिए।”

गीता आज उस ग्रामीण अंचल की किशोरियों की सबसे अच्छी दोस्त बन गयी हैं, और कई उनकी हम उम्र लड़कियों की प्रेरणा श्रोत भी, जो मुश्किल घड़ी में ज़िंदगी से हार जाती हैं। 

रिपोर्टर - त्रिभुवन सिंह

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