चीनी आक्रमण के तथ्य छुपाना देशहित नहीं

चीनी आक्रमण के तथ्य छुपाना देशहित नहींgaonconnection

क्षिण चीन सागर पर हेग में हारने के बावजूद चीन भारत समेत पूरी दुनिया को आंखें दिखा रहा है। पिछली सरकारों ने सच्चाई को सामने आने ही नहीं दिया, केवल कमीशन बिठाई और जांच कराई लेकिन रिपोर्ट को कभी सार्वजनिक नहीं किया। जब तक सच्चाई का पता नहीं चलेगा सरकार की रणनीति भी सटीक नहीं हो सकती। यदि तथ्य उजागर करने से देश का अहित होगा तो कमीशन ही क्यों बिठाया गया था। 

मुझे याद है 1977-78 का जमाना जब मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री थे और चीन की यात्रा पर गए थे, उसी बीच चीन ने वियतनाम पर आक्रमण कर दिया था। अटल जी यात्रा बीच में ही छोड़ कर भारत वापस आ गए थे। मैं नहीं समझता किसी दूसरे ने चीन पर इतना जोरदार तमाचा लगाया होगा। यह वही चीन था जिसने देश पर 1962 में आक्रमण किया था और हमारी तमाम जमीन हथिया ली थी। 

जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रधानमंत्री थे और वीके कृष्णा मेनन देश के रक्षामंत्री। दोनों को चीन पर भरोसा था और वे ‘‘हिन्दी चीनी भाई भाई” नारे लगात थे और जब चीनी सेनाएं हमारी सीमा में घुस रही थीं तो नेहरू जी ने श्रीलंका की यात्रा पर जाते हुए कहा था चीनी सेनाओं को खदेड़ दो और वे चले गए थे। शायद उन्हें अपनी सेना की तैयारी में कमियों और दुनिया में भारत के मित्र देशों की कमी का अन्दाज़ा नहीं था।  

उन दिनों जनरल करियप्पा ने अनेक बार कहा था कि हमारी सरहद तक रसद और रक्षा उपकरण पहुंचाने के लिए सड़कें नहीं हैं। इस बात को ना तो रक्षामंत्री ने और ना ही प्रधानमंत्री ने गम्भीरता से लिया था। चीन के हाथों भारत की पराजय और अपमान के बाद देश में बहुत आक्रोश था क्योंकि हम हारे थे जनरल कौल की अनुभव हीनता, हथियारों की कमी और सड़कों के अभाव के कारण। सैनिकों की बहादुरी में कमी की कभी बात नहीं आई क्योंकि किसी सैनिक ने पीठ पर गोली नहीं खाई थी। मेनन ने अपना त्यागपत्र दिया और नेहरू ने स्वीकार कर लिया। नेहरू की जगह यदि लाल बहादुर शास्त्री होते तो उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए त्यागपत्र दे दिया होता परन्तु नेहरू ने मेनन का त्यागपत्र स्वीकार करना पर्याप्त समझा। 

नेहरू ने हमेशा ही माओत्सेतुंग और चाउएनलाई को अपना सच्चा मित्र समझा जब कि सरदार वल्लभ भाई पटेल ने नेहरू को आगाह भी किया था। नेहरू नहीं माने। चीन का पूर्वी भाग जिसे तब फारमोसा कहते थे और जिसके शासक च्यांग काई शेक हुआ करते थे उन्हें भारत सरकार ने सामान्य शिष्टाचार भी नहीं दिया क्योंकि वह अमेरिका के पक्षधर थे और नेहरू तथा मेनन उसके विरोधी।

नेहरू और उनकी सरकार ने मुसीबत को न्योता उसी दिन दे दिया था जब उन्होंने तिब्बत को चीन का अभिन्न अंग स्वीकार कर लिया था। पहले हमारी सरहदों के बीच तिब्बत पड़ता था अब दोनों देशों की सरहद एक हो गई थी। जब तिब्बत से लाखों की संख्या में शरणार्थी आए और भारत ने उन्हें अपने यहां बसाया तो चीन को नागवार गुजरा लेकिन यह हमला करने के लिए पर्याप्त कारण नहीं होना चाहिए था। तिब्बती शरणार्थियों को फिर से तिब्बत में बसाने का तनिक भी प्रयास कांग्रेसी या दूसरी सरकारों ने नहीं किया।

इस प्रकार चीन के साथ हमारे सम्बन्धों के दो पक्ष हैं, एक तो हम आर्थिक रूप से चीन से पिछड़ क्यों गए और दूसरा हम 1962 के युद्ध में चीन से हार क्यों गए। पहले का उत्तर आसान है। नेहरू सरकार ने गांधी जी का रास्ता छोड़कर ग्रामस्वराज को भूल गए और चीन ने माओ का रास्ता पकड़कर गाँवों को समृद्ध बनाया। विकास का नेहरू मॉडल फेल हो गया जिसे त्यागने में भी बहुत देर की गई।

हम चीन से हारे क्यों इसका कारण जानने के लिए कमीशन बिठाया गया, रिपोर्ट आई परन्तु कांग्रेस सरकार ने उस जांच के निष्कर्ष को सार्वजनिक नहीं किया। दूसरी सरकारें आई उन्होंने भी ना जानें क्यों रिपोर्टों को सार्वजनिक करना जरूरी नहीं समझा।

 परिणाम यह हुआ है कि लोगों के मन में तरह-तरह के भ्रम और कल्पनाएं हैं उस युद्ध और उसके परिणामों को लेकर। इसका एक ही निराकरण है कि सच्चाई को सामने लाया जाए, रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाय और चीन के साथ सम्बन्ध बनाने में उसका अनुभव काम आए। 

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