चिंताजनक है पाकिस्तानी जेआईटी को अनुमति

चिंताजनक है पाकिस्तानी जेआईटी को अनुमतिgaonconnection

पठानकोट एयरबेस पर जनवरी 2016 में हुए आतंकी हमले की जांच के लिए पाकिस्तान की पांच सदस्यीय संयुक्त जांच टीम (जेआईटी) नई दिल्ली पहुंची, अगले दिन उसने एनआईए से इनपुट लिए और मंगलवार को पठानकोट एयरबेस पहुंचने के बाद पाकिस्तान लौट गयी। 

इस टीम का नेतृत्व पंजाब के काउंटर टेररिज्म डिपार्टमेंट (सीटीडी) के प्रमुख मुहम्मद ताहिर राय कर रहे थे और अन्य सदस्यों में लाहौर के इंटेलीजेंस ब्यूरो के डिप्टी डायरेक्टर जनरल मोहम्मद अजीम अरशद, आईएसआई के ऑफिसियल लेफ्टिनेंट कर्नल तनवीर अहमद, मिलिट्री इंटेलीजेंस ऑफीसर लेफ्टिनेंट कर्नल इरफान मिर्जा और गुजरावाला के सीटीडी इन्वेस्टीगेटिव आफीसर शाहिद तनवीर शामिल हैं। हालांकि इससे पहले 26/11 हमले के सम्बंध में पाकिस्तान ने एक न्यायिक आयोग भारत भेजा था ताकि वह गवाहों का क्रास एक्जामिनेशन कर सके। लेकिन पाकिस्तान के खुफिया और पुलिस अधिकारी आतंकी हमले की जांच एक संयुक्त जांच टीम के रूप में पहली बार भारत आए। यद्यपि एनआईए ने पाकिस्तानी जांच टीम के लिए पठानकोट एयरबेस में खास ढंग से बैरिकेडिंग की थी ताकि उसे संवेदनशील और टैक्निकल स्थानों पर जाने न दिया जाए और जांच टीम केवल उन हथियारों की छानबीन करे, जिनका इस्तेमाल आतंकवादियों ने हमले के समय किया था तथा पीड़ितों के बयान रिकॉर्ड कर सके। लेकिन फिर भी कई सवाल उठते हैं और उठाए भी जा रहे हैं, जो इस जांच भारत की सम्प्रभुता से जुड़े हैं। 

प्रथम- क्या भारत सरकार द्वारा आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली एजेंसियों के अफसरों को भी देश के अंदर जांच के लिए वीजा देना उचित था? क्या दोषी को स्वयं अपने विरुद्ध जांच का अधिकार देना एक अच्छी परम्परा का द्योतक हो सकता है और इससे न्याय की उम्मीद की जा सकती है? आतंकवाद को प्रश्रय देने वाला स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्यों को कैसे एकत्रित कर सकता है? इस स्थिति में इस सवाल का उठना भी जरूरी है कि क्या पाकिस्तान को एनआईए के सुपरविज़न में जो सुबूत प्राप्त होंगे उन्हें वह पर्याप्त एवं नेचुरल मानकर उचित कार्रवाई करेगा या फिर छुट-पुट कार्रवाई कर समस्त प्रकरण का पटाक्षेप हो जाएगा ? क्या ये सबूत जैश-ए-मुहम्मद के सरगना को सजा देने के लिए पर्याप्त सिद्ध होंगे या इनके आधार पर पाकिस्तान कोई ठोस कदम उठाएगा? क्या पाकिस्तान वास्तव में उन आतंकियों को सजा देना चाहता है जो इस घटना के लिए अथवा इससे पहले की गयी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं? क्या भारत ने अब यह मान लिया है कि पाकिस्तान भारत के खिलाफ पिछले ढाई दशक से आतंकियों के जरिए छद्मयुद्ध नहीं लड़ रहा है? क्या भारत सरकार पाकिस्तान की जेआईटी को वीजा देकर कुछ गलत कर रही है अथवा भारत के ठोस कूटनीतिक कदमों का एक हिस्सा है?

उल्लेखनीय है कि भारत की ओर से सुराग दिए जाने के बाद पाकिस्तान ने छह सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया था। लेकिन नतीजे, सभी जानते हैं। फिर भी यदि भारत पुन: इस तरफ एक प्रयास कर रहा है तो इसे भारत का धैर्य मानें या फिर सॉफ्ट स्टेट होने का एक प्रमाण ? ध्यान रहे कि पिछले सप्ताह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने सार्क देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में काठमांडू अपने पाकिस्तानी समकक्षी सरताज अजीज के साथ वार्ता कर यह तय किया था कि पाकिस्तानी टीम भारत दौरे पर आएगी। अगर कूटनीतिक आदर्श के लिहाज से देखें, जिसका प्रदर्शन भारत की तरफ से प्राय: ही किया गया है, तो भारत इसके जरिए एक अच्छा संदेश दे रहा है।

यह भी हो सकता है कि इसके माध्यम से भारत पाकिस्तान को वैश्विक स्तर घेरने में कामयाब हो जाए और उस पर आतंकवादियों की कार्रवाई के लिए दबाव बनाने में सफल हो। लेकिन इसकी संभावनाएं पाकिस्तान से बहुत कम ही की जा सकती हैं क्योंकि पाकिस्तान के रियल एस्टेट एक्टर नहीं चाहते कि वे पिछले 5-6 दशक से भारत के विरुद्ध लड़ रहे छद्मयुद्ध को समाप्त करें। ऐसे में सेना, पुलिस और आईएसआई के अधिकारियों के संयुक्त जांच दल का पठानकोट एयरबेस में जांच के लिए प्रवेश करना रक्षात्मक दृष्टि से और परम्परा के लिहाज से भविष्य की दृष्टि से इसे बेहतर कदम कहने में थोड़ी हिचकिचाहट जरूर हो रही है। 

जहां तक पठानकोट हमले का संदर्भ है तो पहली बात तो यह कि पठानकोट एयरबेस हमले को केवल 7 जवानों की मृत्यु और कुछ घायलों की संख्या की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए बल्कि यह भारत के रक्षा प्रतिष्ठान पर हमला था, जो पाकिस्तान आधारित आतंकवादियों के बेहद खतरनाक इरादों को व्यक्त करता है। 

उल्लेखनीय है कि पठानकोट वायुसैनिक बेस जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बीच स्थिति इस बेस पर ही मिग-21, एमआई-25 और एमआई-35 हमलावर हेलिकॉप्टर रखे गये हैं। दूसरा यह कि उफा में नरेन्द्र मोदी-नवाज शरीफ वार्ता में जो तय हुआ था, उस पर पाकिस्तान एक कदम भी नहीं बढ़ा, आखिर क्यों? कारण सभी जानते हैं। तीसरा यह कि क्या भारत ने इस वार्ता में यह तय किया था कि पाकिस्तान इसी तरह की इजाजत भारत की पुलिस और खुफिया टीम को भी देगा ताकि उन लोगों से पूछताछ की जा सके जो भारत में आतंकी हमले के लिए दोषी हैं? फिलहाल अब तक पाकिस्तान भारत द्वारा उपलब्ध कराए गए साक्ष्यों को नकारता रहा है जबकि उनके आधार पर आतंकियों को सजा दी जा सकती थी। पठानकोट मामलों में भी खुफिया एजेंसियों ने जो इंटरसेप्ट्स प्राप्त किए हैं उसके अनुसार आतंकियों को उनके सरगनाओं की तरफ से आदेश दिया गया था कि, ‘चॉपर्स और प्लेनों को उड़ा दो।’ इन इंटरसेप्ट्स में वे कुछ फोन नम्बर भी हैं जो यह बताते हैं कि जैश-ए-मुहम्मद प्रमुख मसूद अजहर का भाई और उसकी कम्पनी आतंकियों को पैक्ड फूड सप्लाई कर रही थी। जैश-ए-मुहम्मद से है उसी मसूद अजहर का है जिसे 1999 के कंधार विमान अपहरण हादसे के बाद बंधकों को छुड़ाने के लिए भारतीय कैद से रिहा किया गया था और जिसे इस समय आईएसआई की विशेष कृपा प्राप्त हो रही है। ऐसे में पुलिस और इंटेलीजेंस की टीम सकारात्मक निष्कर्ष तक पहुंचेगी, इसकी उम्मीद कम ही है। 

दरअसल पाकिस्तान की सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के मिजाज में अब तक कोई बदलाव नहीं हुआ है। पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार, जो भारत के साथ अच्छे रिश्ते चाहती है, पर सैन्य नियंत्रण यथावत है और वह पाकिस्तान के रियल स्टेट एक्टर के रूप में जिसका नॉन स्टेट एक्टर (आतंकवादियों) को संरक्षण प्राप्त है। ये दोनों  भारत को दुश्मन नम्बर 1 या सनातन शत्रु मानने वाले अपने मनोविज्ञान में कोई परिवर्तन नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के साथ सम्बंधों को आगे बढ़ाने की पहल तो जरूरी है लेकिन जमीनी हकीकतों को नजरंदाज कर कोई पहल करना भारत के सामरिक हितों के लिहाज से अनुकूल नहीं हो सकती। यही वजह है कि भारत के कूटनीतिक आदर्शों पर सरकार का यह कदम बेहतर साबित होगा, ऐसी उम्मीद की जा सकती है लेकिन अंतिम परिणाम भारत के पक्ष में ही आएंगे, इसकी उम्मीद कम है। 

बहरहाल सूचनाओं के मुताबिक पाकिस्तान में कुछ लोगों की धरपकड़ इस सिलसिले में हुई है, लेकिन यह तय है कि मुख्य आरोपियों पर पाकिस्तान हाथ नहीं डालेगा। इसलिए चुनौतियां बरकरार रहेंगी और इस प्रकार की नजीर भारत की भावी कूटनीति व सुरक्षा के समक्ष नयी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।    

(लेखक  आिर्थक व राजनैतिक मामलों के जानकार हैं, यह उनके अपने विचार हैं।)

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