चंबल के क्रांतिकारियों को हक दिलाने निकला पत्रकार

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लखनऊ। पिछले 20 दिनों से दो जोड़ी कपड़े, एक मोबाइल और साइकिल के साथ शाह आलम चंबल के क्रांतिकारियों को उनका हक और नाम दिलाने चल पड़े हैं। साथ ही वह बुंदेलखंड और चंबल के कई हिस्सों में बीहड़ की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का सच जान रहे हैं।

अयोध्या के रहने वाले और जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी, दिल्ली के रिसर्चर रहे शाह आलम ने अपनी यात्रा की शुरुआत 29 मई को औरैया से शुरू की थी। शाह आलाम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और ग्वालियर राज्य में पड़ने वाले चंबल क्षेत्र की यात्रा कर चुके हैं। 

इसके तहत औरैया, जालौन, इटावा, भिंड, मुरैना और धौलपुर के ग्रामीण अंचलों में जाकर आम लोगों से वहां का सच जाना। साइकिल यात्रा में लोगों के सुख-दुख को समझने और तीन राज्यों में फैली चम्बल घाटी के बीहड़ों के मौजूदा हालात से देश-दुनिया को रूबरू कराना ही उनका मकसद है।

स्वतंत्र पत्रकार, दस्तावेजी फिल्मों के निर्माता शाह आलम अब तक बुंदेलखंड और चंबल घाटी में 500 किमी. से अधिक यात्रा कर चुके हैं। अपनी यात्रा के बारे में शाह आलम बताते हैं, “मेरा काम चंबल के असली तस्वीर लोगों के सामने लाना है। कहा जाता है कि देश विकास कर रहा है, लेकिन डकैतों से प्रभावित रहा ये इलाका बेहद पिछड़ा है। 

ये एक दूसरी दुनिया है, जहां जीवन आज भी कठिन और दुर्लभ है।” वो आगे कहते हैं, “झांसी के मास्टर रुद्रनारायण सिंह को झांसी के लोग जानते हैं, लेकिन दूसरी जगह पर लोग उन्हें नहीं जानते। इसी तरह त्रिवेदी के नाम से उत्तर भारत का सबसे बड़ा मूवमेंट तैयार करने वाले पंडित गेंदालाल दीक्षित को कोई नहीं जानता, लेकिन वह चंबल में ही सक्रिय थे।”

शाह आलम चंबल के कुछ ऐसे भी क्षेत्रों में गए, जहां पर कोई जाना ही नहीं चाहता है। फूलन देवी की मां के घर भी गए। शाह आलम कहते हैं, फूलन के घर का हर कोना चेक कर लिया। घर में सिर्फ दो किलो आटा और एक पाव प्याज़ लगभग, सब्ज़ी दाल पता नहीं कब से नही बनी थी। उनका कोई भी कार्ड भी नहीं बना है, राशन की दुकान से राशन भी नहीं मिलता है।” शाह आलम चाहते हैं कि क्रांतिकारियों का नाम भी होना चाहिए। वो कहते हैं, “ऐसे क्रांतिकारियों के नाम पर अस्पताल, सड़क, चौराहों, पुस्तकालय, कालेज, विश्वविद्यालय का नाम होना चाहिए।”

बीस दस्तावेजी फिल्मों का कर चुके हैं प्रदर्शन

शाह आलम पिछले डेढ़ दशक से अब तक 20 दस्तावेजी फिल्मों का फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शन कर चुके हैं। अवाम के सिनेमा के नाम से कारगिल, दिल्ली, जयपुर, अयोध्या, मऊ, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, औरैया, इटावा, बनारस, बिजनौर, कानपुर, गोंडा आदि जगहों पर क्रांतिकारियों की दस्तावेजी फिल्मों का प्रदर्शन हो चुका है। 

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