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मजदूरों का रिवर्स पलायन: कुछ ने कहा- परदेस वापिस नहीं जाएंगे, कुछ ने कहा- मजबूरी है!

वापिस लौट रहे इन मजदूरों में से अधिकतर का कहना है कि उन्होंने जिस तरह से पिछले दो महीनों के लॉकडाउन को झेला है, उसके बाद वह फिर कभी शहर वापिस नहीं जाएंगे। हालांकि कुछ ऐसे भी हैं, जो स्वीकार करते हैं उनके पास कोई विकल्प नहीं है और हालात ठीक होने के बाद उन्हें फिर से महानगरों की ओर जाना ही होगा।

Daya SagarDaya Sagar   21 May 2020 11:01 AM GMT

नेशनल हाईवे-27। पिछले ग्यारह सालों से मुंबई के भिवंडी में रहकर पावरलूम मशीन पर काम करने वाले मोहम्मद मुस्तकीम (37 वर्ष) साल में बस एक बार ईद के समय ही अपने घर उत्तर प्रदेश के खलीलाबाद आते हैं। इस बार भी वह ईद के वक्त ही आए हैं, लेकिन इस बार हालात बदले हुए हैं। पिछली बार उनके बैग में अपने परिवार वालों के लिए नए कपड़े और बच्चों के लिए खिलौने थे, लेकिन इस बार उनका बैग खाली है। उन्हें बस इस बात की खुशी है कि वह किसी तरह अपने घर लौट आए हैं।

केंद्र सरकार द्वारा मजदूरों के लिए श्रमिक ट्रेनों की घोषणा होने के बाद मुस्तकीम ने अपने साथी शमीम के साथ इन ट्रेनों के लिए रजिस्टर किया था। लेकिन एक सप्ताह गुजर जाने के बाद भी उन्हें टिकट मिलने का कोई संदेश नहीं प्राप्त हुआ। इसके बाद वे पैदल ही मुंबई से खलीलाबाद के लिए निकल पड़े।

एक ट्रक वाले से बैठाने की गुहार लगाते पैदल और साईकल से चलते प्रवासी मजदूर

कहीं वे पैदल चलें तो कहीं कुछ दूरी के लिए उन्हें ट्रक मिला। इस तरह उन्होंने एक हफ्ते में अपनी 1500 किलोमीटर की यात्रा पूरी की। घर पहुंच जाने के बाद उन्हें थोड़ा सुकून है और वे फिर से वापिस मुंबई नहीं जाना चाहते हैं। वापिस जाने के सवाल पर शमीम कहते हैं, "हम जिस स्थिति से गुजरे हैं, उसके बाद वापिस जाना तो बहुत ही मुश्किल है। छोटी सी खेती है, कुछ काम-धंधा कर लेंगे लेकिन वापिस तो नहीं ही जाएंगे।" शमीम की बातों में जोर रहता है।

हालांकि प्रेम साहनी (24 वर्ष), मुस्तकीम और शमीम की तरह उतने बदनसीब नहीं थे। उन्हें सरकार द्वारा चलाई जा रही श्रमिक ट्रेन का टिकट तो मिल गया लेकिन मुफ्त टिकट के सरकारी दावों के उलट उनसे 620 रूपये वसूला गया, जो कि टिकट पर लिखे 500 रूपये से भी 120 रूपये अधिक था। उनसे कहा गया था कि 120 रूपये के बदले उन्हें ट्रेन में खाना-पानी मिलेगा लेकिन 24 घंटे से अधिक की यात्रा में उन्हें सिर्फ छाछ, नमकीन और पानी का बॉटल मिला।

ट्रेन का टिकट दिखाते प्रेम साहनी। उन्होंने बताया कि टिकट पर लिखे 500 के बदले उनसे 620 रूपया लिया गया, जो उन्होंने अपने घर से मंगाया था क्योंकि उनके पास पैसे खत्म हो गए थे।


प्रेम साहनी गुजरात के अहमदाबाद से पूर्वी उत्तर प्रदेश के मगहर आए हैं। वह वहां पर पिछले दो सालों से वेल्डिंग कारीगर थे। वापिस जाने के सवाल पर अरविंद भी कहते हैं कि अभी फिलहाल वापिस जाने की कोई उम्मीद नहीं है। लेकिन स्थिति ठीक होने पर वह इसके बारे में सोचेंगे क्योंकि गांव में काम करने के अवसर बहुत कम हैं।

मुंबई, सूरत, दिल्ली एनसीआर जैसे महानगरों में वर्षों से रहकर अपना गुजर-बसर करने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों के रिवर्स माइग्रेशन का सिलसिला लगातार जारी है। लॉकडाउन तीन और चार में शहर से आने वाले इन प्रवासी मजदूरों की संख्या और भी बढ़ी है। दिल्ली, मुंबई से लखनऊ होते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे-27 पर इन मजदूरों का रेला सा लगा हुआ है। कोई ट्रक की छत पर बैठ कर आ रहा है, तो कोई सरकार द्वारा इंतजाम किए गए बस या श्रमिक ट्रेनों से और जिन्हें यह सुविधा नहीं मिल रही, वे साइकिल या पैदल ही अपने गांवों की तरफ धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अब तक प्रदेश में 838 श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेनों से 14 लाख से अधिक प्रवासी मजदूरों का आगमन हो चुका है। वहीं अगर इसमें बस और खुद से आए मजदूरों को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 20 लाख से ऊपर पहुंचती है। वहीं बिहार सरकार ने भी बताया है कि लॉकडाउन होने के बाद उनके राज्य में लगभग छः से सात लाख प्रवासी मजदूर वापिस आ चुके हैं। इसलिए कई विशेषज्ञ इसे विभाजन के बाद का सबसे बड़ा पलायन भी बता रहे हैं।

वापिस लौट रहे इन मजदूरों में से अधिकतर का कहना है कि उन्होंने जिस तरह से पिछले दो महीनों के लॉकडाउन को झेला है, उसके बाद वह फिर कभी शहर वापिस नहीं जाएंगे। वहीं कुछ का कहना है कि अगर बहुत मजबूरी भी हुई तो उन्हें इसके लिए कई बार सोचना होगा। हालांकि कुछ ऐसे भी हैं, जो स्वीकार करते हैं उनके पास कोई विकल्प नहीं है और हालात ठीक होने के बाद उन्हें फिर से महानगरों की ओर जाना होगा।

मोहम्मद अशरफ भी अपने नौ साथियों के साथ मुंबई से पैदल आ रहे हैं। उन्हें बिहार के अररिया जाना है। बीच-बीच में उन्हें ट्रक या बस वालों से कुछ-कुछ दूरी के लिए लिफ्ट मिल जा रहा है। अशरफ कहते हैं, "लॉकडाउन के 50 दिन से अधिक बीत जाने के बाद भी उन्हें सरकार की तरफ से राशन और पैसे का कोई सहयोग नहीं मिला, जबकि उन्होंने और उनके साथियों ने बिहार सरकार द्वारा राज्य से बाहर रह रहे मजदूरों को दिए जा रहे एक हजार रूपये के प्रवासी मजदूर भत्ते के लिए भी अप्लाई किया था।"

अशरफ और उनके साथी। ईद पर घर जाते वक्त इस बार उनके बैग में नए कपड़ों की बजाय पुराने गंदे कपड़ों का बस बोझ है।

वह अपना मोबाइल दिखाते हुए कहते हैं कि उनके फोन में ना कभी मजदूर भत्ते का मैसेज आया और ना ही श्रमिक ट्रेन के टिकट का। गौरतलब है कि लॉकडाउन होने के बाद सरकारें लगातार दावा करती आई हैं कि वे अपने राज्य में फंसे प्रवासी मजदूरों को राशन और खाने-पानी की कोई दिक्कत नहीं होने देंगी और उन्हें यह सब चीजें लगातार उपलब्ध कराई जा रही हैं। केंद्र सरकार भी कह रही है कि उनके पास पर्याप्त राशन है और राज्यों को अलग-अलग मद में पर्याप्त मात्रा में राशन का आवंटन किया जा रहा है। लेकिन लाखों की संख्या में घर-वापसी कर रहे प्रवासी मजदूर साबित कर रहे हैं कि सरकार की ये व्यवस्थाएं नाकाफी हैं।

यूपी के संत कबीर नगर के आकाश निषाद (18 वर्ष) मुंबई के वसई में रहकर पैकिंग बॉक्स बनाने का काम करते थे। वह बहुत छोटी उम्र में ही दो साल पहले घर छोड़कर मुंबई गए थे। लॉकडाउन की दिक्कतों के बारे में पूछने पर आकाश गांव कनेक्शन से कहते हैं, "मत पूछिए कितना दिक्कत होता था। खाने के लिए सब्जी लाने जाओ तो भी पुलिस डंडा मार कर खदेड़ देती थी। सरकार से सहयोग के नाम पर एक बार दो किलो चावल मिला, वह बताइए कितना दिन चलता। धीरे-धीरे जेब में बचे पैसे खत्म हो रहे थे। जब जेब में एक हजार रूपया बचा, तब मैंने फैसला किया कि अब घर जाना है।"

आकाश निषाद किसी तरह ट्रक से अपने घर आए, जिसमें उनके बाकी बचे एक हजार रूपये भी खत्म हो गए। लॉकडाउन में हुई परेशानियों ने उन्हें इतना हताश कर दिया कि वह अब कह रहे हैं कि गांव में सब्जी बेच लेंगे, दूसरे की खेतों में मजदूरी कर लेंगे लेकिन कभी बम्बई (मुंबई) नहीं जाएंगे। आकाश ने बताया कि उनके पास कोई खेती नहीं है और घर से बाहर जाकर कमाना ही एकमात्र विकल्प था। आकाश के बड़े भाई परशुराम निषाद (21 वर्ष) भी एक प्रवासी मजदूर हैं। वह दादरा नगर हवेली के सिलवासा में रहकर बढ़ई का काम करते हैं। दो दिन पहले ही उनकी भी वापसी हुई है।

हालांकि वह अपने छोटे भाई से कुछ अलग सोचते हैं। वह कहते हैं, "यहां करने को कुछ है ही नहीं इसलिए सब कुछ ठीक होने पर उन्हें ना चाहते हुए भी 'परदेस कमाने' जाना होगा।" पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में प्रवासियों के लिए सामान्यतया 'परदेस कमाने वाले' और 'परदेसी' जैसे शब्दों का उपयोग किया जाता है। गेहूं कटने के बाद मई-जून के इस महीने में इन परदेसियों की संख्या बढ़ जाती है क्योंकि क्षेत्र में इसके बाद अधिकतर जगहों पर बाढ़ की स्थिति बन जाती है और खेतों में करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं रहता।

हरियाणा के वल्लभगढ़ में प्रीमियर इंडोप्लास्ट नाम की एक ऑटोमोबाइल कंपनी में पिछले दो साल से मोल्डिंग मशीन ऑपरेटर का काम करने वाले अरविंद पाल कहते हैं, "लॉकडाउन होने के तुरंत बाद ही कंपनी ने अपने हाथ खड़े कर दिए, जबकि हम लोग उनके पुराने और रेगुलर कर्मचारी थे। हम लोगों ने फोन किया तो बताया गया कि अभी कोई काम नहीं है और आगे भी काम शुरू होने की उम्मीद नहीं है। हमने अपने सेविंग किए गए पैसों से 40-50 दिनों तक खर्च चलाया लेकिन जब वह भी खत्म हो गया तो फिर हमें घर वापसी की राह पकड़नी पड़ी।"

अरविंद के साथ उसी कंपनी में उनके भाई गोविंद भी लोडिंग-अनलोडिंग का काम करते थे। 6 लोगों के परिवार को चलाने की जिम्मेदारी अरविंद और गोविंद के कंधों पर ही है। इसलिए फिर से वापिस जाने के सवाल पर अरविंद अपनी मजबूरी जाहिर करते हैं। वह कहते हैं, "जाना तो पड़ेगा ही, गांव में रहकर क्या करेंगे। खेती भी नहीं है कि खेती कर लें। खेती होती तो गांव-घर छोड़कर कभी जाते ही नहीं।"

एक लंगर पर खाना खाते प्रवासी मजदूर। हाईवे पर लगे इन लंगरों से प्रवासी मजदूरों की भूख-प्यास मिट रही है।

पटना के एएन सिन्हा इंस्टियूट ऑफ सोशल साइंस में अर्थशास्त्र विभाग के विभागाध्यक्ष डीएम दिवाकर कहते हैं कि वापसी कर रहे प्रवासी मजदूरों में से उन लोगों के लिए स्थितियां सबसे खराब है जिनके पास कोई खेत नहीं है या जो शहर से कोई स्किल सीख कर नहीं आए हैं। गांव कनेक्शन से फोन पर बातचीत में उन्होंने बताया, "हालांकि परिस्थितियां किसी के लिए भी अनुकूल नहीं हैं, क्योंकि सब अपना काम-धंधा या बना-बसाया घर छोड़ कर आए हैं। लेकिन जिनके पास खेती है या जो कोई स्किल जानते हैं, वह कुछ ना कुछ यहां भी कर लेंगे। लेकिन जिनके पास इन दोनों चीजों में से एक भी नहीं है, उनके लिए काफी मुश्किल होने वाली है।"

तमाम लोग मजदूरों के फिर से शहर वापिस ना जाने के बयानों को परिस्थितियों से उपजा हुआ एक भावुकतापूर्ण स्टेटमेंट बता रहे हैं और कह रहे हैं कि कोरोना से स्थितियां ठीक होने के बाद मजदूर फिर से महानगरों की तरफ जाएंगे। लेकिन डीएम दिवाकर का मानना है कि इसमें भावुकता से अधिक मजदूरों का रोष शामिल है।

"लॉकडाउन होने के बाद उन्होंने जो कुछ देखा और सहा है, उसे सिर्फ भावुकता कहना ठीक नहीं। ये मजदूर शहरों से कुछ स्किल सीखकर आए हैं, इसलिए अब यह राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वे इस स्किल का उपयोग संसाधन के रूप में करें ताकि मजदूरों को फिर से पलायन के लिए मजबूर ना होना पड़े," दिवाकर अपनी बातों को समाप्त करते हैं।

उत्तर प्रदेश के ख़लीलाबाद के पास NH-27 पर प्यास बुझाते पैदल और साईकल से चलते मजदूर

आपको बता दें कि डीएम दिवाकर और उनके अन्य साथियों के चिट्ठी लिखने के बाद बिहार सरकार बाहर से आ रहे प्रवासी मजदूरों के थर्मल स्क्रिनिंग के साथ उनके स्किल के बारे में भी पूछ रहा है, ताकि जरूरत पड़ने पर उनके स्किल का उपयोग किया जा सके और उन्हें रोजगार मिल सके। ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भी दावा कर रही है कि वह बाहर से आने वाले प्रवासी मजदूरों के स्किल डाटा तैयार कर रही है, ताकि जरूरत के मुताबिक उन्हें रोजगार मुहैय्या कराई जा सके।

योगी सरकार ने इसके लिए 'प्रवासी राहत मित्र' ऐप भी लॉन्च किया है, जिसमें मजदूरों से उनके नाम, शैक्षणिक योग्यता, पता, बैंक अकाउंट के अलावा उनके स्किल और अनुभव का भी विवरण मांगा जा रहा है। सरकार का कहना है कि ऐप से प्राप्त इस डाटा से मजदूरों को काम दिया जाएगा। हालांकि यह देखने वाली बात होगी कि राज्यों की ये सरकारी योजनाएं दशकों से चल रहे प्रवासी मजदूरों के इस पलायन को कितना नियंत्रित कर पाती हैं।

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