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लॉकडाउन में जब दुकानों पर सेनेटरी पैड नहीं मिल रहे थे तब इन लड़कियों ने कपड़े का पैड बनाकर माहवारी की मुश्किलों को किया आसान

कोविड-19 के दौरान देशव्यापी लॉकडाउन में जब बाजार पूरी तरह से बंद थे, जरूरत के सामान की गिनी-चुनी दुकानें ही खुलती थीं, दुकानों पर रखे सेनेटरी पैड का स्टॉक खत्म हो चुका था। ऐसे में माहवारी के दिनों में लड़कियों और महिलाओं के लिए वाटर एड की सहयोगी संस्था वात्सल्य द्वारा कपड़े के सेनेटरी पैड बनाने की पहल शुरू की गयी। अब 200 से ज्यादा लड़कियाँ बना रही हैं जिसमें कुछ लड़के भी शामिल हैं।

लॉकडाउन में जब दुकानों पर सेनेटरी पैड नहीं मिल रहे थे तब इन लड़कियों ने कपड़े का पैड बनाकर माहवारी की मुश्किलों को किया आसान

देशव्यापी लॉकडाउन में जब सचिन को अपनी बहन के लिए आसपास की दुकान पर सेनेटरी पैड नहीं मिला तो उन्होंने घर पर ही कपड़े का सेनेटरी पैड बनाना शुरू कर दिया जिसमें उनकी बहनें भी शामिल हो गईं।

लखनऊ के बक्शी का तालाब ब्लॉक के डिगुरपुर गाँव के रहने वाले सचिन गुप्ता (17 वर्ष) बताते हैं, "आसपास की दुकानों पर सेनेटरी पैड मिल नहीं रहे थे। दूर की बाजार साधन के अभाव में जा नहीं सकते थे। हमने घर पर ही अपनी बहनों के साथ मिलकर कपड़े के सेनेटरी पैड बनाये। अपनी उम्र के अपने कई दोस्तों को भी बोला कि वो भी अपनी बहनों की मदद करें। आसपास के देखादेखी कुछ लोग कपड़े के पैड बना रहे हैं।"

आपको पैड बनाने में संकोच नहीं लगा, "बिलकुल नहीं, मैं दो साल से वात्सल्य संस्था के साथ जुड़ा हूँ, शुरुआत में बहुत झिझक थी अब तो खुलकर माहवारी विषय पर बात करता हूँ। अपने दोस्तों को भी बताता हूँ कि वो अपनी बहनों को माहवारी के दिनों में काम करने में मदद किया करें, उनकी तकलीफ को समझें।"


इस लॉकडाउन में सिर्फ लड़कियाँ ही बल्कि सचिन की तरह कई युवा भी माहवारी जैसे जरूरी विषय पर चर्चा में हिस्सा लेने और इसके डिस्पोजल, सेनेटरी पैड की उपलब्धता पर बात करने के लिए आगे आये हैं जो कि बदलाव की एक अच्छी तस्वीर है।

कोविड-19 के दौरान लॉकडाउन में जब बाजार पूरी तरह से बंद थे, जरूरत के सामान की गिनी-चुनी दुकानें ही खुलती थीं, दुकानों पर रखे सेनेटरी पैड का स्टॉक खत्म हो चुका था। ऐसे में माहवारी के दिनों में लड़कियों और महिलाओं के लिए वाटर एड की सहयोगी संस्था वात्सल्य द्वारा कपड़े के सेनेटरी पैड बनाने की पहल शुरू की गयी। कपड़े के पैड बनाने की इस पहल में 200 से ज्यादा लड़कियों ने हिस्सा लिया जिसमें सचिन की तरह कुछ लड़के भी शामिल हैं।

सचिन की तरह सरिता ने भी एक वीडियो देखकर कपड़े का सेनेटरी पैड अपने घर पर ही बनाना शुरू कर दिया। इस लॉकडाउन में सरिता ने अपने आसपास की कई लड़कियों को कपड़े का सेनेटरी बनाना सिखा भी दिया।

लॉक डाउन में कपड़े के पैड बनाती सरिता.

लखनऊ से लगभग 30 किलोमीटर दूर मलीहाबाद ब्लॉक के मुजासा गाँव में रहने वाली सरिता देवी (26 वर्ष) बताती हैं, "वात्सल्य संस्था द्वारा मुझे एक वीडियो व्हाट्स एप पर भेजा गया था जिसमें कपड़े का सेनेटरी बनाने की पूरी विधी थी। मैं सिलाई पहले से कर लेती हूँ इसलिए इसे बनाना हमारे लिए आसान था। अब तो कई लड़कियाँ बनाना सीख गईं हैं, लॉकडाउन में सबने यही यूज भी किया है। कुछ लड़कियाँ ये पैड मुझसे खरीदने भी लगीं। अबतक मैं 200 से ज्यादा पैड बनाकर बेच चुकी हूँ।"

लॉकडाउन में कपड़े का पैड बनाकर इस्तेमाल करने वाली सरिता पहली लड़की नहीं हैं। सरिता की तरह लखनऊ में 200 से ज्यादा लड़कियाँ इसे बनाकर उपयोग कर रही हैं। सरिता पांच रूपये में कपड़े का बना एक सेनेटरी पैड आसपास की लड़कियों को बेच भी रही हैं। वाटर एड की सहयोगी संस्था वात्सल्य द्वारा लॉक डाउन में एक वीडियो के माध्यम से कपड़े के सेनेटरी पैड बनाने की तरकीब बताई गयी जो कारगर साबित हुई।

कोरोना काल में अन्तर्राष्ट्रीय संस्था वाटर एड द्वारा बिहार और यूपी की 39 गैर सरकारी संस्थाओं के साथ आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता और चुनौतियों पर एक सर्वे किया गया। लॉकडाउन के दौरान 65 फीसदी संस्थाओं को लड़कियों और महिलाओं ने यह बताया कि वो कपड़े के बने सेनेटरी पैड उपयोग कर रही हैं जब उन्हें बाजार में सेनेटरी पैड नहीं मिल रहे थे।

रोचक गतिविधियों के माध्यम से महिलाओं की माहवारी विषय पर झिझक तोडी गयी.

वाटर एड यूपी की प्रोग्राम मैनेजर अंजली त्रिपाठी बताती हैं, "लॉकडाउन के समय जब लड़कियों और महिलाओं को दुकानों पर सेनेटरी पैड नहीं मिल रहे थे तब वाटर एड ने एक सर्वे किया था। साथ ही सहयोगी संस्थाओं के साथ मिलकर 10 दिनों तक माहवारी एवं स्व्च्छता प्रबन्धन पर एक सघन अभियान चलाया। जिसमें लड़कियों को कपड़े के सेनेटरी पैड बनाने और उसके डिस्पोजल पर फोकस किया। लखनऊ में 200 से ज्यादा लड़कियाँ इसे बनाकर यूज भी कर रही हैं।"

माहवारी एवं स्व्च्छता प्रबन्धन पर चले 10 दिन के इस अभियान में कई तरह की रोचक गतिविधियाँ भी कराई गईं जैसे महिलाओं के साथ आलता और मेंहदी के द्वारा पीरियड पर खुलकर बात की गयी वहीं लड़कियों के साथ पेंटिंग बनाकर इस महामारी में भी माहवारी पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है इस पर जोर दिया गया।

वाटर एड संस्था पानी, शौचालय और साफ-सफाई के मुद्दों पर 32 देश में काम करती है। इनका काम भारत के 11 राज्यों में है, यूपी के पांच जिले फतेहपुर, उन्नाव, चित्रकूट, भदोही, लखनऊ में वाटर एड का काम छह सहयोगी संस्थाओं (जर्मन डेवलपमेंट सर्विसेस उन्नाव, वात्सल्य और विज्ञान फाउंडेशन लखनऊ, सारथी डेवलपमेंट फाउंडेशन फतेहपुर, अभियान चित्रकूट, गोरखपुर एनवायरमेंट सर्विसेस भदोही) के साथ काम चल रहा है।


अप्रैल महीने में वाटर ऐड इंडिया एंड डेवलपमेंट सॉल्यूशन द्वारा समर्थित मेंसट्रूअल हेल्थ अलायन्स इंडिया (एमएचएआई) द्वारा माहवारी स्वच्छता जागरूकता एवं उत्पाद से जुड़े संस्थानों से एक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वे में देश विदेश के 67 संस्थानों ने हिस्सा लिया था। इस सर्वे में निकल कर आया कि कोविड-19 के बाद 67 प्रतिशत संस्थानों ने माहवारी स्वच्छता जागरूकता एवं उत्पाद से जुड़ी अपनी सामान्य कार्रवाई को रोक दिया है। एमएचएआई भारत में मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता पर काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों, शोधकर्ताओं, निर्माताओं और चिकित्सकों का एक नेटवर्क है।

वात्सल्य संस्था की डॉ नीलम सिंह ने बताया, "जब लॉकडाउन में पैड नहीं मिल रहे थे तब लड़कियों ने इसे एक अवसर के रूप में लिया। इन्होंने बाजार से अपनी निर्भरता कम की और घर पर ही कपड़े के पैड बनाने शुरू किये। अच्छी बात ये रही कि इसमें लड़कों ने भी हिस्सा लिया। समुदाय में हम जब भी कोई माहवारी को लेकर गतिविधि करते हैं उसमें हर उम्र के पुरुषों को भी शामिल करते हैं जिससे उनकी भी समझ इस विषय पर और मजबूत हो सके।"


माहवारी एवं स्व्च्छता प्रबन्धन पर वात्सल्य संस्था लखनऊ के 300 गाँव में काम करती है। लगभग 12000 लोगों तक इस विषय पर निरंतर बैठक और चर्चा होती है जिसमें पुरुष भी शामिल होते हैं। लखनऊ के 150 उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी माहवारी पर काम चल रहा है जिसमें शिक्षक और बच्चों के साथ बात होती है।

महिलाओं और किशोरियों के स्वास्थ्य के लिए काम कर रहीं गैर सरकारी संस्था 'वात्सल्य' लखनऊ के आठ ब्लॉक के सैकड़ों गाँव में काम करती हैं । इस संस्था ने वर्ष 2016 में लखनऊ के आठ ब्लॉक के 80 स्कूल की 450 छात्राओं (11 से 18 वर्ष) के बीच बैंक आफ़ अमेरिका के तहत वेश लाइन सर्वे किया था।

जिसमें 93 प्रतिशत छात्राओं ने कहा, माहवारी में वो मन्दिर, चर्च गुरुद्वारा नहीं जाती। 84.7 प्रतिशत ने कहा कि वो माहवारी को गंदा मानती हैं। हर तीन में से एक किशोरी यानी 33 प्रतिशत किशोरियां ही इन दिनों स्कूल जा पाती हैं।


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