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चूल्हा बन रहा महिलाओं की सेहत के लिए ख़तरा

चूल्हा बन रहा महिलाओं की सेहत के लिए ख़तराgaon connection

लखनऊ। ममता देवी (35 वर्ष) के पति सरकारी नौकरी करते हैं, गाँव में पक्का घर बना है, घर में मोटरसाइकिल, टीवी लगभग सभी दैनिक इस्तेमाल की चीजें हैं लेकिन खाना अभी भी चूल्हे पर ही बनता है क्योंकि गैस भरवाने दूर जाना पड़ता है। 

गोंडा जिला मुख्यालय से 40 किमी उत्तर दिशा में मुसोली गाँव में आज भी लगभग आधे से ज्यादा घरों में चूल्हे पर खाना बनता है। गाँव की रहने वाली ममता देवी बताती हैं, “गाँव से गैस एजेंसी 10 किमी दूर है। ऐसे में पैसे लगाकर इतनी दूर जाना फिर वहां से सिलेंडर खरीदने से अच्छा है हम घर पर चूल्हे पर ही खाना बना लें और बरसात आ रही है अब तो गैस बचाकर रखनी पड़ेगी ज्यादा बूंदा बांदी में काम आएगी।” 

विश्व स्वस्थ संगठन (डब्लूएचओ) की वर्ष 2010-11 की रिपोर्ट के अनुसार पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में हर साल करीब छह लाख मौतें घरेलू वायु प्रदूषण की वजह से होती है, जिसमें भारत से ही 80 फीसदी मौत के केस शामिल हैं। इन मौतों में 70 फीसदी लोगों की मृत्यु घरेलू चूल्हे की वजह से हुई हैं।

स्टोव पर खाना बनाने वाली महिलाओं की संख्या भी बहुत कम देखने को मिलती है। इसका कारण बताते हुए गोंडा जिले से लगभग 25 किमी दूर भतोलिया गाँव की एक बुजुर्ग महिला जानकी देवी (65) बताती हैं, “मिट्टी का तेल इतना महंगा है कि अब तो ढिबरी जलाना मुश्किल हो रहा है स्टोव कहाँ जलेगा। जहां आस पास गोबर दिखता है तुरंत उपले बना देते हैं क्योंकि जानवर भी नहीं हैं हमारे घर तो।”

ग्रामीण इलाकों में लगभग 10 फीसदी लोग अभी भी खाना पकाने के लिए उपलों का इस्तेमाल करते हैं। 1993-94 के मुकाबले इसमें मामूली, 11.5 फीसदी की गिरावट देखी गई है।

पीठन गाँव की रेखा रानी बताती हैं,” घर पर गैस चूल्हा है फिर भी ज्यादातर खाना चूल्हे पर ही बनता है। गैस चूल्हे का इस्तेमाल तभी करते हैं जब घर पर मेहमान हों,क्योंकि तब खाना जल्दी बनाना पड़ता है। क्योंकि गैस कनेक्शन नहीं है तो ब्लैक में लगभग 900 की भर जाती है।” 

बरसात में इन महिलाओं की दिक्कतें और बढ़ जाती हैं। क्योंकि लकड़ियां गीली हो जाती हैं और जलती नहीं है। सांख्यिकी मंत्रालय के 2015 के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण भारत में 67 फीसदी से भी अधिक परिवार खाना पकाने के लिए ईंधन के रुप में लकड़ियों का इस्तेमाल करता है।

लगातार चूल्हे के इस्तेमाल से होने वाली दिक्कतों के बारे में टीबी और चैस्ट हॉस्पिटल की शोधकर्ता डॉ.ललिता बताती हैं, “किसी आम चूल्हे पर खाना पकाने की अपेक्षा मिट्टी के चूल्हे पर खाना पकाने वाली महिलाओं को प्रतिरोधी फेफड़े की समस्या ज्यादा होती है।”

“इन चूल्हों से निकलने वाला धुअां सीधे महिलाओं के संपर्क में रहता है, इसलिए खाँसी होने का खतरा ज्यादा होता है और इसपर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह टीबी जैसी गंभीर बीमारियों की वजह भी बन सकता है।” डॉ ललिता आगे बताती हैं।

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