दैवी आपदा निकल जाने पर उपचार खोजते रहते हैं

दैवी आपदा निकल जाने पर उपचार खोजते रहते हैंgaon connection

पिछले दो साल से हम पानी के लिए तरसते रहे और अब शहरों की सड़कों पर भी पानी ही पानी है। हमें पता था इस साल अच्छी वर्षा होगी लेकिन हमारी तैयारी नहीं है। पानी आया है तबाही मचाकर चला जाएगा, देश फिर पानी के लिए तरसेगा। इसमें से कितना पानी हम सहेज सकेंगे। बाढ़ की तबाही और पहाड़ों पर भूस्खलन से बचने के लिए हम 70 साल से उपाय खोज रहे हैं। करने के नाम पर जो करेगा पानी का भगवान करेगा।

बाढ़ नियंत्रण के लिए मैदानी इलाकों में नदियों पर चेक बांध बनाने और उन्हें परस्पर जोड़ने की बात कही जाती रही है, काम बढ़ा नहीं। अनेक स्थानों पर बादल फटने से अचानक वर्षा होती है और बाढ़ का कारण बनती है। जुलाई 1970 में बादल फटने से अलकनन्दा नदी का जलस्तर 15 मीटर के लगभग बढ़ गया था, 1998 को मालपा में बादल फटने और भूस्खलन से 250 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें कैलाश मानसरोवर के यात्री भी शामिल थे, अगस्त 2010 में लेह में बादल फटने और भूस्खलन से करीब 1000 लोग मरे थे, केदारनाथ और अन्य स्थानों पर भारी वर्षा और भूस्खलन से अनगिनत लोग मरे थे। बादल फटना तो नहीं रोक सकते परन्तु भारी वर्षा से होने वाली तबाही घटा सकते हैं। आपदा प्रबंधन का तंत्र तभी सक्रिय होता है जब आपदा आई होती है। आपदा के पहले और आपदा गुजर जाने के बाद प्रबन्धन भी शान्त हो जाता है क्योंकि उसका काम है प्रबन्धन न कि नियंत्रण।

पहले भी नदियों के किनारे शहर और गाँव रहे हैं लेकिन तब आबादी कम थी, मकान भारी भरकम नहीं होते थे, धरती पर वनस्पति की चादर ढकी थी और मोटर गाड़ियों के न होने से पक्की सड़कों की जरूरत नहीं थी। अब पहाड़ों के ऊपर बहुमंजिला मकान बनाने और सड़कों के निर्माण से पहाड़ी ढलान अस्थिर हो गए हैं। पहाड़ों से निकला मलबा मैदानी भागों तक पहुंच कर नदियों को ही पाटता है और बाढ़ का एक कारण बनता है। पहाड़ और मैदान की समस्याओं को अलग करके नहीं देख सकते। वे एक-दूसरे से जुड़ी हैं।

पेड़ों का अधाधुंध कटान हो रहा है और वनस्पति के अभाव में पानी तेजी से बहता है जिससे पहाड़ों पर मिट्टी का कटान बढ़ गया है। सड़कों का निर्माण  नेताओं की सलाह से होता है भूवैज्ञानिकों और इंजीनियरों की सलाह से नहीं। भूस्खलन होते रहते हैं और सड़कें जगह-जगह टूटती रहती हैं। जहां पर परतदार और कमजोर चट्टानें हैं वहां यदि जल निकास वैज्ञानिक ढंग से न हुआ तो भी भूस्खलन होते हैं। 

धनी लोगों की बड़ी गाड़ियां देवभूमि पर आसानी से चली जाएं इसलिए पहाड़ों पर काफी छेड़छाड़ की गई है। एक सज्जन कह रहे थे अब तो बद्रीनाथ के दरवाजे तक गाड़ी चली जाती है, उन्हें कौन बताए यह वरदान नहीं अभिशाप है। अपनी परम्परा के अनुसार धार्मिक पर्यटन या तो पैदल होना चाहिए नहीं तो छोटे सार्वजनिक वाहनों से। कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि विकास का मैदानी मॉडल यदि पहाड़ों पर थोपा गया तो हिमालय एक दिन रेगिस्तान बन जाएगा। 

कहना कठिन है कि जो लाखों लोग अपनी गाड़ियां लेकर छोटे-छोटे बच्चों के साथ देवभूमि में देवस्थानों को जाते हैं उनमें कितने आस्थावान श्रद्धालु होते हैं और कितने मौज मस्ती के लिए देवस्थान जाते हैं। यह सच है कि आम आदमी सुविधाएं नहीं जुटाता उनका उपभोग करता है। देश चलाने वाले लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि दूर-दृष्टि और पक्के इरादे की सिर्फ बातें न करें उन पर अमल करें। जब घर में आग लगे तो कुआं खोदने से भला नहीं होगा।

आपदा प्रबंधन के लिए विद्वानों की गोष्ठियां होती हैं, प्रोजेक्ट बनते हैं और रिपोर्टें जमा होती हैं बस। बाढ़ नियंत्रण के लिए पहली बार साठ के दशक में दस्तूर कमीशन और नदियों को परस्पर जोड़ने की रिपोर्ट आई थी, तब से अनेक बार चर्चा हुई लेकिन नियंत्रण तो तब होगा जब रिपोर्टों पर कार्रवाई होगी। विश्वविद्यालयों में बड़े-बड़े प्रोफेसर बड़ी-बड़ी ग्रान्ट लेकर रिपोर्टें तैयार करते हैं लेकिन वे रिपोर्टें कितनी व्यावहारिक हैं इसका निर्णय तब होगा जब उन पर कार्यवाही होगी। यदि विपदा के समय चर्चा करना और बाकी समय रिपोर्टें तैयार करना ही आपदा प्रबंधन का ढर्रा है तो वह चल ही रहा है, इससे न बाढ़ रुकेगी और न भूस्खलन।  

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