डार्कनेट है साइबर क्राइम की दुनिया

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लखनऊ। साइबर मामलों के जानकार पवन दुग्गल कहते हैं, ''औसतन सिर्फ़ दिल्ली में ही एक महीने में 40 हज़ार के करीब साइबर अपराधों को अंजाम दिया जाता है। वास्तव में साइबर क्राइम की एक बहुत बड़ी दुनिया है। एक काला साम्राज्य है। इस काली साइबर दुनिया को डार्कनेट भी कहते हैं।''

वो आगे बताते हैं, "डार्क नेट पर एक ख़ास ब्राउज़र के साथ ही काम किया जा सकता है। डार्कनेट पर काम करने के लिए ‘टॉर ब्राउज़र का इस्तेमाल किया जाता है। इस ब्राउज़र पर काम करने से एक साइबर अपराधी लोगों की नज़रों से छिपा रहता है। किसी को भी उसकी पहचान नहीं होती है। डॉर्कनेट पर वो किसी भी तरह के साइबर क्राइम को अंजाम देकर आराम से बच सकता है।’' आईटी अधिनियम के तहत दर्ज किए गए सबसे अधिक मामले 5548 कंप्यूटर संबंधित अपराध हैं, इनमें से 4192 मामले धारा 66-ए के तहत थे जिसके अनुसार संचार सेवा के माध्यम से आक्रामक संदेश भेजने के आरोप में दो-तीन साल तक की जेल की सजा दी जाती है। आईटी अधिनियम की धारा 66-ए को मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ये कहते हुए हटाया गया था कि इस तरह के एक कानून लोकतंत्र की दो प्रमुख स्तंभों स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जड़ से मारता है।

अपराधियों के बारे में न पता करने के कारण बढ़ रहा साइबर क्राइम

क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर कहती हैं, ''साइबर अपराधों के बढ़ने के पीछे की सबसे बड़ी वजह है साइबर अपराधियों के बारे में पता ना चल पाना है। एक साइबर अपराधी अच्छे तरीके से जानता है कि उसकी पहचान भी नहीं हो पाएगी और वो अपराध को बेहद आसानी से अंजाम दे पाएगा। इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक वजह भी है।'' 

''लोग सोशल साइट्स या इंटरनेट पर किसी को परेशान तभी करते हैं जब वो अपना बदला भी लेना चाहते हैं और अपनी पहचान भी छुपाना चाहते हैं। ट्विटर या फेसबुक पर जो लोग गालियां और गलत तरीके की चीज़ें लिखते हैं वो एक तरह की मानसिक विकृति का शिकार होते हैं।’' अनुजा कपूर बताती हैं, ‘'बढ़ते साइबर अपराध के पीछे की एक बड़ी वजह बेरोज़गारी, मानसिक विकृति और गरीबी भी है। जो इसके शिकार लोगों को साइबर अपराध करने के लिए मजबूर करता है।''

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