डोभाल जैसे कुछ और होते तो बेहतर होता

डोभाल जैसे कुछ और होते तो बेहतर होतागाँव कनेक्शन

यह बात हर कोई मानता है कि खुफिया ब्यूरो में अजित डोभाल का करियर शानदार रहा। मैंने भी कुछ वर्ष पहले लिखा था कि विभिन्न पेशों में हमारे करियर लगभग समांतर चलते रहे क्योंकि मैंने अधिकांशत, उन परिस्थितियों की कवरेज की जहां वह अलग-अलग मोर्चों पर जूझ रहे थे। वरिष्ठता और उम्र के चलते वह कुछ कदम आगे बने रहे। आगामी 20 जनवरी को वह 71 वर्ष के हो जाएंगे। अगर डोभाल के कहीं जाने के तत्काल बाद भी मुझे उस स्थान पर कोई खबर मिलती तब भी वह अपनी प्रतिष्ठा की वजह से वहां चर्चा के कई बिंदु छोड़ गए होते थे। जनवरी 1981 में द इंडियन एक्सप्रेस के नए पूर्वोत्तर संवाददाता के रूप में जब मैं पहली बार मिजोरम की यात्रा पर गया तो मुख्यमंत्री थेनफुंगा साइलो ने मुझे अतीत और भविष्य पर एक लंबा भाषण दिया। इस दौरान उन्होंने यह बात भी कही कि कैसे अगर एके डोभाल जैसे कुछ और अधिकारी होते तो हालात और

बेहतर होते। 

उससे कुछ समय पहले तक डोभाल ने खुफिया ब्यूरो की मिजोरम शाखा (अनुषंगी खुफिया ब्यूरो) में सहायक निदेशक के रूप में काम किया था। करीब एक साल बाद जब मैं चोग्याल (बल्कि पूर्व चोग्याल क्योंकि इंदिरा गांधी ने सन 1975 में विलय के बाद यह पदवी खत्म कर दी थी) पाल्देन थोंडुप नामग्याल का अंतिम संस्कार कवर करने गंतोक पहुंचा तो वहां प्राय: डोभाल का नाम सुनाई देता। वह कुछ समय पूर्व तक वहां थे और अपनी छाप छोड़ गए थे। अगली बड़ी खबर के लिए मैं अक्सर पंजाब जाया करता। डोभाल वहां तो नहीं लेकिन सीमा-पार पाकिस्तान के भारतीय मिशन में थे। वह इस लिहाज से अंडरकवर थे कि उन्हें वहां वाणिज्यिक शाखा के प्रमुख के पद पर नियुक्त किया गया था। मुझे नहीं लगता कि भारत और पाकिस्तान के बीच इतना व्यापार था। डोभाल वहां अन्य चीजों पर करीबी निगाह बनाए हुए थे जिसमें पाकिस्तान की यात्रा पर जाने वाले सिख तीर्थयात्रियों को अलगाववादी एजेंडे का शिकार बनाए जाने का जोखिम भी शामिल था। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी से प्रायोजित एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना में डोभाल पर ऐसे ही तीर्थयात्रियों के एक जत्थे ने हमला किया था। 

डोभाल सन् 1968 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं लेकिन आईबी में आने वाले अपने साथ के अन्य लोगों (उदाहरण के लिए एम के नारायणन) के उलट वह आजीवन आईबी के होकर रह गए। डोभाल और नारायणन दोनों केरल बैच के हैं। भारत वापसी के बाद वह सीधे पंजाब सिख संकट से निपटने पहुंचे और वहां करीब एक दशक तक व्यस्त रहे। उनका वह कार्य तब समाप्त हुआ जब आईबी की मदद से पंजाब पुलिस के प्रमुख केपीएस गिल ने आतंक के तीसरे और सबसे लंबे दौर का खात्मा किया। मैं गिल का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने न केवल मुझे खुद तक और अपने प्रमुख अधिकारियों तक पहुंचने दिया बल्कि पूर्व शीर्ष उग्रवादियों के बड़े समूह से भी मुझे मिलने दिया जो जालंधर के पंजाब सशस्त्र पुलिस केंद्र में कैद थे। उनको ए, बी, सी आदि श्रेणियों में बांटा गया था। उनका आत्मसमर्पण चकित करने वाला था क्योंकि महज कुछ माह पहले तक वे पंजाब के पश्चिमी जिलों पर कमोबेश काबिज थे। उनमें से अधिकांश 20 से कुछ अधिक उम्र के थे और बहुत मासूमियत से बात करते थे। उनमें एक स्वयंभू मेजर जनरल भी था जिसने यह रैंक हासिल करने के लिए 87 हिंदुओं की हत्या की थी। अगर उसने 13 और लोगों या 3 और पुलिस जवानों को मार दिया होता (एक जवान पांच हिंदुओं के बराबर) तो वह खुदबखुद जनरल बन जाता। उनके किस्सों से मेरे मन में यह बात एकदम साफ  हो गई कि पंजाब में अर्जित सफलता स्थानीय पुलिस और आईबी की सफलता थी। मैंने अक्सर कहा है कि सन 1989-90 में ऑपरेशन ब्लैक थंडर के दौरान मारा गया या पकड़ा गया ए या बी श्रेणी का हर पंजाबी उग्रवादी का श्रेय डोभाल और गिल को मिलना चाहिए। आखिरी चरण में डोभाल देश भर में खालिस्तानी आतंकियों को पकडऩे में सक्रिय थे और उन्होंने इस काम को बखूबी अंजाम दिया। 

पंजाब में आतंक का खात्मा हो गया लेकिन इस बीच कश्मीर में एक नया संकट पैदा हो गया था। डोभाल एक बार फिर अपने प्रिय कार्य की ओर लौट आए थे और वह था कार्रवाई। कश्मीर से लेकर दाऊद तक कई प्रमुख कार्रवाइयों में वह आपको शामिल मिलेंगे। उनके कुछ अन्य वरिष्ठ उनके तौर-तरीकों से इत्तेफाक नहीं रखते। लेकिन उनकी प्रदर्शन क्षमता की व्यापक सराहना की जाती रही। संप्रग सरकार ने उनको जुलाई 2004 में खुफिया ब्यूरो का निदेशक बनाया। उसके बाद के उनके कार्यकाल के बारे में अपेक्षाकृत ज्यादा जानकारी मिलती है। उन्हें विवेकानंद फाउंडेशन का प्रमुख स्रोत माना जाता है जिसने दक्षिणपंथी थिंक टैंक की कमी पूरी की। अन्ना हजारे के जबरदस्त भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पीछे मुख्य रूप से उनका ही मस्तिष्क था। विवेकानंद फाउंडेशन नरेंद्र मोदी सरकार के लिए प्रतिभाओं का प्रमुख जरिया बना। उनके प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा भी वहां थे। अपनी सख्त और किवदंती का रूप ले चुकी छवि के साथ डोभाल स्वाभाविक तौर पर एनएसए बने। 

डोभाल के संरक्षक, साथी और उनके द्वारा संरक्षण प्राप्त लोग आपको यह बताएंगे कि वह आज भी ऐसे व्यक्ति हैं जिनका रुझान कार्रवाइयों में रहता है। किसी कार्रवाई की भनक तक लगी और वह हाजिर। कम से कम मानसिक रूप से तो अवश्य। यही वजह है कि पठानकोट में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) भेजने का त्वरित फैसला किया गया। लेकिन सामान्य खुफिया कार्रवाई और आतंक विरोधी कार्रवाई में तथा वायुसेना के अड्डे जैसे विशालकाय लेकिन संवेदनशील स्थान से निपटने में अंतर होता है। तमाम भ्रम और गड़बडिय़ों के लिए यही बात जिम्मेदार थी। डोभाल के पास इनकार की जगह नहीं बची क्योंकि सब मान कर चल रहे थे कि कार्रवाई का नेतृत्व उनके हाथ में है। स्पष्ट कहा जाए तो मैं अभी भी सुनिश्चित नहीं हूं कि यह काम वही कर रहे थे। लेकिन कई बार श्रुतियां असलियत पर भारी पड़ जाती हैं। अस्सी और नब्बे के दशक के डोभाल के चाहने वाले उन्हें एक शानदार खुराफाती खुफिया दिमाग के रूप में जानते हैं। यह एक रणनीतिक सैन्य ऑपरेशन था जिसे अति संवेदनशील सैन्य माहौल में अंजाम दिया गया। 

डोभाल देश के पांचवें एनएसए हैं। कई मायनों में वह हमारे सबसे ताकतवर एनएसए भी हैं। पहले एनएसए ब्रजेश मिश्रा के पास प्रमुख सचिव का काम भी था और उनका पूरा ध्यान प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश नीति पर रहता था। उसके बाद संप्रग सरकार ने काम का बंटवारा कर दिया और जेएन दीक्षित को विदेश नीति तथा एमके नारायणन को सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया। हालांकि दीक्षित के निधन के बाद उनका काम नारायणन ने ही संभाला। उन्होंने खुफिया विभाग के अलावा विदेश नीति के कुछ प्रमुख पहलू संभाले लेकिन प्रशासन छोड़ दिया क्योंकि वह टीकेए नायर का कार्य क्षेत्र था। उम्मीद के मुताबिक ही शिवशंकर मेनन विदेश नीति पर अधिक केंद्रित थे यद्यपि उन्होंने सेना पर ध्यान केंद्रित किया और एके एंटनी के संवादहीन अनिर्णय की खाई को पाटा। अब डोभाल इस काम में एक ऐसा दिमाग लेकर आए हैं जो जबरदस्त ढंग से कार्रवाई पसंद है। इस लिहाज से एनएसए के पद का खबरों में बने रहना लाजिमी है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं) 

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