लॉस एंजेलिस की चमक से दूर बच्चों की किस्मत दमका रहा ये अमेरिकी

लॉस एंजेलिस की चमक से दूर बच्चों की किस्मत दमका रहा ये अमेरिकीडालीगंज की बस्तियों में बच्चों को शिक्षित करते अमेरिकी जॉन

रिपोर्ट: वर्तिका मिश्रा

लखनऊ। लॉस एंजेलिस की चमक-दमक से दूर एक अमेरिकी डालीगंज की नई बस्ती की गलियों में बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखा रहा है। केवल सिखा ही नहीं रहे, वह यहां खुद इन्हीं बच्चों के बीच रह भी रहे हैं। वह कभी अमेरिका में पढ़ाते थे, मगर गरीब बच्चों को पढ़ाने का उनका जुनून इस बस्ती तक खींच लाया है। जहां वह राजधानी की एक एनजीओ की मदद से बच्चों के भविष्य को संवारने की कोशिश में लगा हुए हैं।

ताकि बस्ती के बच्चे कल को अनपढ़ न कहलाएं

डालीगंज के नबीउल्लाह रोड पर चलते हुए नई बस्ती की संकरी गलियों में बढ़ते जाइये। इन संकरी गलियों और छोटी-छोटी झुग्गियों में एक शख्स को सभी पहचानते हैं कि वह हिंदुस्तानी नहीं हैं। वो अथक प्रयास कर रहे हैं कि इस बस्ती के बच्चे कल को अनपढ़ न कहलायें। जॉन हाकिम, 36 वर्षीय अमेरिकी नागरिक हैं, जो लॉस एंजेलिस में फिजिक्स और केमिस्ट्री पढ़ाया करते थे, मगर मन हिन्दुस्तान की झुग्गी-झोपड़ियों के बच्चों की अशिक्षा में फँसे बच्चों को इस भंवर से निकालने में लगा हुआ था।

मुंबई में देखी झुग्गियों के बच्चों की हालत

डालीगंज की बस्तियों में बच्चों को शिक्षित करते अमेरिकी जॉन


जॉन बताते हैं, ''मैं अमेरिका में भी गरीब बच्चों को पढ़ाया करता था, मगर 2004 में मैं मुंबई आया और मैंने जब यहाँ कि झुग्गियों की दुर्दशा देखी, स्कूलों का दौरा किया तो जाना कि अमेरिका का सबसे बुरा स्कूल भी भारत के किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल के बराबर होगा, इसलिए मैंने भारत आकर यहाँ के झुग्गियों के बच्चों को पढ़ाना तय किया।'' उस वक़्त जॉन टूरिस्ट वीज़ा पर भारत आये थे और एक तय अवधि के बाद उन्हें वापस अमेरिका जाना पड़ा। फिर जॉन दिसंबर 2012 में फिर से भारत आये और दिल्ली पहुँचे। जहां उन्होंने पाया कि देश की राजधानी होने के नाते वहाँ अनेक एनजीओ कार्यरत हैं, और फिर वे उत्तर भारत के दौरे पर निकल गए, पटना, कानपुर, आगरा आदि जगहों पर एक-एक हफ्ते के ठहराव के बाद जॉन ने लखनऊ में रहकर काम करना तय किया।

शुरू किया अनूठा प्रयास

झुग्गियों में लोगों से सम्वाद स्थापित करने के लिए जॉन ने खुद भी हिंदी सीखी। जॉन बताते हैं कि, ''मैं बिना कोई पैसा लिए इन बच्चों को पढाता हूँ, ताकि कल जब ये स्कूल जाएँ तो इन्हें शुरूआती अक्षर ज्ञान तो हो ही।'' डॉ. सुनीता गांधी का एनजीओ ''देवी संस्थान'' जॉन की काफी मदद करता है। एनजीओ और जॉन ने मिलकर एक ''पॉकेट बुकलेट'' डिज़ाइन की है। जिसे ये लोग बड़े स्कूलों के बच्चों को बाँटते हैं, और बताते हैं कि इसे वे अपने घर में काम करने वाले लोगों, रिक्शा चालकों आदि तक पहुंचाएं। यह अपने आप में अनूठा प्रयास है। गरीब बच्चों तक शिक्षा को पंहुचाने का साथ ही अमीर घर के बच्चों को भी इस विषय में संवेदनशील बनाने का।

साथ में जुड़े तीन और शिक्षक

जॉन के साथ 3 और शिक्षक इस मुहीम में जुटे हुए हैं जो नई बस्ती के ही रहवासी हैं। अनीता, मरियम और शमीम भी यहाँ जॉन के साथ नन्हे बच्चों को जीवन का ककहरा सिखाते नज़र आते हैं। जॉन वक़्त वक़्त पर चाइल्ड हेल्पलाइन को भी यहाँ बुलाते हैं और बच्चों को शिक्षित करते हैं।

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