एड्स मरीजों के साथ भेदभाव पर अब दो साल की जेल

Kushal MishraKushal Mishra   5 Oct 2016 9:23 PM GMT

एड्स मरीजों के साथ भेदभाव पर अब दो साल की जेलaids concept pic

नई दिल्ली (भाषा)। एचआईवी आौर एड्स से पीड़ित लोगों के साथ भेदभाव करने पर अपराधियों को अब जल्द ही अधिकतम दो साल की जेल और एक लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है। सरकार ने इस संबंध में एक मसौदा कानून में संशोधनों को मंजूरी दे दी।

विधेयक को मिली मंजूरी

मसौदा कानून के जरिए ऐसे लोगों के साथ भेदभाव करने वालों के खिलाफ शिकायतों की जांच के लिए एक औपचारिक तंत्र स्थापित करने और कानूनी जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रावधान करके एड्स मरीजों और एचआईवी विषाणु से संक्रमित लोगों के हितों की रक्षा करने की कोशिश की गई है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘एचआईवी एवं एड्स विधेयक, 2014' को मंजूरी दे दी, जिसके तहत इस तरह के लोगों के साथ भेदभाव करने वालों को न्यूनतम तीन महीने और अधिकतम दो साल के कारावास की सजा होगी और एक लाख रुपये तक का जुर्माना देना पड़ेगा।

विधेयक में बातों को किया सूचीबद्ध

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि विधेयक में राज्यों और केंद्र सरकार के लिए जहां तक संभव हो एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी प्रदान करना अनिवार्य बनाया गया है। विधेयक में उन बातों को सूचीबद्ध किया गया है जिनके आधार पर एचआईवी से संक्रमित लोगों और उनके साथ रह रहे लोगों के साथ भेदभाव करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इनमें रोजगार, शैक्षणिक संस्थानों, स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं, निवास के लिए या किराए पर दी गई संपत्तियों समेत अन्य के संबंध में अस्वीकृति, समाप्ति या अनुचित व्यवहार शामिल है।

बीमा की सुविधा से नहीं रख सकती वंचित

प्रस्तावित विधेयक के तहत 100 कर्मचारियों वाले संगठनों में एचआईवी और एड्स पीड़ितों की शिकायतों को देखने के लिए एक शिकायत अधिकारी रखना अनिवार्य होगा। वहीं, हर राज्य के लिए यह अनिवार्य बनाया गया है कि वह इस कानून के तहत होने वाले उल्लंघनों को देखने के लिए लोकपाल नियुक्त करें। प्रस्तावित कानून के तहत यहां तक कि बीमा कंपनियां भी एचआईवी पोजिटिव व्यक्तियों के साथ भेदभाव नहीं कर सकतीं और बीमा की सुविधा से उन्हें वंचित नहीं कर सकतीं।

भेदभाव के मुद्दों को मिलेगा निराकरण

नड्डा ने कहा, ‘‘यह विधेयक एड्स, एचआईवी पॉजिटिव मामलों के साथ जुड़े कलंक और उनके साथ होने वाले भेदभाव के मुद्दों का निराकरण करने की कोशिश करता है। दूसरा उद्देश्य ऐसे लोगों को उचित वातावरण मुहैया कराना है ताकि अन्य नागरिकों की तरह वो भी काम कर सकें और हर सुविधा का उन्हें भी अधिकार हो।'' विधेयक में रोजगार पाने या स्वास्थ्य सेवाएं या शिक्षा प्राप्त करने के लिए एचआईवी जांच की अनिवार्यता पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।

नहीं किया जा सकता है बाध्य

विधेयक के अनुसार ‘‘किसी भी व्यक्ति को एचआईवी संबंधी उसकी स्थिति के बारे में खुलासा करने के लिए तब तक बाध्य नहीं किया जा सकता जब तक कि उसकी सूचित सहमति न हो और अदालत के आदेश के तहत ऐसा करना अनिवार्य नहीं हो।'' नड्डा ने कहा, ‘‘जहां तक दंडात्मक और रोकथाम उपायों का सवाल है तो विधेयक में इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि समाज में घृणा या भेदभाव का वातावरण नहीं रहे।''

अब हमने इसे दंडनीय बनाया

नड्डा ने कहा, ‘‘हमने इसे दंडनीय बनाया है। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए जहां तक संभव हो एआरटी उपचार सभी मरीजों को प्रदान करना अनिवार्य होगा।'' विधेयक में कहा गया है, ‘‘किसी भी व्यक्ति को अपनी एचआईवी स्थिति का खुलासा करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। व्यक्ति की सहमति और जरुरत पड़ने पर अदालत के आदेश पर इसका खुलासा किया जा सकता है।'' एचआईवी से संक्रमित लोगों की सूचना का रिकॉर्ड रखने वाले संस्थानों को डेटा सुरक्षा संबंधी कदम उठाने होंगे। प्रस्ताव के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु के एचआईवी से संक्रमित या पीड़ित हर व्यक्ति को साझा घर में रहने और घर की सुविधाओं का आनंद लेने का अधिकार है।

प्रतिबंध लगाया गया

विधेयक में एचआईवी से संक्रमित लोगों और उनके साथ रह रहे लोगों के खिलाफ नफरत फैलाने की वकालत करने या उनसे संबंधित सूचना प्रकाशित करने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।विधेयक नाबालिगों के लिए संरक्षण भी मुहैया कराता है। बारह से 18 साल तक का ऐसा कोई भी नाबालिग, जिसमें एचआईवी या एड्स से पीड़ित परिवार के मामलों का प्रबंधन करने और उन्हें समझने के लिए पर्याप्त परिपक्वता है, वह 18 वर्ष से कम आयु के अपने अन्य भाई या बहन के संरक्षक की भूमिका निभा सकता है। यह प्रावधान शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले, बैंक खातों के संचालन, संपत्ति के प्रबंधन, देखभाल एवं उपचार संबंधी मामलों में लागू होगा।

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