लातूर: ‘पानी ऐसे बचाते हैं जैसे सोना हो’

vineet bajpaivineet bajpai   20 Feb 2017 8:53 PM GMT

लातूर: ‘पानी ऐसे बचाते हैं जैसे सोना हो’पानी के लिए होती है मशक्कत। गर्मियों के दौरान ऐसे नजारे आम होते हैं यहां।

लातूर (महाराष्ट्र)। ''पानी ऐसे बचाते हैं कि जैसे सोना। नहाने में कम पानी खर्च करते हैं, ताकि पीने का पूरा हो पाए।" एक मंदिर के सामने सीढ़ीनुमा कुएं के पास खड़ीं सेनाली परमेश्वर मंगे (50 वर्ष) बताती हैं, ''सुबह-सुबह भीड़ हो जाती है इसलिए पानी भरने के लिए जल्दी उठना पड़ता है।"

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई से 450 किमी दूर पूरब दिशा में लातूर जिले के सोनावती गाँव में 1500 की आबादी की प्यास बुझाने की जिम्मेदारी सिर्फ एक कुएं पर है। वो भी इसमें पानी 2200 फीट लंबी पाइप लाइन के ज़रिए भरा जाता है। इस एक कुएं की कहानी सूखे से जूझते करोड़ों भारतीय किसानों की गाथा है। जिसे सरकारें व मीडिया भुलाए बैठे हैं।

केंद्रीय जल आयोग की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार 2012 व 2013 के बीच मानसून पूर्व लिए गए भू-जलस्तर के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र में 0-2 मीटर, जबकि यूपी में 2-4 मीटर नीचे गया है। देश में भू-जल स्तर 0-4 मीटर तक नीचे गया है।

किसानों की जहां एक तरफ सूखे ने फसल चौपट कर दी है, तो वहीं दूसरी ओर बढ़ता साहूकार का क़र्ज़ किसानों को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रहा है।

लातूर जि़ला मुख्यालय से करीब सात किलोमीटर दूर के हासेगाँववाड़ी में तीन किसानों आत्महत्या कर ली। इन सभी पर साहूकार का क़र्ज़ था।

हासेगाँववाड़ी की कल्पना न्यूरत्ती साठी के पति न्यूरत्ती प्रकाश साठे ने 24 जुलाई को एक पेड़ पर फंसी लगा ली। ''यहां की मिट्टी बहुत हल्की है, उसमें फ सल अच्छी नहीं होती। इसलिए पति ने साहूकार से दो लाख रुपये का क़र्ज़ पांच प्रतिशत हर महीने के हिसाब से लेकर खेत में मिट्टी डलवाई थी। लेकिन फसल चौपट हो गई और क़र्ज़ नहीं चुका पाए। इसलिए फांसी लगा ली।" वह आगे कहती हैं, ''यहां सिर्फ खरीफ की ही फसल होती है। इस बार वो भी बर्बाद हो गई। वो क़र्ज़ चुकाने का ज़रिया थी।"

आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को सरकार एक लाख रुपए देती है, लेकिन कल्पना को वह मदद भी नहीं मिली। क्योंकि ज़मीन पति के नहीं, उनके पिता के नाम थी। ''हमने सरकार से मदद के लिए सीएम को पत्र भी लिखा है लेकिन अभी तक कोई मदद नहीं मिली।" लातूर में काम करने वाले एनजीओ 'स्वराज अभियान' की कार्यकत्री निशा बाडगिरे बताती हैं, ''इस जिले में पिछले एक वर्ष में करीब 50 से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं।"

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