कभी 10 लाख लोगों का पेट पालने वाली एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चीनी मिल आज कूड़े में

कभी 10 लाख लोगों का पेट पालने वाली एशिया की दूसरी सबसे बड़ी चीनी मिल आज कूड़े मेंसरैया चीनी मिल ।

चौरीचौरा/गोरखपुर। चीनी का कटोरा कहे जाने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए सरैया चीनी मिल कभी संजीवनी हुआ करती थी। 10 लाख से ज्यादा लोगों को जीवन इस चीनी मिल पर आश्रित था।

जब यह चीनी मिल चला करती थी तो गोरखपुर जिले के पूरब में स्थित चौरीचौरा के सैरया कस्बे में रौनक हुआ करती थी लेकिन साल 2012 में इस चीनी मिल के बंद हो जाने से जहां लाखों लोग बेरोजागर हो गए वहीं गन्ना कर्ज में डूब गए। लेकिन इसबार के विधानसभा चुनाव में गन्ना किसानों और चीनी मिल कर्मचारियों का दर्द मु्द्दा नहीं बन पाया है।

सैरया चीनी मिल में काम करने वाले बनारसी सिंह ने बताया, ''मैंने 30 साल तक इस चीनी मिल में काम किया, लेकिन आज दानेदाने को मोहताज हूं। साल 2012 में बिना बताए मालिक ने चीनी मिल को बंद कर दिया। हम लोगों ने तो बकाया सैलरी मिली और न ही पेंशन।'' सैरया चीन मिल प्रबंधन पर गन्ना किसानों का 100 करोड़ रूपए से ज्यादा का बकाया है। इसको लेकर तमात प्रकार के आंदोलन होने के बाद भी किसानों को कुछ नहीं मिला।

कभी इन्हीं रेल इंजनो से ढोया जाता था गन्ना।

सरैया चीनी मिल का समृद्ध इतिहास रहा है। यह एशिया का दूसरी सबसे पुरानी चीनी मिल है। इस चीनी मिल के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए चीनी मिल के पूर्व कर्मचारी और स्थानीय पत्रकार राज अनंत पांडेय ने बताया, ‘’सरैया चीनी मिल की स्थापना 1900 में पंजाब से आकर सरदार उमराव सिंह मजीठिया ने स्थापित किया था। पंजाब की राजनीति के रसूखदार विक्रमजीत सिंह मजीठिया और केन्द्रीय खाद्य और प्रसंस्करण मंत्री हरसिमतर कौर बादल इसी परिवार की बेटी हैं।

यह देश की पहली मैकेनाइज्ड सुगर मिल थी। जिसकी पेराई क्षमता 32 हजार कुंतल प्रतिदन दिन थी। '' इस बारे में जानकारी देते हुए इस चीनी मिले के पूर्व कर्मचारी गुलाब गुप्ता ने बताया '' पूर्वी उत्तर पद्रेश के इस क्षेत्र में बड़ी मात्रा में गन्ना की खेती होती थी। 64 हजार हेक्टेयर में पैदा होने वाले गन्ने को अकेले इस मिल में लाया जाता था। यह चीनी मिल हमेशा लाभ में रही लेकिन प्रबंधकों के मनमाने रवैये और गन्ना किसानों को भुगतान का समय से नहीं देने के कारण चीनी मिल बंद हो गई। ''

सरैया चीनी मिल देश की उन गिनीचुनी मिलों में रही जिसके पास गन्ना को लाने के लिए अपना रेलवे ट्रैक और ट्रेने थी। सरैया चीनी मिल से कुशीनगर और देवरिया जिले से गन्ना लाने के लिए 33 किलोमीटर का ट्रैक था। जिसपर तीन स्टेशन बनाए गए थे। सरैया चीनी मिल प्रबंधन के पास तीन भाप से चलने वाले ट्रेनों के इंजन थे। इनके जरिए आसपास के गन्नों की ढुलाई की जाती थी। इसमें से भाप इंजन सम्राट अशोक टि्वट लोका था। जिसको इंडियन रेल म्यूजियम ने मांगा था लेकिन आज यह सैरया चीनी मिल में कबाड़ हो रहा है। इसके साथ दो और इंजनों का यही हाल है।

पूर्वांचल के गन्ना किसान नेता चंद्रभान सिंह ने बताया कि आज जब गन्ने का जिक्र आता है तो लोग पश्चिम की तरफ देखते हैं। लेकिन 1990 तक पूर्वांचल में सबसे ज्यादा गन्ना की खेती और चीनी का उत्पादन होता था लेकिन सरकार की अनदेखी और चीनी मिलों का निजीकरण और मालिकों के मनमोन रवैये के कारण यहां की अधिकतर चीनी मिले बंद है। स्थित यह है कि पूर्वांचल की राजधानी कहे जोन वाले गोरखपुर जिले की दो चीनी मिले सैरया और पिपराइच बंद हैं। पूर्वांचल में सबसे ज्यादा चीनी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध् देवरिया जिले में कभी 14 चीनी मिले चला करती थी लेकिन अब मात्र पांच चीनी मिले ही चल रही हैं।

लाभ में होने के बाद भी आखिर चीनी मिलों को बंद करने की नौबत क्यों आई इस बार में यहां के वरिष्ठ पत्रकारक मनोज कुमार सिंह ने बताया '' पहले चीनी मिल प्रबंधन, चीनी मिल कर्मचारी और गन्ना किसान के बीच एक अच्छा रिश्ता हुआ करता था। चीनी मिल प्रबंधक गन्ना का भुगतान समय से करने के साथ ही किसानों की सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के साथ भी खड़े रहते थे। लेकिन 1990 के दशक में यह संबंध खराब होने लगा। '' उन्होंने बताया कि मिल मालिक गन्ना किसानों का पैसा समय से भुगतान करना बंद कर दिया। जिसके नतीते में मिलों पर गन्ना किसानों का करोड़ों बकाया हो गया। इसको लेकर आंदोलन होने लगे और अंत में मिलों पर ताला लटक गया।

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