कावेरी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट का कर्नाटक को अल्टीमेटम, कल दोपहर दो बजे तक छोड़ें पानी

कावेरी जल विवाद: सुप्रीम कोर्ट का कर्नाटक को अल्टीमेटम, कल दोपहर दो बजे तक छोड़ें पानीकावेरी जल विवाद

दिल्ली। कावेरी के पानी को लेकर विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के लिए पानी न छोड़ने पर फिर कर्नाटक को फटकार लगाई है। कोर्ट ने कर्नाटक से कहा कि वो मंगलवार दोपहर दो बजे तक कोर्ट को बताए कि उसने तमिलनाडु के लिए निर्धारित पानी छोड़ा है या नहीं।

कावेरी जल विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वो 30 सितंबर के आदेश में संसोधन करे। केंद्र ने मामले को सुलझाने के लिए कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड का गठन किया था। हालांकि इस पर सरकार ने कहा कि काम संसद का है। कोर्ट ने 30 सितंबर को अपने आदेश में बोर्ड के गठन का आदेश दिया था।

कावेरी विवाद करीब 136 साल पुराना है।

कोर्ट के बाद-बार के आदेशों के बावजूद पानी नहीं छोड़े जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने इस देरी पर सवाल उठाते हुए कहा कि हमारे आदेश का पालन करके अपनी साफ मंशा को सामने लाइए। कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को आदेश दिया था कि वो 1 अक्टूबर से अगले छह दिन के लिए तमिलनाडु के लिए 6000 क्यूसेक रोजाना पानी छोड़ने के आदेश दिए थे। कोर्ट ने सख्ती अपनाते हुए कहा था कि ऐसे हालात मत पैदा कीजिए कि कानून के गुस्से का शिकार होना पड़े।

कोर्ट ने अपने आदेश में उस वक्त 4 अक्टूबर तक कावेरी मैनेजमेंट बोर्ड बनाने के भी आदेश दिए। साथ ही इस मामले में शामिल कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पंडुचेरी से शनिवार शाम तक अपने प्रतिनिधियों के नाम देने को कहा था। कोर्ट के कहा था ये टीम ही इलाके का दौरा कर सुप्रीम कोर्ट में छह अक्टूबर तक रिपोर्ट देगी।

अंग्रेज भी नहीं सुलझा पाए थे ये विवाद

दक्षिण की गंगा कही जाने वाली कावेरी कई राज्यों में होकर बहती है। कर्नाटक और तमिलनाडु इस कावेरी घाटी में पड़ने वाले प्रमुख राज्य हैं। इस घाटी का एक हिस्सा केरल में भी पड़ता है और समुद्र में मिलने से पहले ये नदी कराइकाल से होकर गुजरती है जो पुडुचेरी का हिस्सा है।

कर्नाटक का तर्क

कर्नाटक दावा करता है कि अंग्रेजों के जमाने में कावेरी नदी के जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच जो समझौता हुआ, उसमें उसके साथ न्याय नहीं हुआ क्योंकि इस समझौते में उसे उसका पानी का उचित हिस्सा नहीं दिया गया। कर्नाटक यह भी कहता आया है कि वह नदी के बहाव के रास्ते में पहले पड़ता है इसलिए उसका जल पर पूरा अधिकार बनता है।

तमिलनाडु का दावा

तमिलनाडु का दावा है कि समझौते के मुताबिक कावेरी का उतना ही हिस्सा मिलते रहना चाहिए। जबकि राज्य में खेती और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त जल उपलब्ध कराए जाने की आवश्यकता है।

पानी को लेकर देश के बड़े 13 राज्यों में चलती रहती है तनातनी

कर्नाटक। कावेरी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक में जल विवाद 135 साल से भी पुराना है। कावेरी के साथ देश में और कई नदियां भी हैं जिन के पाने को लेकर विवाद है।

पांच राज्यों में यमुना जल विवाद

दशकों पुराने यमुना जल का विवाद देश की राजधानी समेत पांच राज्यों से जुड़ा है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हिमाचल में तकरार होती रहती है। 1954 में हुए समधौते के तहत हरियाणा को 77 फीसदी जबकि यूपी को 23 फीसदी जल का हिस्सा आया। लेकिन फिर राजस्थान, दिल्ली और हिमाचल ने अपनी मांग तेज की। 1993 में हरियाणा दिल्ली के बीच समझौता हुआ। और मुनक नहर की जन्म हुआ। इसके बाद भी विवाद जारी रहा तो 1994 में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री के प्रयासों से पांचों राज्यों में एक समझौता हुआ। जिसके तहत सबसे ज्यादा पानी दिल्ली को मिलना था। लेकिन अपनी पेयजल जरुरत के लिए दिल्ली ने और पानी की मांग की। जिस पर विवाद जारी है।

यमुना दिल्ली की लाइफ लाइन है।

महानदी को लेकर ओडिशा-छत्तीसगढ़ में ठनी

महानदी के पानी को लेकर ओडिशा और छत्तीसगढ़ सरकार में ठन चुकी है। छत्तीसगढ़ सरकार ने महानदी पर चार बड़ी परियोजनाओं को निर्माण प्रस्तावित किया है, जिनमें केवल बांध के निर्माण को मंजूरी दी गई है। केलों के अलावा छत्तीसगढ़ ने पेरिमानडीह, कैंडुला और तेंडुला परियोजनाओं को केंद्रीय जल आयोग के पास भेजा है। ओडिशा सरकार का आरोप है कि तेंडुला डैम निर्माण से ओडिशा में पानी का संकट हो जाएगा।

महानंदा के पानी को लेकर ओडिशा और छत्तीसगढ़ में तनातनी चलती रहती है।

नर्मदा के पानी को लेकर कलह

नर्मदा के पानी को लेकर मध्यप्रदेश और गुजरात में तलवारें खिंची हैं। दोनों राज्य नदी के ज्यादा से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करना चाहते हैं। नर्मदा पर बने बांधों, पानी के इस्तेमाल और विस्थापन को लेकर दोनों में विवाद बढ़ा है। जो अंतहीन समस्या बन गया है। एमपी में अमरकंटक से निकलने वाली नर्मदा 1300 किमी लंबी है। इस विवाद में राजस्थान भी कूदा हुआ है। ये विवाद निपटाने के लिए अंतराज्जीय जल अधिनियम 1956 की धारा-4 के तहत नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण भी बनाया गया है। 1979 में इस न्यायाधिकरण ने अपने फैसले में कहा कि गुजरात को 90 लाख एकड़ फीट, एमपी को 182.5 लाख एकड़ फीट और महाराष्ट्र को 2.5 लाख एकड फीट दल दिया जाए। नर्मदा पर बने सरदार सरोवर बांध पर भी विवाद रहा है।

यूपी, बिहार और एमपी में सोन नदी पर विवाद

सोन नदी के दल पर यूपी, बिहार और एमपी में विवाद है। वर्ष 1973 में सोन और रिहंद नदियों के विवाद को निपटाने के लिए 1973 इस विवाद को निपटाने के लिए वाणसागर समझौता हुआ था। लेकिन बिहार इस पर सवाल उठाता रहा है। समझौते के तहत रिहंद नदी का पूरा पानी बिहार को आवंटित किया था लेकिन एनटीपीसी और यूपी सरकार रिहंद जलाशय से बिहार के हिस्से का पानी इस्तेमाल करते रहे हैं।

सोन नदी।

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