चांद दिखने के साथ मोहर्रम की शुरुआत, इमामबाड़े से निकला अलम का जुलूस 

चांद दिखने के साथ मोहर्रम की शुरुआत, इमामबाड़े से निकला अलम का जुलूस लखनऊ स्थित इमामबाड़े में जुलूस के दौरान का नजारा। फोटो विनय गुप्ता

उज़ैफ मलिक

लखनऊ। मुहर्रम-उल-हराम का चाँद कई देशों में देखे जाने के बाद इस्लामिक नये साल की शुरुआत हो गयी है।

मुहर्रम इस्लामी साल यानी हिजरी सन का पहला महीना है। हिजरी सन् का आगाज इसी महीने से होता है। इस महीने को इस्लाम के चार पाक महीनों में शुमार किया जाता है। इस्लाम के प्रवर्तक पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में मनाया जाने वाला मुहर्रम का त्योहार चांद दिखने के साथ ही शुरू हो गया है।

फोटो- विनय गुप्ता

इसके पहले दिन को अलम कहा जाता है इस दिन इसमें ताजिए और सवारियां शामिल होती हैं। मुहर्रम का चांद दिखने के साथ ही इमामबाड़ों में मजलिसों का सिलसिला भी शुरू हो जाता है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित बड़े ईमामबाड़े में सोमवार को जुलूस निकाला गया। यह सिलसिला दस दिनों तक शिद्दत के साथ जारी रहेगा। इन दस दिनों में जगह-जगह ताजिए बिठाए जाएंगे तथा शरबत और पानी की सबीलें लगाई जाएंगी।

मुहर्रम महीने के 10वें दिन को 'आशुरा' कहते हैं। आशुरा के दिन हजरत रसूल के नवासे हजरत इमाम हुसैन को और उनके बेटे, घरवाले और उनके सथियों (परिवार वालों) को करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था।

इस दौरान मुहर्रम का यौमे आशूरा पर परम्परागत जुलूस निकाला जाता है। गौरतलब है कि पहली मुहर्रम से इस्लामी नया साल हिजरी सन्‌ 1438 का आगाज हो गया है। मुहर्रम से इस्लामी नया साल भी शुरू होता है, इसलिए लोगों ने इस नए साल का इस्तकबाल किया।

फोटो- विनय गुप्ता

इस्लामी नया साल कुर्बानी से शुरु होता है और कुर्बानी पर ही खत्म होता है। इसका मकसद त्याग, समर्पण और सच्चे रस्ते को अपनाना और आपसी प्यार और भाईचारे के साथ सेवा का भाव पैदा करना है। इस्लामी नए साल पर देश में अमन शांति, एकता, भाईचारा और खुशहाली की कामना की जाती है।

मुहर्रम इस्लाम धर्म के लोगों का एक ख़ास त्यौहार है। इस महीने की बहुत ख़ासियत और महत्व है। सन् 680 में इसी महीने में कर्बला में पैगम्बर हजरत मुहम्म्द स० के नाती इमाम हुसैन और यजीद के बीच एक जंग हुई थी, इस जंग में जीत हज़रत इमाम हुसैन अ० की हुई। पर् जाहिरी तौर पर यजीद के कमांडर ने हज़रत इमाम हुसैन अ० और उनके सभी 72 साथियों (परिवार वालों) को शहीद कर दिया था। जिसमें उनके छः महीने के बेटे हज़रत अली असग़र भी शामिल थे। और तभी से तमाम दुनिया के ना सिर्फ़ मुसलमान बल्कि दूसरी क़ौमों के लोग भी इस महीने में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत का ग़म मनाकर उनकी याद करते हैं। आशूरे के दिन यानी 10 मुहर्रम को एक ऐसी घटना हुई थी, जिसका दुनिया के इतिहास में एक खास पहचान है। इराक कर्बला में हुई यह घटना दरअसल सच के लिए जान न्योछावर कर देने की जिंदा मिसाल है।


Share it
Top