मुजफ्फरनगर का दर्द: दंगे के बाद किसान भी बटे, कभी मिलकर उठाते थे मुद्दे, अब बदल गई राहें

Rishi MishraRishi Mishra   5 Oct 2016 8:32 PM GMT

मुजफ्फरनगर का दर्द: दंगे के बाद किसान भी बटे, कभी मिलकर उठाते थे मुद्दे, अब बदल गई राहेंकवाल गांव से पहले नहर के पास पुल की सड़क जहां हुई थी दंगे की शुरुआत

कवाल (मुजफ्फरनगर)। कवाल गांव से कुछ दूरी पर गंग नहर के पुल से कुछ पहले ही लगे बोर्ड पर लिखा है कि आगे पुल कमजोर और संकरा है। वाहन धीमी गति से चलाएं। पुल के एक किनारे पर पुलिस की छोटी चौकी है। दो साल हो गए। नहर का वह किनारा अब पूरी तरह से शांत है। मगर यहां दो साल पहले नजारा दूसरा था। एक समुदाय विशेष की महापंचायत के लोगों को लौटते हुए यहां पर ही बड़े दंगे का आगाज हुआ था। मामूली छेड़छाड़ के बाद सबसे पहले तीन हत्याएं हुईं और उसके बाद पूरा मुजफरनगर दंगे की आग में जल गया। 48 लोग मरे, सैकड़ों घर जलाए गए, हजारों बेघर हुए थे।

दो साल बाद जब मैं यहां पहुंचा तब देखा कि अभी तक इस दंगे के घाव हरे हैं। कवाल और मलूकपुरा इन दो गांवों के बीच हुए झगड़े के बाद जो दंगा हुआ उसके बाद अब इस जिले में किसानों में जाट-मुसलमान एकता खंडित हो चुकी है। दोनों ओर डर कायम है। आंखों संदेह हैं। यहां तक की पीडब्ल्यूडी को एक सड़क का निर्माण करवाना पड़ा है जो कवाल को मलूकपुरा से अलग करती है।

यहां के सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाली एक बालिका की छेड़छाड़ को लेकर से सारा बवाल शुरू हुआ था। कवाल गांव से करीब दो किलोमीटर पहले सिखेड़ा गांव है, यहां के प्राथमिक स्कूल की प्रिंसिपल रश्मि मिश्रा बताती हैं कि अब यहां सौहार्द वाली वह बात नहीं नजर आती है। सब एक दूसरो को शक की निगाह से देखते हैं।इस कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियों तक पर इस दंगे का बुरा असर अब भी महसूस किया जा सकता है। पुल पर बने पुलिस चेकपोस्ट पर लगे पत्थर पर तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी के नाम का बोर्ड लगा हुआ है। यहां तैनात सिपाही मायाराम ने बताया कि भइया संवदेनशील तो अभी ये इलाका है। इसलिए ये चेकपोस्ट भी बनाया गया। आगे कवाल की पुलिस चौकी है, जहां 24 अगस्त की रात दंगाइयों ने हमला कर के दो भाइयों के कत्ल के आरोपियों को छुड़ा लिया था। यहां तैनात हेडकांस्टेबल सुनील कुमार ने बताया कि एसओ साहब गए हैं। मोहर्रम का समय हैं, गांवों में गश्त पर गए हैं। यहां ये सब बहुत जरूरी हो गया है।

बढ़ते बढ़ते कवाल गांव आ गया। अजनबी चेहरे यहां अभी संदेह और आशंका की नजर से देखे जाते हैं। जैसा मेरे साथ होता रहा। गांव के बाहर पान की दुकान लगाने वाले रहीम अंसार भावशून्य हैं। कहते हैं अब तो लोग मजहब देख कर ही पान खाते हैं। वरना एक समय हमारी दुकान पर लोग जमा होते थे। मुस्लिम बाहूल्य कवाल गांव के उस चौराहे तक भी हम पहुंचे जहां दो युवकों का कत्ल हुआ था। चौराहा मानो आज भी उस मनहूस वारदात की गवाही दे रहा हो। कवाल गांव खत्म हुआ तो हम जाट बाहुल्य मलूकपुरा गांव की ओर बढ़े गन्ने के खेतों में गन्ना अब कटान के लायक है। तीन गन्नों को साथ बांध कर उनको आंधी आने की दशा में गिरने की कवायद की गई है। पंगडंडी पर करीब तीन से चार किलोमीटर तक चलने के बाद हम मलूकपुरा पहुंचे। चारपाई पर मनोज कुमार बैठे मिले। परंपरा के मुताबिक गांव आए व्यक्ति के सम्मान में पहले पानी और बाद में चाय बिस्कुट आया। फिर उनके पिता जी और मनोज ने बताया कि हमारे गांव के रास्ते को अब कवाल से अलग कर दिया गया है। एक नई सड़क बना दी गई, जो सीधे बाइपास से जोड़ती है। इधर के लोग उधर नहीं जाते हैं और उधर वाले इधर नहीं आते हैं। अब लगता नहीं है कि वह बात कभी आएगी जो कभी हुआ करती थी।

राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में भी एक थे हिंदू मुसलमान

मुजफ्फरनगर को लेकर यहां जानसठ रोड के निवासी शिक्षक अनिल सिंह अस्वाल बताते हैं कि जब पूरे देश में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद आंदोलन चल रहा था, तब मुजफ्फरनगर में हिंदू और मुसलमान किसान मिल कर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में गन्ने के लिए आंदोलन कर रहे थे। पड़ोस के मेरठ में दंगा हो रहा था, मगर यहां सब एक थे। मगर अब ऐसा नहीं है। किसानों के बीच इस टूट का लाभ मिल मालिक उठा रहे हैं। चौधरी टिकैत रहे नहीं। किसान को अपने गन्ने के बदले मिल मालिक परची दे देते हैं, मगर भुगतान साल साल भर बीतने पर नहीं किया जाता है। मगर किसान की सुनवाई नहीं होती है।

कवाल की वह पुलिस चौकी जहां किया था दंगाइयों ने किया हमला

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