जानते हो जब एक सैनिक सरहद पर होता है तो उसके परिवार पर क्या बीतती है...?

जानते हो जब एक सैनिक सरहद पर होता है तो उसके परिवार पर क्या बीतती है...?जानते हो जब एक सैनिक सरहद पर होता है तो उसके परिवार पर क्या बीतती है...?

लखनऊ। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भारत पाक सीमा पर तनाव है। जवान रात-दिन की सरहद की निगरानी तो कर रहे हैं, देश में घुस चुके आतंकियों की तलाश भी जारी है। देश में सेना को लेकर लोगों का जज्बा भी उमड़ रहा है इसी बीच एक सैनिक की पत्नी ने 'ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे' के फेसबुक पेज पर एक पोस्ट लिखी है। इस पोस्ट में लिखा है जब एक सैनिक देश की सरहद पर होता है तो उसके परिवार पर क्या बीतती है। इस पोस्ट को लिखा है नेहा कश्यप ने जो खुद पेशे से एक वकील हैं। इस पोस्ट को अबतक 10 हज़ार से ज़्यादा लोग शेयर कर चुके हैं।

नेहा लिखती हैं, ''हम पहली बार तब मिले जब मैं पुणे के सिंबॉयोसिस कॉलेज में लॉ की पढ़ाई कर रही थी और वो अकेडमी में कैडेट थे। सबकुछ बड़े मजेदार अंदाज में शुरू हुआ। मैं और मेरी दोस्त हर हफ्ते के आखिर में 11 रुपए में एक बस पकड़ कर NDA की एकेडमी जाते थे। दरअसल, वहां कैंटिन में खाना बहुत सस्ता होता था। इस तरह मैं और मेरे पति दोस्त बने। हालांकि बहुत जल्द वे देहरादून के IMA चले गए और फिर एक ऑफिसर के तौर पूरे भारत में कई जगह उनका ट्रांसफर होता रहा।''

वो आगे लिखती हैं कि वो 2002 का साल था और मोबाइल फोन अभी भारत में आया ही था। ऐसे में हम चिट्ठियों से ही एक-दूसरे को अपनी रोजमर्रा के किस्से-कहानियां बताते थे। हमारी बातें बचकानी सी होती थीं, लेकिन मुझे पता चला कि फौजी होने के बावजूद वह कितने नॉर्मल इंसान हैं। छह साल ऐसे ही चलता रहा और आखिरकार एक दिन उन्होंने मुझे SMS किया कि मेरे दिल में तुम्हारे लिए अहसास हैं और मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं। शादी के बाद मैं उनके साथ पंजाब के बठिंडा चली गई। जहां मैं घर से वकालत का काम करती थी। हम तब करीब ढाई साल साथ रहे और वाकई वो दिन खास थे। एक प्रोफेशनल होने के नाते में जानती थी कि हर दो साल पर मैं उनके साथ यहां से वहां नहीं जा सकती थी। कई जगहें जहां उनकी पोस्टिंग हुई, वो ऐसी थीं कि मैं वहां केवल पढ़ाने का काम कर सकती थी। नेहा ने लिखा, ''मैं टीचर तो नहीं हूं, वकील हूं। इसलिए, हम दोनों ने फैसला लिया कि मैं बॉम्बे चली जाऊंगी ताकि अपना करियर आगे बढ़ा सकूं और वो अपनी पोस्टिंग के हिसाब से अपना काम जारी रखेंगे।''

नेहा लिखती हैं कि हम कई बार चार-चार महीने बाद मिलते थे, लेकिन वो 15 दिन उनके साथ बिताना हम दोनों के लिए जैसे सबकुछ होता था। अब हमारी तीन साल की बेटी है। मुझे लगता है कि आर्मी के किसी जवान की नजर में उसके देश के लिए जो जज्बा होता है, उसे बताने के लिए कोई शब्द नहीं है। यहां हम बोनस और छुट्टियों की शिकायत करते रहते हैं, लेकिन सेना में प्रमोशन से पहले कई बार आप उसी रैंक पर, उसी सैलरी पर दशकों तक रहते हैं।

नेहा लिखती हैं कि फिलहाल उनके पति एविएशन में हैं। कई दिन ऐसे होते हैं जब मैं अचानक बेचैनी में जगती हूं और उनसे कहती हूं कि तुम आज उड़ान मत भरो। कई दिन ऐसे होते हैं जब मुझे उनकी बहुत कमी महसूस होती है। नेहा ने लिखा, ''वे अच्छे पिता हैं दूर होते हुए भी फोन पर अपनी बेटी से पूछते रहते हैं कि आज उसने स्कूल में क्या सीखा।'' हमारी आदत है कि हम अपने जवानों को खो देने के बाद उन्हें याद करते हैं, उन्हें शुक्रिया कहते हैं, लेकिन हमें तो उन्हें रोज थैंक्स कहना चाहिए।

नेहा ने लिखा है कि मेरे पति अपने बैच के कई साथियों को लड़ाई या फिर किसी तकनीकी गड़बड़ी की वजह से खो चुके हैं। कई दिन ऐसे भी होते हैं जब हम दोनों के बीच कोई बात नहीं हो पाती। कई बार वे ऐसी जगहों पर होते है, जहां नेटवर्क काम नहीं करता। फिर कुछ दिनों के बाद फोन करके बताते हैं कि वे ठीक हैं। ये सब हमारे लिए झेलना कितना मुश्किल होता है। नेहा बताती हैं कि मुझे याद नहीं आता कि किसी एक दिन भी उन्होंने कोई शिकायत की हो। वे हर दिन अपने चेहरे पर उसी मुस्कुराहट को लिए जगते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि वो अपने देश की सेवा कर रहे हैं।

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