बर्फबारी ने लौटा दी कश्मीर की रौनक 

बर्फबारी ने लौटा दी कश्मीर की रौनक बर्फबारी ने पहाड़ों के जलाशयों को लबालब भर दिया।

श्रीनगर (आईएएनएस)। हर तरफ बर्फ, नुकीली बर्फीली चट्टानें, नीचे उड़ते हंस और ठंड को दूर करने के लिए एक साथ बैठे परिवार, कश्मीर में इस बार वह सभी कुछ है जो यहां शरद ऋतु को शानदार बनाता है।

भारी बर्फबारी ने पहाड़ों के जलाशयों को लबालब भर दिया है। यहां तक कि मैदानी इलाके भी इस बार औसत दर्जे की बर्फबारी के गवाह बने हैं। किसानों और सेब उत्पादकों ने राहत की सांस ली है। शुष्क मौसम अब उनके भविष्य को चुनौती नहीं दे रहा है। झील-तालाब, नदी-नाले, झरने सभी शान से बह रहे हैं। पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के एक वरिष्ठ इंजीनियर ने कहा, “बर्फबारी से पहले झेलम नदी इतने कम पानी के साथ बह रही थी, जितना बीते 40 साल में देखने को नहीं मिला था। जलापूर्ति के अन्य स्रोत भी लगभग सूख चुके थे। ग्रामीण इलाकों में पानी का संकट विशेष रूप से था। ऊपर वाले का शुक्र है, अब हालात बदल गए हैं।” बर्फबारी अपने साथ कुछ दिक्कतें लेकर आती है।

रास्ते बंद हो जाते हैं, बिजली गुल हो जाती है, स्वास्थ्य संबंधी, खासकर त्वचा संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। लेकिन, जो लोग घाटी के जीवन को जानते हैं, उन्हें पता है कि यह कुछ समय की दिक्कतें हैं। उत्तरी कश्मीर के रहने वाले हाजी सिदिक (78 वर्ष) कहते हैं, “बिना बर्फ के कैसा कश्मीर? यह तो वैसे ही हुआ कि बागीचे में बिना फूल के रहो। मुझे आज भी अपने बचपन का जाड़ा याद है। चिल्लई कलां (21 दिसम्बर से शुरू होने वाली बेहद ठंडी 40 दिन की अवधि) में हमारा गाँव सभी कुछ से कट जाता था।” उन्होंने कहा, “उन दिनों कोई भी ठंड या भूख से नहीं मरता था, हालांकि तब आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। गाँव के घर में एक गाय, कुछ भेड़, कुछ मुर्गियां, अनाज, दालें और सूखी सब्जियां हुआ करती थीं। कश्मीर हर तरह से आत्मनिर्भर हुआ करता था। बाहर से कुछ नहीं आता था। न दूध, न मटन, न चिकन। कम था, लेकिन जीवन के लिए जरूरी भर का होता था।” जिंदगी कदमों पर भले ठिठक जाती थी, लेकिन रुकती नहीं थी।

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