नोटबंदी ने बढ़ाया मरीजों का दर्द, देशभर में प्रभावित हुईं स्वास्थ्य सेवाएं

नोटबंदी ने बढ़ाया मरीजों का दर्द, देशभर में प्रभावित हुईं स्वास्थ्य सेवाएंनोटबंदी से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं, लोग अस्पताल से लेकर मेडिकल स्टोर तक भटकते रहे।

देवानिक साहा/स्वागत यादावार

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आठ नवंबर को 500 और 1000 रुपये के नोट बंद करने के ऐलान से ही भारतीय मुद्रा की 86 प्रतिशत राशि अवैध बनकर रह गई, जिससे अन्य क्षेत्रों के साथ स्वास्थ्य सेवाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। नोटबंदी के बाद शुरू अफरा-तफरी के माहौल में अस्पतालों द्वारा नोटों को अवैध करार कर अस्वीकार करने के कारण कई रोगियों ने अपनी जान गंवाई है।

इलाज से पहले एडवांस मांग रहे अस्पताल

आकड़ों पर गौर करें तो राजधानी से सटे नोएडा में एक अस्पताल द्वारा इलाज के लिए 10,000 रुपये अग्रिम जमा कराने का हुक्म दिया गया और जब अस्पताल को पुराने नोट की पेशकश की गई, तो उसने पुराने नोट लेने से इंकार कर दिया। अस्पताल द्वारा इस तरह के व्यवहार ने एक शिशु की जिंदगी छीन ली।

पुराने नोट देने पर मेडिकल स्टोर पर दवा नहीं मिल रही। साभार : इंडियन एक्सप्रेस

यूपी के ही मैनपुरी में भी ऐसी ही घटना देखने को मिली, जब निजी अस्पताल के चिकित्सक द्वारा एक बच्चे का इलाज करने से इंकार करने पर उसकी मौत हो गई, क्योंकि उसके माता-पिता के पास बच्चे के इलाज के लिए पर्याप्त धन नहीं था। विशाखापट्टम में भी एक माता-पिता के पास दवाओं के लिए पैसे न होने की मजबूरी ने एक बच्चे की जिंदगी ले ली।

ऐसी कई घटनाओं और अनगिनत अनुरोधों के बावजूद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 17 नवंबर को मुद्रा के दुरुपयोग का हवाला देते हुए फरमान जारी कर दिया कि निजी अस्पतालों में पुराने नोटों को स्वीकार नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इससे पुरानी मुद्रा के दुरुपयोग को बढ़ावा मिलेगा।

इस मजबूरी को बताते हुए वित्तमंत्री ने हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया कि सरकारी या निजी अस्पतालों में कोई भी काला धन रखने वाला व्यक्ति कितना और किस हद तक मुद्रा को खपा सकता है, कोई भी शख्स निजी अस्पताल में भी बगैर बीमारी के जाकर जबरन भर्ती नहीं हो जाएगा। खैर जो भी हो, यकीनन इस घोषणा से अस्पतालों की निष्ठुरता के लिए आवाज उठाने वालों की उम्मीदें जमीन पर धराशयी हो गईं।

चाय पीने तक के पैसे नहीं बचे

अर्थव्यवस्था और शिक्षा जैसे मुद्दों पर सरकार की नीति का विश्लेषण करने वाली वेबसाइट 'इंडियास्पेंड' ने मुंबई में स्थित कैंसर रोग के लिए देश के जाने माने टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के बाहर फुटपाथ पर रहने को मजबूर झारखंड के 52 वर्षीय महावीर मल्हार और उसकी पत्नी झरिया से बात की।

200 रुपये प्रति दिन कमाने वाले मल्हार ने बताया कि उसकी पत्नी के कान में कैंसर है और वह उसके इलाज के लिए यहां आया था, लेकिन उसके पास चलन के योग्य नगदी नहीं है।

मल्हार ने कहा, "हमारे पास भोजन खरीदने और यहां तक कि चाय पीने तक के पैसे नहीं हैं। हालांकि टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में इलाज निशुल्क है और वहां पुराने नोट भी स्वीकार किए जा रहे हैं। लेकिन उन दोनों के लिए मुंबई में गुजारा करना मुश्किल है और नोटबंदी के बाद उनके बेटे, जो खुद मजदूरी करते हैं, बैंक में लगी लंबी कतारों के कारण पैसे नहीं भेज पा रहे हैं। वह अब केवल अस्पताल और धर्मार्थ संस्थाओं के निशुल्क भोजन पर ही निर्भर हैं।"

नर्सिंग होम पर निर्भर हैं ज्यादातर परिवार

एनएसएसओ के 2014 के सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत की आधी आबादी से अधिक निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर करती है। इसके बावजूद भारत की आबादी के 20 प्रतिशत लोगों का निजी अस्पताल का खर्च उनकी मासिक कमाई से 15 गुना अधिक होता है।

प्रतीकात्मक फोटो

निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर भारत की निर्भरता के अन्य मानकों पर गौर करें तो, करीब 86 प्रतिशत ग्रामीण आबादी (71.7 लाख लोग) और 82 प्रतिशत शहरी आबादी (30.9 करोड़ लोग) स्वास्थ्य व्यय के समर्थन के बिना रह रही है।

देश के जाने-माने अखबार 'द हिंदू' द्वारा कराए गए नेशनल हेल्थ अकाउंट्स (एनएचए) के विश्लेषण के अनुसार, भारत में सरकारी अस्पताल के मुकाबले एक निजी अस्पताल में आठ गुना अधिक खर्च किया जाता है। रपट का अनुमान है कि देश के लोग सरकारी अस्पतालों में 8,193 करोड़ रुपये तक खर्च करते हैं, जो कि निजी अस्पतालों में खर्च होने वाले 62,628 करोड़ रुपये का आठवां हिस्सा है।

इसलिए निजी अस्पतालों में पुराने नोटों की अस्वीकृति के सरकार के इस फैसले से भारतीयों के एक बड़े वर्ग के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बाधित हो गई है।

नोटबंदी के बाद महाराष्ट्र सरकार की टोल फ्री हेल्पलाइन 108 पर भी असंख्य लोगों द्वारा निजी अस्पतालों द्वारा चेक अस्वीकार करने के खिलाफ शिकायतें दर्ज हुईं।

देश में चिकित्सकों की संख्या 9,30,000 है, जिसमें केवल 1,6000 चिकित्सक ही सरकार के लिए काम करते हैं। इसका मतलब है कि प्रति 11,528 लोगों पर केवल एक चिकित्सक मौजूद है।
रिपोर्ट: नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2015

प्राइवेट डॉक्टरों के यहां घटे मरीज

साभार : गूगल

शहर के निजी चिकित्सकों का कहना है कि नकदी की कमी ने रोगियों के लिए उनकी जरूरत को प्राथमिकता बना दिया और अपनी स्वास्थ्य समस्याओं को दरकिनार कर परिवार की प्राथमिकता सूची में उन्हें पीछे धकेल दिया है।

मुंबई के आस्था हेल्थकेयर में बेरिएट्रिक सर्जन मनीष मोटवानी कहते हैं, "हमारे ओपीडी विभाग में आने वाले मरीजों की संख्या में 25-30 फीसदी की कमी आई है। गैर-आपातकालीन मामलों में भी गिरावट दर्ज की गई है।"

निजी अस्पतालों में पुराने नोट न चलने के कारण मजबूरी में लोग सरकारी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। ऐसे सभी सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है, जहां उपचार काफी हद तक मुक्त या नाममात्र के शुल्क पर होता है।

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ चिकित्सा पेशेवरों के 81 प्रतिशत स्वीकृत पद खाली पड़े हैं।
2015 के ग्रामीण सांख्यिकी रपट के अनुसार

मुंबई में एक छोटे से कस्बे पल्लम के स्वास्थ्य अधिकारी अमोल भूसरे ने बताया, "नोटबंदी के फैसले के बाद से हमने हमारे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रोगियों की संख्या में वृद्धि दर्ज की है। हमारे दो रोगी पास के नांदेड़ शहर में सीटी स्कैन के लिए एक निजी डायग्नोस्टिक सेंटर पर चले गए थे, वे उसके बाद पुराने नोटों को यहां ले आए।"

अखिलेश यादव ने किया था पुराने नोट चलने देने का आग्रह

अखिलेश यादव, मुख्यमंत्री। फाइल फोटो

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली से निवेदन कर 30 नवंबर तक निजी अस्पतालों और दवाइयों की दुकानों में पुराने नोट को स्वीकृति देने का भी निवेदन किया है।

उन्होंने अपने अनुग्रह में कहा था, "जल्दबाजी में 500 और 1000 रुपये पर लगाए गए प्रतिबंधित से अस्पतालों और नसिर्ंग होम में उपचार से गुजर रहे लोगों को भारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए मैं आपसे निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम और दवा की दुकानों पर कम से कम 30 नवंबर तक इन नोटों को स्वीकार करने के लिए अपना हस्तक्षेप करने और अनुमति देने का अनुरोध कर रहा हूं।"

अखिलेश के इस अनुरोध पर हालांकि सरकार द्वारा अभी कोई खास विचार नहीं किया गया है। लेकिन इसी बीच देश के कुछ इक्का-दुक्का अस्पतालों ने गरीबों के लिए अपने दिल खोलने का जज्बा जरूर दिखाया है। इन अस्पतालों ने पुराने नोट स्वीकार करने की अनुमति मांगी है।

मोदी को लिख पत्र

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

मुंबई के भाटिया हॉस्पिटल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव बौधानकर ने बताया कि उन्होंने नोटबंदी की घोषणा के एक दिन बाद ही नरेंद्र मोदी को लिखा था, "हम मुंबई के सबसे पुराने धर्मार्थ अस्पतालों में से एक हैं, इसलिए हम अनुरोध करते हैं कि कम से कम धर्मार्थ अस्पतालों में पुराने नोटों को स्वीकार करने की अनुमति दी जानी चाहिए। नोटों की परेशानी के कारण हमने किसी रोगी को वापस नहीं भेजा है। चेक या अन्य माध्यमों से हम भुगतान स्वीकार कर रहे हैं।"

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