फसल अवशेष को जलाएं नहीं, उससे बनाएं जैविक खाद

फसल अवशेष को जलाएं नहीं, उससे बनाएं जैविक खादफसलों का अवशेष जलाकर हर साल किसान कर रहे अपना भारी नुकसान।

दिवेन्द्र सिंह (स्वयं डेस्क)

हरगाँव (सीतापुर)। इस समय देश के ज्यादातर प्रदेशों में धुंध छायी हुई है। मौसम वैज्ञानिक इसका कारण खेतों में बचे अवशेषों को जलाना मान रहे हैं। ज्यादातर किसानों ने धान की फसल काट ली है, फसल काटने के बाद किसान फसल अवशेष का सही प्रबंधन करने के बजाए उसे जला देते हैं जबकि फसल अवशेषों से खाद बनाकर अपने खेत की उर्वरता बढ़ा सकते हैं।

पर्यावरण पर भी पड़ता है बुरा असर

सीतापुर जिला मुख्यालय से लगभग 30 किमी. दूर उत्तर दिशा में हरगाँव, गाँव के किसान राधेश्याम वर्मा (45 वर्ष) ने पंद्रह बीघा धान की फ़सल काट ली है और धान कटने के बाद बचे अवशेष को खेत में ही जला भी दिया। इस बारे में राधेश्याम बताते हैं, "धान काटने के बाद आलू और गेहूं जैसी दूसरी फसलें लगानी होती हैं, इसलिए जल्दी की वजह से हम पराली को जला देते हैं। हम लोगों की तरफ ज्यादातर किसान अब यही करते हैं।" आजकल अधिकतर किसान हार्वेस्टर से फसल की कटाई करते हैं, जिससे उन क्षेत्रों में फसल के तने का अधिकर भाग खेत में ही रह जाता है। खरीफ़ की फसलों के कटने के बाद किसान उसे जला देते हैं, जिससे न तो फसल अवशेष काम का रह जाता है, खेत की मिट्टी की उर्वरता भी कम हो जाती है। साथ ही पर्यावरण पर भी गलत असर पड़ता है।

ऐसे बढ़ सकती खेत की उपजाऊ क्षमता

केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, लखनऊ के निदेशक विनय कुमार मिश्रा कहते हैं, " मक्का, गेहूं, धान आदि फसलों का खेत में काफी अवशेष बच जाता है। ऐसे में किसानों को फसल अवशेष को नहीं जलाना चाहिए। जलाने से मृदा में मौजूद कार्बन और जीवाणुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इससे मृदा के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। फसल अवशेष को खेत में ही जुताई करके मिट्टी में मिला देना चाहिए। आजकल जब गोबर की खाद नहीं मिलती है तो ऐसे में किसान फसल अवशेष का समुचित प्रबंधन कर खेत की उर्वरता बढ़ा सकते हैं। धान के साथ ही दूसरे फसल अवशेष से भी खेत की उर्वरता बढ़ायी जाती है।"

ऐसे करें प्रबंधन

फसल अवशेषों का उचित प्रबन्ध करने के लिये आवश्यक है कि अवशेष (गन्ने की पत्तियों, धान की पराली) को खेत में जलाने के बजाय उनसे कम्पोस्ट तैयार कर खेत में प्रयोग करना चाहिए। उन क्षेत्रों में जहां चारे की कमी नहीं होती वहां धान की पुआल को खेत में ढेर बनाकर खुला छोडऩे के बजाय गड्ढ़ों में कम्पोस्ट बनाकर उपयोग कर सकते हैं। मूंग व उड़द की फसल में फलियां तोड़कर खेत में मिला देना चाहिये। इसी तरह केले की फसल के बचे अवशेषों से यदि कम्पोस्ट तैयार कर ली जाय तो उससे 1.87 प्रतिशत नाइट्रोजन 3.43 प्रतिशत फास्फोस तथा 0.45 प्रतिशत पोटाश मिलता है।

खेत में अवशेष प्रबंधन

फसल की कटाई के बाद खेत में बचे अवशेष घासफूस, पत्तियां व ठूंठ आदि को सड़ाने के लिये किसान फसल को काटने के बाद 20-25 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हैक्टयर की दर से छिड़क कर कल्टीवेटर या रोटावेटर से मिट्टी में मिला देना चाहिये इस प्रकार अवशेष खेत में ही सडऩा शुरू हो जाएंगे। लगभग एक महीने में सड़कर आगे बोई जाने वाली फसल को पोषक तत्व प्रदान कर देंगे क्योंकि कटाई के बाद दी गई नाइट्रोजन अवशेषों में सडऩ की क्रिया को तेज कर देती है। अगर फसल अवशेष खेत में ही पड़े रहे तो फसल बोने पर जब नयी फ़सल के पौधे छोटे रहते हैं तो वे पीले पड़ जाते हैं क्योंकि उस समय अवशेषों के सड़ने से जीवाणु भूमि की नाइट्रोजन का उपयोग कर लेते है और प्रारम्भ में फसल पीली पड़ जाती है इसलिए फसल अवशेषों का प्रबंध करना जरुरी है।

This article has been made possible because of financial support from Independent and Public-Spirited Media Foundation (www.ipsmf.org).

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