गाँवों की अपेक्षा शहरों में बढ़ी कन्या भ्रूण हत्या

गाँवों की अपेक्षा शहरों में बढ़ी कन्या भ्रूण हत्याराष्ट्रीय स्तर पर 3.9 फीसदी बेटियां होती हैं मौत की शिकार 

लखनऊ। चार महीने का गर्भ, दो बेटियां पहले से, ऐसे में उसको अब एक और बेटी नहीं चाहिए थी। इसलिए गाँव के ठेकेदार से दवा लाकर खाली और गर्भ में ही बेटी को मार डाला। जिससे उसकी स्थिति नाजुक हो गई। बीते शुक्रवार को उसके पति झलकारी बाई हजरतगंज अस्पताल इलाज के लिए लेकर आए। चार महीने की बेटी को गर्भ में मारने के कारण उसकी जान के लेने के देने पड़ गए थे।

24 घण्टे के रक्त स्त्राव के कारण उसकी हालत एकदम मरने की कगार पर पहुँच चुकी थी। यह कहानी सिर्फ गेंदा देवी की ही नही है। हर साल यूपी में हज़ारों की संख्या में बेटियां गर्भ में मार दी जाती हैं। सरकार भले ही 'बेटी बचाव बेटी पढ़ाओ' के नारे बुलंद कर रही हो, लेकिन बेटियों का कम होता आंकड़ा इसकी जमीनी हकीकत को बयां कर रहा है। ताजा आंकड़ों के मुकाबले, इस साल लड़कियों का ग्राफ और नीचे चला गया है। प्रदेश में ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में बेटियों को अधिक मारा जा रहा है।

बेटियों की मौतों का बढ़ता ग्राफ चिंता का विषय है। इसके लिए अब अस्पतालों की बाल स्वास्थ्य रक्षा इकाइयों की समीक्षा हर माह करनी शुरू की गई है। उत्तर प्रदेश कई अन्य राज्यों की तुलना में श्रेष्ठ साबित हुआ है। यह स्थिति संतोषजनक है, पर इसमें सुधार के लिए प्रयास लगातार चल रहे हैं।
आलोक कुमार, निदेशक, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन।

हाल में जारी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों को आधार बनाते हुए सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) ने बाल मृत्यु दर पर देशभर की रिपोर्ट जारी की थी। इस रिर्पोट के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर 3.9 फीसदी बेटियां मौत की शिकार होती हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा 4.8 फीसदी है। रिर्पोट के अनुसार, दस साल में राष्ट्रीय स्तर पर बाल मृत्यु दर में 33.2 प्रतिशत की कमी आयी है। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यह कमी 33.8 प्रतिशत है। इनमें भी शहरी क्षेत्रों के 31.3 प्रतिशत की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में बाल मृत्यु दर 32.5 प्रतिशत कम हुई है।

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