हर 20 साल में अप्रैल की तरह 30 गुना बढ़ सकती है प्रचंड गर्मी

ये आशंका वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन ग्रुप के तहत प्रमुख जलवायु वैज्ञानिको की अंतरराष्ट्रीय टीम ने जताई है। 22 शोधकर्ताओं की इस टीम में भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, केन्या और नीदरलैंड के विश्वविद्यालयों और मौसम संबंधी एजेंसियों के वैज्ञानिक शामिल थे।

  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • koo
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • koo
  • Whatsapp
  • Telegram
  • Linkedin
  • koo
हर 20 साल में अप्रैल की तरह 30 गुना बढ़ सकती है प्रचंड गर्मी

वैज्ञानिकों की एक ताज़ा रिपोर्ट साफ़ चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन की ज़्यादा अनदेखी की गई तो नतीज़े और बुरे हो सकते हैं। इंसान की गतिविधियों की वजह से पैदा हुए जलवायु परिवर्तन ने भारत, बांग्लादेश, लाओस और थाईलैंड में रिकॉर्ड तोड़ उमस भरी ताप लहर (हीटवेव) की आशंकाओं को 30 गुना तक बढ़ा दिया है। दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन ने हीटवेव को ज़्यादा सामान्य, लम्बा और बेहद गर्म बना दिया है। एशियाई हीटवेव पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को मापने की ख़ातिर वैज्ञानिकों ने 19वीं शताब्दी की शुरुआत से अब तक हुई 1.2 डिग्री सेल्सियस ग्लोबल वार्मिंग को ध्यान में रखते हुए आज के मौसम की तुलना पुराने मौसम से की है।

बांग्लादेश और भारत में हाल ही में उत्पन्न हुई नमी भरी हीटवेव की घटनाएँ एक सदी में औसतन एक से कम ही बार होती रही हैं लेकिन अब हर पांच साल में एक बार ऐसी स्थिति उत्पन्न होने की आशंका पैदा हो चुकी है, और अगर वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी का स्तर दो डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा हुआ तो नमी भरी हीटवेव हर दो साल में कम से कम एक बार उत्पन्न होगी। जहाँ तक ग्लोबल वार्मिंग में दो डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की बात है तो अगर बढ़ते प्रदूषण को रोका नहीं गया तो वैश्विक तापमान में वृद्धि का स्तर 30 साल के अंदर 2 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाएगा।


वैज्ञानिकों ने पाया कि लाओस और थाईलैंड में हाल की रिकॉर्ड तोड़ नम हीटवेव की घटना जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बिना होना नामुमकिन था। यह अब भी बहुत दुर्लभ घटना है और इंसान की गतिविधियों के कारण उत्पन्न जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बावजूद 200 साल में कहीं एक बार ऐसा होने की अपेक्षा की जाती रही है लेकिन अगर वैश्विक तापमान में वृद्धि 2 डिग्री सेल्सियस के स्तर तक पहुँची तो ऐसी घटना हर 20 साल में एक बार होना आम बात हो जाएगी।

वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन ग्रुप के तहत प्रमुख जलवायु वैज्ञानिको की अंतरराष्ट्रीय टीम द्वारा किए गए रैपिड एट्रिब्यूशन एनालिसिस के अनुसार, दुनियाभर के हीटवेव हॉटस्पॉट्स में शुमार होने वाले इस क्षेत्र की हाई वल्नरेबिलिटी ने मौसम के असर को बढ़ा दिया। अप्रैल के दौरान, दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों ने ज़्यादा गर्मी का सामना किया, लाओस में 42 डिग्री सेल्सियस और थाईलैंड में 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान तक पहुंच गया।

कैसे हुआ अध्ययन

इस अध्ययन में दो क्षेत्रों में अप्रैल महीने के दौरान लगातार के चार दिनों में हीट इंडेक्स के अधिकतम तापमान और अधिकतम मूल्य के औसत का विश्लेषण किया गया। इन क्षेत्रों में से एक दक्षिणी तथा पूर्वी भारत और बांग्लादेश का है और दूसरा थाईलैंड और लाओस के संपूर्ण क्षेत्र का है। हीट इंडेक्स एक ऐसा पैमाना है जिसमें तापमान और नमी को एक साथ जोड़ा जाता है और इसके जरिए मानव शरीर पर हीटवेव के पड़ने वाले प्रभावों को और सटीक ढंग से जाना जाता है।


कई देशों में 17-20 अप्रैल, 2023 के दौरान हर दिन का अधिकतम तापमान।

शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों ही क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की वजह से नमी भरी हीटवेव की आशंका कम से कम 30 गुना ज्यादा हो गई है और जलवायु परिवर्तन नहीं होने की स्थिति के मुकाबले तापमान में कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई है। जब तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को पूरी तरह नहीं रोका जाएगा तब तक वैश्विक तापमान में वृद्धि जारी रहेगी और हीटवेव जैसी मौसमी घटनाएं और अधिक तीव्र हो जाएंगी। साथ ही वे जल्दी-जल्दी घटित होंगी।

जलवायु में बदलाव क्या है

जलवायु लंबे समय में या कुछ सालों में किसी स्थान का औसत मौसम है। जलवायु परिवर्तन उन्हीं औसत परिस्थितियों में बदलाव है। जितनी तेज़ी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है उसके लिए इंसान खुद ज़िम्मेदार है। घरेलू कामों, कारखानों और ईंधन के लिए हम जो तेल, गैस और कोयले का इस्तेमाल करते हैं उससे जलवायु पर बुरा प्रभाव पड़ा है। वैज्ञानिकों की माने तो अगर जलवायु परिवर्तन के बुरे नतीजों से बचना है तो हमें अपने बेलगाम कल कारखानों या मोटर गाड़ियों से फैलने वाले प्रदूषण को कम करना होगा। जिससे तापमान वृद्धि को काबू में किया जा सके।

विशेषज्ञों की राय

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, तिरुपति के चंद्रशेखर बहिनीपति ने कहा, "हालांकि हमने खासकर भारत, बांग्लादेश और थाईलैंड जैसे देशों में ताप लहरों को सबसे घातक आपदाओं में से एक के तौर पर पहचाना है, मगर इस बात को लेकर जानकारी की कमी है कि कौन समुदाय जोखिमशील है। इसके अलावा हानि और क्षति का आकलन, घरेलू स्तर पर निपटने के तंत्र और सबसे प्रभावशाली हीट एक्शन प्लान के बारे में भी जानकारी की कमी है। सिर्फ जनहानि को छोड़कर अन्य आर्थिक, गैर आर्थिक नुकसान तथा क्षति के संकेतकों का दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है। इससे जोखिम की सीमा का आकलन करने, कौन जोखिम से घिरा है और किसी अनुकूल योजना को किस तरह से संचालित किया जाए, इसका आकलन करने में भी परेशानी पैदा होती है।

वैज्ञानिकों की इस रिपोर्ट से जुड़ीं मरियम जकारिया ने कहा कि इस अध्ययन के लिए हीट इंडेक्स को एक वेरिएबल के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। यह इस तथ्य के मद्देनज़र किया गया की नमी और तापमान का मानव स्वास्थ्य पर असर पड़ता है। अनुमानों के आधार पर हमने पाया कि इसकी इंडेक्स वैल्यू दोनों ही क्षेत्रों में 41 डिग्री सेल्सियस से ज़्यादा है जो खतरनाक की श्रेणी में आता है।

heat waves #GlobalWarming #ClimateChange #story 

Next Story

More Stories


© 2019 All rights reserved.