एक से ज्यादा बीवियां रखने में मुस्लिमों के मुक़ाबले हिंदू रहे हैं आगे

एक से ज्यादा बीवियां रखने में मुस्लिमों के मुक़ाबले हिंदू रहे हैं आगेकई तथ्य बयां करते हैं यह सच्चाई। (साभार: गूगल इमेज)

लखनऊ। तीन तलाक़ के मसले पर देशभर में चर्चाओं का दौर जारी है। यूनीफॉर्म सिविल कोड को लेकर भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपनी खिलाफत जाहिर कर चुका है। मगर इस तथ्य में काफी कुछ ऐसा जिस पर चर्चा होनी बहुत जरूरी है। देश में एक से ज्यादा पत्नी रखने के मामले में हिंदुओं ने मुस्लिमों को पछाड़ रखा है। ये बात तमाम आंकड़े बयां कर रहे हैं।

वर्ष 1960 की जनसंख्या गणना में हुआ खुलासा

वर्ष 1960 में की गई जनसंख्या गणना के मुताबिक़ भारतीयों मुस्लिमों की तुलना में हिंदुओं ने एक से ज्यादा पत्नी रखने की प्रथा को बढ़ावा दिया है। उस वक्त के दर्ज आंकड़े बयां करते हैं कि एक से ज्यादा बीवियां रखने के मामले में आदिवासी 15.25, बौद्ध 7.9, हिंदू 5.8 और भारतीय मुस्लिम 5.78 फीसदी थे। इन आंकड़ों पर गौर करने पर साफ विदित होता है कि भारतीय मुस्लिमों में चार शादियां जायज होने के बाद भी वे एकल पत्नी की प्रथा का पालन करने में आगे रहे हैं। वहीं, यदि आदिवासियों के आंकड़ों को हिंदुओं की प्रतिशतता से जोड़ दिया जाए तो वह 21.05 फीसदी का आंकड़ा छू लेता है। यानी एक से ज्यादा पत्नी रखने के मामले में हिंदुओं ने मुस्लिमों को काफी पीछे छोड़ रखा है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में भी किया खुलासा

हालांकि, उसके बाद से अब तक के आंकड़ों का कोई आधिकारिक सर्वे नहीं मिल रहा है। यह अलग बात है कि आज के परिदृश्य में मुस्लिम समुदायों ने तीन तलाक़ के मसले पर हर जिद पकड़ रखी है। वे किसी भी सूरत में महिलाओं को उनका वाजिब हक देने को तैयार नहीं हैं। यही नहीं बहुपत्नी प्रथा के संदर्भ में वर्ष 2005-06 में किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) दर्ज किया गया है कि देश के जयादातर ग्रामीण क्षेत्रों में मर्दों ने एक से ज्यादा पत्नियां रख रखी हैं। इनमें उन परिवारों की संख्या ज्यादा थी जहां पहली पत्नी से बच्चा नसीब नहीं हो सका था। इसके अतिरिक्त वर्ष 2011 में की गई जनगणना के मुताबिक़, देश शादीशुदा पुरुषों की संख्या 28.7 करोड़ है जबकि शादीशुदा महिलाओं की संख्या 29.3 करोड़ है। ये आंकड़े भी देश में एक से ज्यादा पत्नी रखने के मामलों पर प्रकाश डालने के लिए काफी हैं। वहीं, वर्ष 2006 में एनएफएचएस की ओर से बहुपत्नी प्रथा के मामले में भी हिंदुओं की संख्या 1.7, मुस्लिम 2.5 और क्रिश्चियन समुदाय के 2.1 फीसदी लोगों ने एक से ज्यादा औरतों से शादी कर रखी थी।

पाकिस्तान सत्तर साल पहले ही इस नियम को कर चुका है खारिज

इधर भारत में भले ही इस विषय पर सभी मुस्लिम संगठन एक सुर में यूनीफॉर्म सिविल कोड की खिलाफत करते हुए तीन तलाक़ के बेतुके नियम को बरकरार रखने पर एकजुट हो गए हैं। मगर दुनिया की कई मुस्लिम देशों में इस तीन तलाक़ के नियम को खत्म कर दिया गया है। मुस्लिमों का पैरोकार होने का दावा करने वाले पाकिस्तान ने ही इस नियम को वर्ष 1956 में प्रतिबंधित कर दिया था। इसके अलावा आज करीब 22 मुस्लिम देशों में तीन तलाक़ का नियम खारिज कर दिया गया है। वहीं, बांग्लादेश में भी इस कानून को खत्म कर दिया गया है। इनके अलावा तुर्की, सउदी अरब, ट्यूनिशिया, अलजीरिया, मलेशिया सहित इराक में शिया कानून के तहत तीन तलाक़ के नियम को खारिज किया जा चुका है। इन देशों में तलाक़ के मसले को संवैधानिक तरीके से अदालत में सम्पन्न किया जाना तय किया गया है।

पाकिस्तान में क्यों प्रतिबंधित हुआ तीन तलाक़ का क़ानून

दरअसल, वर्ष 1955 में तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री मुहम्मद अली बोगरा ने पहली पत्नी के रहते हुए अपनी सचिव से दूसरा निक़ाह कर लिया था। जो कि उस समय विवाद का विषय बन गया था। इसके बाद ऑल पाकिस्तान विमेन एसोसिएशन ने इसके खिलाफ आवाज़ बुलंद करते हुए देशभर में धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया था। इसी विषय को आधार बनाते हुए वर्ष 1956 में पाकिस्तान में पति द्वारा पत्नी को तीन बार लगातार तलाक़ बोलने को एक बार की गणना के बराबर का दर्जा दे दिया गया था। साथ ही, तलाक़ के मसले पर यह अनिवार्य कर दिया गया कि पति को पहले पत्नी को कानूनी सूचना देने के बाद ही तलाक़ दिया जा सकेगा। यानी पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान में सत्तर साल पहले ही लगातार तीन बार तलाक़ देने को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था।

हिंदू धार्मिक ग्रंथों में एक से ज्यादा पत्नी के कई मामले

हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथों में एक से ज्यादा पत्नी रखने के कई मामले पाए जाते हैं। इसमें भगवान श्रीराम के पिता राजा दशरथ की तीन पत्नियों का भी जिक्र है। इसके अलावा महाभारत में भी पांडवों द्वारा एक स्त्री द्रौपदी से पांच भाइयों के विवाह का बखान किया गया है। साथ ही, कई धार्मिक ग्रंथों में देवताओं द्वारा एक से ज्यादा पत्नी रखने का भी उल्लेख किया गया है। इस बीच प्रभू श्रीराम द्वारा एकल पत्नी का व्रत रखने का भी उल्लेख रामायण और रामचरितमानस में किया गया है। साथ ही, हिंदू धर्म में एक से अधिक कितनी पत्नियां रखना जायज़ है, इसका भी कोई जिक्र नहीं किया गया है। हालांकि, संविधान में वर्ष 1954 में हिंदू विवाह अधिनियम को लागू करते हुए हिंदू धर्म में एक से अधिक पत्नी रखने को कानूनन अवैध करार कर दिया गया था।

...तो इस्लाम में चार निक़ाह की छूट का गलत तरीके से कर रहे पालन

वहीं, इस्लामिक ग्रंथ कुरआन में साफ बयां किया गया है कि पुरुष अपनी इच्छा से एक से अधिक दो, तीन या चार महिलाओं से विवाह कर सकता है मगर शर्त यह है कि वह किसी के भी साथ अन्याय नहीं होने देगा। ऐसे में मुस्लिम समुदाय ने इस बात को याद रखा कि वे चार निक़ाह जायज तरीकों से कर सकते हैं मगर वे कुरआन में दिए गए सभी बीवियों के साथ न्याय की बात को भूल बैठे। जाहिर है एक आदमी चार बीवियों को समान संतुष्टि नहीं दे सकता है। इससे इतर इस्लाम में यह भी बयां किया गया है कि यहूदी धर्म के मुताबिक़, अब्राहिम की दो बीवियां थीं जबकि सोलोमन की सौ बीवियां थीं। साथ ही, तमाम अनुसंधान बताते हैं कि 960 से 1030 ईसा पूर्व के मध्य ऐसे कई अध्यादेश जारी किए गए हैं, जिसमें एक से अधिक पत्नी रखने की बात को ग़लत करार दिया गया है। हालांकि, वर्ष 1950 में इजरायल के मुख्य रबी ने एक से ज्यादा निक़ाह करने पर रोक लगा दी। धीरे-धीरे कई मुस्लिम देशों में फिर ये रोक लगती चली गई। मगर भारत में इसे लेकर किसी भी राजनीतिक संगठन ने कभी हिम्मत नहीं जुटाई। नतीजतन, इस आज भी भारत में तीन तलाक़ सहित एक से अधिक बीवियां रखने का मसला ज्वलंत बना हुआ है।

इन सबके बावजूद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ने यूनीफॉर्म सिविल कोड व तीन मलाक के मसले पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद, मुस्लिम मजलिस कंसल्टेशन, मिली काउंसिल, मरकजी जमीयत अहले सहित सभी अन्य प्रमुख मुस्लिम संगठनों मसलन देवबंद, बरेलवी व अन्य प्रमुख विचारकों की ओर अपनी बात रखते हुए इसे संवैधानिक मसला न मानते हुए इस्लाम का आपसी मसला करार दिया है।

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